आलोचना उत्तर आधुनिकतावाद क्या है? July 1, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on उत्तर आधुनिकतावाद क्या है? -जगदीश्वर चतुर्वेदी उत्तर-आधुनिकतावाद को वृद्ध पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है। पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढने के बाद से आर्थिकतौर पर अमरीकी प्रशासन की दुनिया में दादागिरी बढी है। इसके अलावा जनमाध्यमों; संस्कृति; सूचना प्रौद्योगिकी, और विज्ञापन की दुनिया […] Read more » North Modernism उत्तर आधुनिकतावाद
आलोचना फिनोमिना नामवर सिंह June 14, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 13 Comments on फिनोमिना नामवर सिंह -जगदीश्वर चतुर्वेदी वह साहित्य में जितना चर्चित है। नेट पाठकों में भी उतना ही चर्चित है। वह व्यक्ति नहीं फिनोमिना है। वह आलोचक है, शिक्षक है, श्रेष्ठतम वक्ता है, हिन्दी का प्रतीक पुरूष है, वह जितना जनप्रिय है उतना ही अलोकप्रिय भी है, वह सत्ता के साथ है तो प्रतिवादी ताकतों के भी साथ है। […] Read more » Namwar Singh नामवर सिंह
आलोचना श्रद्धालु आलोचना के प्रतिवाद में June 11, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की जरूरत है? ये कुछ […] Read more » Criticism आलोचना
आलोचना डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां June 10, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां -जगदीश्वर चतुर्वेदी डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया तकनीक के चरित्र की […] Read more » Small Magazine लघु पत्रिका
आलोचना रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन June 9, 2010 / December 23, 2011 by वंदना शर्मा | 5 Comments on रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन -वंदना शर्मा कविता भाषा की एक विधा है और यह एक विशिष्ट संरचना अर्थात् शब्दार्थ का विशिष्ट प्रयोग है। यह (काव्यभाषा) सर्जनात्मक एक सार्थक व्यवस्था होती है जिसके माध्यम से रचनाकार की संवदेना, अनुभव तथा भाव साहित्यिक स्वरूप निर्मित करने में कथ्य व रूप का विषिष्ट योग रहता है। अत: इन दोनों तत्त्वों का महत्त्व […] Read more » Ramcharitmanas रामचरितमानस
आलोचना अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं… June 3, 2010 / December 23, 2011 by गिरीश पंकज | 7 Comments on अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं… -गिरीश पंकज अपने देश में इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह की लंपटताई का खेल चल रहा है, उसे देख कर खीझ होती है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील लोगों के कारण समाज का एक नया बौद्धिक वर्ग अश्लील अभिव्यक्तियों को ही आधुनिक होने की गारंटी समझ रहा है। आप अपनी तमाम काली […] Read more » Obscenity अभिव्यक्ति अश्लीलता
आलोचना कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म May 13, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिंदी के बुद्धिजीवियों में धर्म ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ से ज्यादा महत्व नहीं रखता। अधिक से अधिक वे इसके साथ उपयोगितावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्यत्व की आत्मा है। मानवता का चरम है। जिस तरह मनुष्य के अधिकार हैं, लेखक के भी अधिकार हैं,वैसे ही धर्म के […] Read more » Rabindranath Tagore कविवर धर्म रवीन्द्रनाथ टैगोर
आलोचना पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक May 4, 2010 / December 23, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक -जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी की अधिकांश आलोचना मर्दवादी है।इसमें पितृसत्ता के प्रति आलोचनात्मक विवेक का अभाव है।आधुनिक आलोचना में धर्मनिरपेक्ष आलोचना का परिप्रेक्ष्य पितृसत्ता से टकराए, उसकी मीमांसा किए बगैर संभव नहीं है। मसलन्, अभी तक तुलसी पर समीक्षा ने लोकवादी जनप्रिय नजरिए से विचार किया है और पितृसत्ता को स्पर्श तक नहीं किया है। आधुनिक […] Read more » Tulsidas तुलसीदास पितृसत्ता
आलोचना देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास May 3, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास जगदीश्वर चतुर्वेदी• तुलसीदास ने अभिव्यक्ति की शैली के तौर पर रामचरित मानस में वायनरी अपोजीशन की पद्धति का कई प्रसंगों में इस्तेमाल किया है। इस क्रम में रावण और राम दोनों के गुण और अवगुणों की प्रस्तुति को रखा जा सकता है। रावण का राम के प्रत्येक कार्य और अवस्था में विपक्ष में रहना, मन्दोदरी […] Read more » Tulsidas तुलसीदास देरिदा
आलोचना हिन्दी बुद्धिजीवियों का फिलीस्तीन के प्रति बेगानापन April 30, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी एक जमाना था हिन्दी में साहित्यकारों और युवा राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं में युद्ध विरोधी भावनाएं चरमोत्कर्ष पर हुआ करती थीं, हिन्दीभाषी क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में युद्ध विरोधी गोष्ठियां, प्रदर्शन, काव्य पाठ आदि के आयोजन हुआ करते थे, किंतु अब यह सब परीकथा की तरह लगता है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों में अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सरोकारों […] Read more » Filistan फिलीस्तीन हिंदी बुद्धिजीवी
आलोचना कार्ल मार्क्स के बहाने रामचरित मानस की यात्रा April 27, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 4 Comments on कार्ल मार्क्स के बहाने रामचरित मानस की यात्रा मार्क्सवादी नजरिए से प्राचीन साहित्य की यह सार्वभौम विशेषता है कि इसमें मनुष्य के उच्चतर गुणों का सबसे सुंदर वर्णन मिलता है। उच्चतर गुणों के साथ ही साथ मानवीय धूर्तताओं, कांइयापन और वैचारिक कट्टरता के भी दर्शन होते हैं। देवता की सत्ता के बारे में विविधतापूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। प्राचीन साहित्य की महान् कालजयी रचनाएं […] Read more » Karl Marx कार्ल मार्क्स रामचरितमानस
आलोचना मूल्यांकन के पोंगापंथी मॉडल के परे हैं तुलसीदास April 24, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on मूल्यांकन के पोंगापंथी मॉडल के परे हैं तुलसीदास परंपरा और इतिहास के नाम पर हिन्दी का समूचे विमर्श के केन्द्र में तुलसीदास के मानस को आचार्य शुक्ल ने और कबीर को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आधार बनाया। सवाल किया जाना चाहिए कि क्या दलित-स्त्री-अल्पसंख्यकों के बिना धर्मनिरपेक्ष आलोचना संभव है? कबीर के नाम पर द्विवेदीजी की आलोचना दलित साहित्य को साहित्य में […] Read more » Ramcharitmanas तुलसीदास रामचरितमानस