कविता कविता – कितना अच्छा होता September 13, 2013 / September 13, 2013 by मोतीलाल | 1 Comment on कविता – कितना अच्छा होता कितना अच्छा होता कि हवा अपनी ही दुनिया में बहती न वह आँधी का रुप लेती न ही कोई घर बेघर हो पाता । कितना अच्छा होता कि नदी अपने में शांत बहती न बाढ़ का रुप धरती न किसी को अनाथ होना होता । कितना अच्छा होता कि धरती अपने में मस्त […] Read more » कविता - कितना अच्छा होता
कविता उत्तराखण्ड महान है | September 12, 2013 / September 12, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on उत्तराखण्ड महान है | डा. राज सक्सेना पग-पग पर पावन नवगंगा, कण – कण देव समान है | हरित हिमालय से संपूरित , उत्तराखण्ड महान है | गौरवमय गिरिराज, गोमुखी- गंगा का श्री-द्वार है | शिवसमसुन्दर,श्रेष्टसुसज्जित, कनखलमय , हरिद्वार है | सांध्यआरती गंगा-तट की, पुलकित, पुण्य प्रमाण है | हरितहिमालय […] Read more » उत्तराखण्ड महान है |
कविता कौन हो तुम September 12, 2013 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment अकेला रहता हूं तो तुम दौड़कर कसकर अपनी बाहों में भर लेती हो रोमांच के इस पड़ाव पर पहुंचाकर कुछ ही पलों में रुखसत हो जाती हो क्यों आती ? क्यों जाती हो इस सवाल का जवाब नहीं हैं तुम्हारा अतीत में ले जाना अतीत से वापस लाकर फिर से उसी हालत में पटक […] Read more » कौन हो तुम
कविता आओ खेलें नया एक खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल! September 8, 2013 / September 8, 2013 by भारत भूषण | Leave a Comment आओ खेलें नया एक खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल! है यह बहुत निराला खेल, नेताओं का प्यारा खेल !! भगवा रंग को कम्यूनल कहना, हरे रंग का सेक्युलर रहना ! होगा बहुत रंगीला खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल!! नेताओं का प्यारा खेल, है यह बहुत निराला खेल!! तुम मुस्लिम हित की बात है करना, हमेशा ही सेक्युलर […] Read more » भारत भूषण
कविता इश्किया शायरी- फेसबुक पर September 5, 2013 / September 5, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment फेसबुक पर लगा है इश्क का बाज़ार, दो रुपये मे ढ़ाई किलो आज का है भाव, कवि मित्र लिख रहे हैं मधुमास के गीत, कवियत्रियों को भी किसी का इंतज़ार है। इश्क के बाज़ार मे माल बहुत पड़ा है, कविता ग़ज़ल शायरी सबकी भरमार है, लूटलो कंमैंट बेशुमार भरलो झोलीयाँ , लाइक की बात क्या, […] Read more » इश्किया शायरी- फेसबुक पर
कविता कविता : अच्छा लगता है September 3, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on कविता : अच्छा लगता है मिलन सिन्हा कभी कभी खुद पर हंसना भी अच्छा लगता है कभी कभी दूसरों पर रोना भी अच्छा लगता है। हर चीज आसानी से मिल जाये सो भी ठीक नहीं कभी कभी कुछ खोजना भी अच्छा लगता है। भीड़ से घिरा रहता हूँ आजकल हर घड़ी कभी कभी तन्हा रहना भी अच्छा लगता […] Read more » अच्छा लगता है
कविता बहिष्कार September 2, 2013 / September 2, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment निर्मल बाबा हो या आसाराम, या कोई भी और संत महान, धन और सत्ता के मतवाले, शिष्यों को भरमाने वाले, उनका लाभ उठाने वाले, तिज़ोरी अपनी भरने वाले, धर्म […] Read more » बहिष्कार
कविता कविता : कुछ काम तो करो August 26, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा बातें हुई तमाम, कुछ काम तो करो दूर है मुकाम, कुछ काम तो करो। घड़ी इम्तिहान की, संघर्ष है कठिन विजय तुम्हे मिलेगी,कुछ काम तो करो। प्यार का ही दिन हो, प्यार की ही रात नफरत से न कोई वास्ता, कुछ काम तो करो। एकता में बल है, प्रेम में […] Read more » कुछ काम तो करो
कविता कविता – नेता August 23, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment जिनके पीछे तुम भाग रहे हो जिनके लिए तुम कुछ भी करने को तैयार हो क्या तुम्हें पता है कि वो भी भाग रहा है कि वो भी तैयार है सभी कुछ करने को तत्पर । खुश हो रहे हो तुम यही सोचकर उसका भागना और उसका त्याग तुम्हारे लिए है शायद तुम्हें नहीं दिख […] Read more »
कविता कुछ भी निश्चित नहीं है August 23, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment चाँद तुम रोज़ क्यो मुस्कुराते हो ? तुम्हारा आसमान मे निकलना, खिलना कितना सुनिश्चित है। तुम्हे कभी कोई बादल भी ढकले, तो तुम उदास हो जाते हो […] Read more » कुछ भी निश्चित नहीं है
कविता बाहें August 19, 2013 / August 19, 2013 by विजय निकोर | 1 Comment on बाहें तुम थे तो तुम्हारी बाहों के साथ मेरी बाहों का विस्तार बहुत लंबा था । मुझको लगता था मैं कुछ भी छू सकती थी.. कर सकती थी, कह सकती थी, मेरी ज़िन्दगी तब इस तरह कोई कानून नहीं थी, झूमती हवा के समान स्वच्छंद थी मैं, केवल धरती ही नहीं थी अपनी, […] Read more »
कविता कहीं से काले बादल आही जाते हैं August 17, 2013 by बीनू भटनागर | 4 Comments on कहीं से काले बादल आही जाते हैं तेज़ चमकती धूप मे कहीं से, उमड़ धुमड़ कर काले बादल, आ ही जाते हैं। जैसे शांत मन मे अचानक, नकारात्मक संवेग कभी भी, छा ही जाते हैं। अंतर्मन पर धुंध सी छाने लगती है, जो वेदना का धुंआ सा बन जाती है। ये ज़हरीला धुंआ भीतर ही भीतर फैलता है…. धुटन ही धुटन देता […] Read more » कहीं से काले बादल आही जाते हैं