कविता चाँद तारे October 12, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बीनु भटनागर चाँद ने थोड़ी सी रौशनी, सूरज से उधार लेकर, हर रात को थोड़ी थोड़ी बाँट दी। अमावस की रात तारों ने, चाँद के इंतज़ार मे, जाग कर गुजार दी। अगले दिन चाँद निकला, थका सा पतला सा, तारों ने चाँद की, आरती उतार ली। ‘’महीने मे एक बार लुप्त होना, मजबूरी है मेरी, […] Read more » चाँद तारे
कविता कविता : जीवन का हिसाब October 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तुमसे बेहतर तुम्हें जाने कौन मुझसे बेहतर मुझे जाने कौन लोग कहें न कहें मानें न मानें जानें न जानें पहचानें न पहचानें क्या फर्क पड़ेगा जैसे हम हैं वैसे हम हैं जैसा आगे करेंगे वैसा ही बनेंगे सच है, झूठ से सच कैसे साबित करेंगे गलत तरीके से जब जोड़ेंगे संपत्ति […] Read more » कविता : जीवन का हिसाब
कविता भारती का भाल October 10, 2013 by अनिल सैनी ‘अनि’ | 3 Comments on भारती का भाल भारती के भाल को लज्जा रहा है देश क्यों ? बेटों के शिश मुण्ड को देख कर भी चुप है क्यों ? क्यों मुख अब रक्तलाल नहीं, क्या वीरों के रक्त में उबाल नहीं ? क्यों बार-बार विवश है हम, क्या हम में स्वाभिमान नहीं ? अब छोड दो खुला इन रणबाकुरों कों, इन्हे मदमस्त […] Read more » भारती का भाल -
कविता कविता : खिलौना October 8, 2013 / October 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ एक बार फिर खून से रंगे पड़े हैं दर्जनभर दबे-कुचले लोगों को मारकर आधे दर्जन दबंग असलहों के साथ सैकड़ों मूक दर्शकों के सामने निकल पड़े हैं वीर ( ? ) बने राजनीतिक बयानबाजी का टेप बजने लगा है अनवरत इधर, सत्ता प्रतिष्ठान की आँखों से बह निकली […] Read more » कविता : खिलौन
कविता नीड़ October 4, 2013 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment तिनके, पत्ते थे साथ चुने धागे थे अरमानों के बुने हल्का झोंका भी सह न सका सूखे पत्तों सा बिखर गया वह नीड़ अचानक उजड़ गया। हमने, तुमने मिलकर जिसकी रचना की थी अपने खूं से सपना ही कहें तो अच्छा है जब आंख खुली तो सिहर गया वह नीड़ अचानक उजड़ गया। गलती मेरी […] Read more » नीड़
कविता कविता : नया खेल October 2, 2013 / October 2, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा तिकड़म सब हो गए फेल नेताजी पहुँच ही गए जेल बनने लगे हैं नए समीकरण बाहर शुरू हो गया है नया खेल खूब खाया था, खिलाया था पीया था, खूब पिलाया था राजनीति को ढाल बनाया था परिवार को आगे बढ़ाया था जिनका खूब साथ दिया उन्होंने ही दगा किया […] Read more » कविता : नया खेल
कविता हिन्दी दिवस पर कविता October 2, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment राम आश्रय पिता और गिरिराज में , नाता भूत अटूट । हर दम रखते लाज ये , दोनों धरती के पूत ॥ सर्द रात में पहरा देता , हर बैरी को रखता दूर । सीना खोल दुश्मन से लड़ता , करता उसकी हिम्मत चूर । गर्म हवा से हमें बचाता , हमको प्यार देता भरपूर […] Read more » हिन्दी दिवस पर कविता
कविता नारी शक्ति भारती October 1, 2013 by बीनू भटनागर | 3 Comments on नारी शक्ति भारती लावण्य रूप मोहती, उत्कृषठ बुद्धि धारती, अपार शक्ति व्यापती, नारी शक्ति भारती। स्त्री विमर्श त्यागती, स्वयं को पहचानती, आरक्षण नहीं मांगती, संरक्षण नहीं चाहती। स्नेह आदर स्वीकारती, दासता धिक्कारती, कर्तव्य सब निर्वाहती, स्नेह से दुलारती। Read more » नारी शक्ति भारती
कविता कविता : जंजीर September 26, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment – मिलन सिन्हा […] Read more » कविता : जंजीर
कविता कविता-ठण्डी ठण्डी बौछारें September 24, 2013 / September 24, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन भादों की तपती उमस में , सावन का एहसास दिलायें । फुहार बरसती बौछारें, ये ठण्डी ठण्डी बोछारें ।। उदास हुए ये गुवार के पत्ते मूंह लटकाये बाजर सिरटी । बौछारों की इक छुअन से खिल खिल जाये खेत की मिटटी। ऐसा सहलायें बौछारे , ये ठण्डी ठण्डी बौछारें ।। रातों भेजे […] Read more » ठण्डी ठण्डी बौछारें
कविता व्यंग्य खाने में कैसा शर्म September 18, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा कसमें वादे निभायेंगे न हम मिलकर खायेंगे जनम जनम जनता ने चुनकर भेजा है चुन- चुनकर खायेंगे पांच साल बाद खाने का कारण विस्तार से उन्हें बतायेंगे कसमें वादे निभायेंगे न हम मिलकर खायेंगे जनम जनम हीरा-मोती, सोना-चांदी तो है ही बस थोड़ा और रुक जाइये जंगल,जमीन के साथ साथ […] Read more » खाने में कैसा शर्म
कविता मै फिर भी कविता लिखती हूँ September 17, 2013 / September 17, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मै फिर भी कविता लिखती हूँ मैने नहीं लिखे इश्क के अफ़साने, मैने नहीं बुने प्यार के ताने-बाने, मै फिर भी कविता लिखती हूँ। मैने नहीं किया किसी का इंतज़ार, मैन नहीं काटी कोई आँखों मे रात, मै फिर भी कविता लिखती हूँ। मेरे अतीत मे कुछ ऐसा है ही नहीं, मुडकर जो देखूँ लिखूं […] Read more » मै फिर भी कविता लिखती हूँ