कविता साहित्य अयोध्या में July 6, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment सरयु बहती थी अयोध्या में आज भी बहती है रहते थे लोग वहाँ आज भी रहते हैं गलियाँ और सड़कें वहाँ तब भी थी आज भी हैं मंदिर से घंटी और मस्जिद से अजान तब भी सुनाई देती थी आज भी सुनाई देती है । बावजूद इनके आज कहीं दिखता नहीं राम का मंदिर […] Read more » अयोध्या में
कविता साहित्य चौराहे पर खड़े हम July 5, 2013 / July 5, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment जिसके सहारे था, उसी ने मुझे बेसहारा किया साहिल ने भी अब मुझसे किनारा किया । दिन गुजर गया, पर किसी ने खबर न ली शाम को उसने मुझे दूर से इशारा किया । खट्टी-मीठी यादों का नाम है मेरी जिंदगी यादों के सहारे ही हमने अबतक गुजरा किया । जो कुछ […] Read more » चौराहे पर खड़े हम
कविता साहित्य प्रेम की माला July 5, 2013 by डॉ.अलका अग्रवाल | Leave a Comment कच्चे धागे प्रेम के, थोड़ा खिचतें ही बिखर जाएँ, चढ़ाओं इस पर धार विश्वास की ताकि पक्के हो जाए। पहनों इसको ध्यान से कहीं उलझन न कोई पड़ जाए, सुलझाओं फिर धैर्य से ताकि सिकुड़न न पड़ पाए।। प्रेम की डोर को तानों उतना ही कि टूटने न पाये, जुड़ने को पड़ी गांठ से फिर […] Read more » प्रेम की माला
कविता साहित्य एक पुत्र गाँव छोड़ रहा था July 4, 2013 / July 4, 2013 by कुमार विमल | Leave a Comment हाँ , एक पुत्र आज गावँ छोड़ रहा था, भविष्य की तलाश में शहर की ओर दौड़ रहा था , और पिता पुत्र की आँखों में भाग्योदय देख रहा था , हाँ ! एक पुत्र आज गावँ छोड़ रहा था । माँ का आशीर्वाद, पिता का प्यार अपनो का अरमान, छोटो का सम्मान सब उसको […] Read more » एक पुत्र गाँव छोड़ रहा था
कविता साहित्य न आयीं तू मेरे सपनों में , न आयीं तू मेरे नगमों में July 4, 2013 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | Leave a Comment जलता रहा मैं दीपक बनकर ……… न जाने किस विश्वास पर दिन -रात मैं राह तकता रहा जलता रहा मैं दीपक बनकर ………. पर न आयीं तुम हवाएं बनकर जल गये मेरे अरमा सारे मन कि अगन प्यास बनकर रह गयी तन भी मेरे साथ न दिया मिट गये सपने सारे जल गये लम्हें प्यारे […] Read more » न आयीं तू मेरे नगमों में न आयीं तू मेरे सपनों में
कविता साहित्य आंसू निकल पड़े July 4, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment लेने सबाब तीर्थ का, घर से निकल पड़े | केदार-बद्री धाम के, दर पे निकल पड़े | सब ठीक चल रहा था,मौसम भी साफ था, कुछ बादलों के झुण्ड,बरसने निकल पड़े | दीवानगी-ए-अकीदत पे जरा गौर तो करें, ठहरे जरा सी देर मगर,फिर से चल पड़े | लाखों का वो हुजूम जो,चल तो रहा था,पर- […] Read more » आंसू निकल पड़े
कविता साहित्य जीवन का लक्ष्य July 3, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मैं, मैं हूँ तुम, तुम हो वह भी, वह ही है यह सत्य है जानते हैं हम सब यह सब . पर, इतना ही जानना -समझना क्या जीवन का लक्ष्य है ? या यह भी जानना-समझना-मानना कि कहीं-न-कहीं एक दूसरे में हैं हम अन्यथा वाकई अधूरे हैं हम ! Read more » जीवन का लक्ष्य
कविता साहित्य बादलों पर गीतों के टुकड़े July 2, 2013 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on बादलों पर गीतों के टुकड़े नहीं होती बात जब कुछ कहने को मैं यूँ ही कोई गीत गुनगुना देता हूँ । बादल अक्सर उड़ते हुए यहाँ वहाँ पकड़ लेते हैं मेरे गीतों के टुकडों को और बैठा लेते है अपने ऊपर । बादलों को अच्छा लगता होगा गीतों को लेकर उड़ना शायद उन्हें भी पता होगा कि इससे कुछ […] Read more » बादलों पर गीतों के टुकड़े
कविता साहित्य देवभूमि मे बादल फटे July 2, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment देवभूमि में बादल फटे, यात्री बाढ़ में फंसे, प्रलय सा मच गया, देखो, हाहाकार। भागीरथी और अलखनन्दा में, भीषण जल प्रवाह, बस और कारें ऐसे बहीं, जैसे कग़ज़ की नाव, बाढ़ प्रकोप से उजड़ गये, उत्तरकाशी व देवप्रयाग, बद्री नाथ तो बच गये, उजड़े केदार नाथ, सारी बस्ती बह गई, रह गये भोलेनाथ। गंगा तट […] Read more » देवभूमि मे बादल फटे
कविता साहित्य समारोह July 1, 2013 by कुमार विमल | Leave a Comment आज शहर में एक समारोह हैं, इस पावन पुनीत मांगलिक बेला पर, नेता भी आए, अभिनता भी आए, सज्जन भी आए, अपराधी भी आए । अरे देखो वहाँ महफ़िल सजी है, नए आभूषण, नए परिधान, नए फैशन, नए रिवाज , ऐसा लगता है मनो भव्यता की कुश्ती छिडी है । आधुनिकता के रंग […] Read more » समारोह
कविता साहित्य दर्द और दहशत July 1, 2013 / July 1, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment उसने देखा है गाय और भैसों को ट्रक और ट्रेक्टर से ले जाते हुए उसने देखा है भेड़ और बकरी को टैम्पू और तांगे पर ले जाते हुए उसने देखा है मेमने को बोरे में डाल कर साइकिल से ले जाते हुए उसने देखा है मुर्गियों को रिक्शे- ठेले पर ले जाते हुए और हर […] Read more » दर्द और दहशत
कविता मैं शायर तो नही July 1, 2013 / July 7, 2013 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | Leave a Comment शहर की और निकल पड़ा हूँ ….. मुझमें कोई खास बात नही है मुझमे कोई अंदाज नही है मैं एक अनजान हूँ अनपढ़ हूँ नही आता शब्दों को सहेजना फिर भी राही हूँ … पगड़ी में चलना सिखा शहर की गलियों से अनजान हूँ गाँव की गलियों […] Read more » मैं शायर तो नही