मतलब ना हो तो अपने भी पहचानते नहीं….

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               -इक़बाल हिंदुस्तानी जब ज़िंदगी हमारी परेशान हो गयी, अपने पराये की हमें पहचान हो गयी। सोने की चिड़िया उड़ गयी मुर्दार रह गये, दंगों से बस्ती देश की शमशान हो गयी।   मतलब ना हो तो अपने भी पहचानते नहीं, रिश्तों की जड़ भी फ़ायदा नुकसान हो गयी।… Read more »

अदना इंसां से भी रिश्ते को बनाकर रखना….

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इक़बाल हिंदुस्तानी क़हर आलोद निगाहों से बचाकर रखना, अपने महबूब को आंखों में बसाकर रखना।   आपके सारे ग़मों को भी मैं अपना लूंगा, आप होंटो पे तबस्सुम को सजाकर रखना।   हर तरफ खूनी फ़सादों के भयानक मंज़र, नाता अफ़ज़ल है पड़ौसी से निभाकर रखना।   बनके मशहूर ना मग़रूर बनाना खुद को, अदना… Read more »

मुहोब्बत की भला इससे बड़ी

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मुहोब्बत की भला इससे बड़ी सौगात क्या होगी जला कर घर खड़ा हूँ मै यहाँ अब रात क्या होगी ||   गुनाहों में गिना जाने लगा दीदार करना अब हसीनो के लिए इससे बड़ी खैरात क्या होगी ||   सुबह से शाम तक देखे कई पतझड़ दरीचे में गरजते बादलों की रात है बरसात क्या… Read more »

“हुई पहली फुहार भरी बारिश तो तेरी याद आई”

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हुई पहली फुहार भरी बारिश तो तेरी याद आई निंदिया से पहले सपनों की बारात और साथ में कुछ हलके-हौले से बीत जानें की बोझिल सी बात भी आई. हर बूँद के साथ बरसा जो वो सिर्फ पानी न था. तेरे यहीं कहीं होने का अहसास भी था उसमें और तेरी बातों के चलते रहनें… Read more »

जहां ग़रीब है सबका शिकार क्या होगा….

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इक़बाल हिंदुस्तानी जहां के रहनुमा करते हैं वार क्या होगा, जहां ग़रीब है सबका शिकार क्या होगा।   जो आगे आयेगा वो दौर और मुश्किल है, यहां गुलों में है चुभन तो ख़ार क्या होगा।   नई नस्ल की तरक़्क़ी की सोच को बदलो, समझ रहे हैं बुज़ुर्गों को भार क्या होगा।   जो आग… Read more »

सुबह की ख्वाहिसों में रात की तन्हाईयाँ क्यूँ हैं

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मनोज नौटियाल   सुबह की ख्वाहिसों में रात की तन्हाईयाँ क्यूँ हैं नहीं है तू मगर अब भी तेरी परछाईयाँ क्यूँ हैं ||   नहीं है तू कहीं भी अब मेरी कल की तमन्ना में जूनून -ए – इश्क की अब भी मगर अंगड़ाइयां क्यूँ हैं ?   मिटा डाले सभी नगमे मुहोबत्त के तराने… Read more »

फिर गांव को शहर में बदलने की सोचना….

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         इक़बाल हिंदुस्तानी नफ़रत से दूसरों को ना नीचे दिखाइये, गर हो सके तो खुद को ही ऊंचा उठाइये। औरों को चोट देने में घायल ना आप हों, पागल के हाथ में ना यूं पत्थर थमाइये।   फिर गांव को शहर में बदलने की सोचना, पहले शहर को प्यार से जीना सिखाइये… Read more »

आजकल ज़िंदगी का भरोसा नहीं….

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इक़बाल हिंदुस्तानी उसको शिकवा है उसको समझा नहीं, उसके बारे में मैंने तो सोचा नहीं।   क़र्ज़ के वास्ते देश भी बेच दो, तुमने तारीख़ से कुछ भी सीखा नहीं।   आईना तोड़कर आप धोखे में हैं, अपने चेहरे के दाग़ों को देखा नहीं।   ज़िंदगी तल्खि़यों से बचा लीजिये, आजकल ज़िंदगी का भरोसा नहीं।… Read more »

जो भी बेटियां बहूं बनी जल रही हैं रोज़ आजकल….

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इक़बाल हिंदुस्तानी उम्र नौकरी की चल बसी अर्ज़ियोें का क्या करें जनाब, सबकी सब जला के आ गये डिग्रियों का क्या करें जनाब।   पार आके फिर ना जायेंगे उसने ये क़सम दिलाई है, कश्तियां जला रहे हैं हम कश्तियों का क्या करें जनाब।   डस रहे हैं दौलतो के नाग दानिशो ज़हीन को यहां,… Read more »

अहसास ए दर्द वो करे गर चोट खायें हम….

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इक़बाल हिंदुस्तानी नामो निशां भी जुल्म का जिसमें ना पायें हम, ऐसा निज़ाम देश में लाकर दिखायें हम।   अब ऐसे आदमी को मसीहा बनाइये, अहसासे दर्द वो करे गर चोट खायें हम।   ग़ल्ती करेंगे खायेंगे ठोकर बुरा नहीं, संभलें अगर तो कुछ ना कुछ सीख जायेें हम।   जीना तो दूर रहना भी… Read more »