कविता साहित्य कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे October 29, 2015 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे दिल की बात बयाँ करूँ भी तो कैसे मांगते दुआएं अब तो दिल ये थका न पाया कभी जो भी तुझ से कहा मकसदे ज़िन्दगी की नेमत नहीं दी हौसले आजमाने की जहमत नहीं की कहते हैं पल पल पे हैं तेरी हुकुमरानी जैसी तू चाहे जिसे […] Read more » कभी मै दूर तो कभी तू दूर मुझसे
कला-संस्कृति कविता ए नये भारत के दिन बता.. October 27, 2015 / October 28, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment ए नये भारत के दिन बता…… ए नदिया जी के कुंभ बता, उजरे-कारे सब मन बता, क्या गंगदीप जलाना याद हमें या कुंभ जगाना भूल गये ? या भूल गये कि कुंभ सिर्फ नहान नहीं, ग्ंागा यूं ही थी महान नहीं । नदी सभ्यतायें तो खूब जनी, पर संस्कृति गंग ही परवान चढी। नदियों में […] Read more » Featured ए नये भारत के दिन बता..
कला-संस्कृति कविता रामचरित October 23, 2015 / October 23, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment धरियो, रामचरित मन धरियो तजियो, जग की तृष्णा तजियो। परहित सरिस धर्म मन धरियो मरियो, मर्यादा पर मरियो।। धरियो, रामचरित…. भाई बने तो स्वारथ तजियो संगिनी बन दुख-सुख सम धरियोे। मात बने तो धीरज धरियो पुत्र बने तो पालन करियो।। धरियो, रामचरित… सेवक सखा समझ मन भजियो ़शरणागत की रक्षा करियो। शत्रु संग मत धोखा […] Read more » रामचरित
कविता आरक्षण या भीख October 17, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment हमें भीख दे दो.. हम अपाहिज जो हो चले, अब तो हमारे भी हाथ पैर में जंग और दिमाग में अलीगढ़ के ताले पड़ गये | कुछ करना अब असंभव सा हो गया है अब तो हमको भी आरक्षण चाहिए | हम भी अब २०-३० नंबर से आई.आई.टी. , एम.बी.बी. एस.पास करेंगे, आरक्षण के फायदे […] Read more » आरक्षण या भीख
कविता हा! ये कैसे हुआ ? सोचो, क्यू हो गया ?? October 16, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment मकां बनते गांव झोपङी, शहर हो गई, जिंदगी, दोपहर हो गई, मकां बङे हो गये, फिर दिल क्यांे छोटे हुए ? हवेली अरमां हुई, फिर सूनसान हुई, अंत में जाकर झगङे का सामान हो गई। जेबें कुछ हैं बढी मेहमां की खातिर फिर भी टोटे हो गये, यूं हम कुछ छोटे हो गये। हा! ये […] Read more » क्यू हो गया ?? हा! ये कैसे हुआ ? सोचो
कविता विकृत होते प्रकृति संबंध October 16, 2015 by अरुण तिवारी | Leave a Comment ’हम’ को हटा पहले ’मैं’ आ डटा फिर तालाब लुटे औ जंगल कटे, नीलगायों के ठिकाने भी ’मैं’ खा गया। गलती मेरी रही मैं ही दोषी मगर फिर क्यूं हिकारत के निशाने पे वो आ गई ? हा! ये कैसे हुआ ? सोचो, क्यूं हो गया ?? घोसले घर से बाहर फिंके ही फिंके, धरती […] Read more » विकृत होते प्रकृति संबंध
कविता साहित्य रहस्यमयी सूर्य October 12, 2015 / October 12, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पवन प्रजापति उदय प्रताप इंटर कालेज, वाराणसी तीक्ष्ण किरण के आदि अंत में हे दिनकर! तुम हो अन्नत में सौर कुटुम्ब के तुम आधार शून्य जगत में निराकार ।। अमिट अथाह उर्जाओं का श्रोत अति उष्मा से ओत प्रोत दुग्घ्ध मेखला के परितः चलायमान अन्नत आकाश में उदियमान ।। अंधकार है शत्रु तुम्हारा संपूर्ण विश्व […] Read more » रहस्यमयी सूर्य
कविता साहित्य मैं हूँ एक इंसान October 11, 2015 / October 11, 2015 by वैदिका गुप्ता | Leave a Comment ना नाम है मेरा ना पहचान है मेरी ना कोई धर्म है मेरा मैं हूँ एक इंसान।। ना जोड़ो मुझे किसी धर्म से, मेरा धर्म भी इंसानियत है। मेरा कर्म भी इंसानियत है।। दूर रहो मुझसे, ऐ धर्म के पेहरेदारों, तू जितने पास आया है! उतनी इंसानियत खो दी मैंने। तुझे सत्ता में आना है, […] Read more » Featured मैं हूँ एक इंसान
कविता साहित्य कौसानी तक October 6, 2015 by बीनू भटनागर | Leave a Comment हलद्वानी के खुले जो द्वार, पंहुचे हम कुमाऊँ खण्ड, उत्तराखण्ड का सुन्दर अंग, चढ़ाई हुई अब आरंभ। नैनीताल के रस्ते मे, जब देखा विशाल भीमताल, भीमताल है इतना सुन्दर तो, कैसा होगा नैनीताल! नैनी झील के चारों ओर, बसा है नैनीताल। पर्यटकों का सर्वाधिक रुचिकर है, कुमाऊँ का ये स्थान। प्रत्यूषकाल मे, […] Read more » कौसानी तक
कविता विविधा मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा September 30, 2015 / September 30, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | 4 Comments on मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा क़ैस जौनपुरी मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा आज बक़रीद है सुबह सुबह किसी ने टोका ईद मुबारक़ हो ईद मुबारक़ हो नमाज़ पढ़ने नहीं गए लेकिन स्वीमिंग करने जा रहे हो हाँ मैं नहीं गया क्यूँकि मैं नाराज़ हूँ उस ख़ुदा से जो ये दुनिया बना के भूल गया है कहीं खो गया है या शायद […] Read more » Featured मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा
कविता साहित्य पितृयज्ञ September 28, 2015 / September 29, 2015 by विमलेश बंसल 'आर्या' | 1 Comment on पितृयज्ञ पितृयज्ञ हर घर में होवे, चरण आचरण सायं प्रात| सेवा शुश्रूषा कर श्रद्धा, पायें उनका आशीर्वाद|| 1. चले गए जो इस दुनियाँ से, वंशावली वट वृक्ष बनायें| उनके सुन्दर कार्यों से, बच्चों को अवगत करें सिखायें| पूर्ण करें उनके कामों को, बच्चों को लेकर के साथ|| सेवा शुश्रूषा …….. 2. पूर्णिमा से अमावस्या तक, कोई […] Read more »
कविता साहित्य “चलो हम प्यार करें” September 11, 2015 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment छोड़ो यह तकरार, चलो हम प्यार करें, तुम मानो मेरी बात, चलो हम प्यार करें ! हिम शिखर से हिम चुराकर अपना मन शीतल कर लो, बागों से खिलती कलियाँ चुन , तुम अपनी झोली भर लो, नील गगन में उड़ते पंछी, जैसे हम आजाद उड़े, प्रेम नगर की प्रेम डगर पर कितने वर्षो बाद […] Read more » "चलो हम प्यार करें"