कविता कैसी आजादी August 14, 2013 by चन्द्र प्रकाश शर्मा | Leave a Comment 15 अगस्त 1947 को हुआ भारत आज़ाद धरती रोई रोया अम्बर और रोया ताज। करोड़ो बेघर हुए लाखो हुए हलाल इतना खून बहा धरती पर धरती हो गई लाल घर लुटा अस्मत लुटी, लुट गए सब कारवाँ , देख दशा भारत माँ की बिलख उठा आसमां। बिछड़ गए लाखो अपने चली न कोई तदबीर याद […] Read more » कैसी आजादी
कविता व्यंग्य कविता : मौके की बात August 12, 2013 / August 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा आधुनिक युग कलयुग तो है ही ‘क्यू’ युग भी है जहाँ जाइए वहां क्यू नल पर नहाइए, वहां क्यू राशन लेना है, क्यू में आइए बच्चे का एडमिशन है, क्यू में आइए भाषण देना है, क्यू में आइए रोजगार दफ्तर में बेकारों के लिए क्यू श्मशान में मुर्दों के लिए क्यू एक दिन […] Read more » मौके की बात
कविता व्यंग्य नेता- अभिनेता, असरकारी August 10, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा हास्य व्यंग्य कविताएं : नेता- अभिनेता, असरकारी नेता-अभिनेता नेता और अभिनेता चुनाव मैदान में खड़े थे । मतदातागण सोच में पड़े थे । उधर, छिड़ा था विवाद, मतदाता देगा किसका साथ । एक के पास था आश्वासनों और वादों का झोला, तो दूसरे के पास था भुलावे में रखने का नायाब मसाला । […] Read more »
कविता कविता : खुद को जानो August 9, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा कोई बोले न बोले खुद से तू बोल अपने तराजू में खुद को तू तौल खुद को पहले जान तभी खुदा मिलेंगे नहीं तो तुमसे वो जुदा रहेंगे खुद से कर प्यार जमाने से प्यार हो जाएगा फिर तो जीवन तेरा खुशियों से भर जाएगा । Read more » कविता : खुद को जानो
कविता कविता : कुछ बात बने August 6, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा दुःख में भी सुख से रह सको तो कुछ बात बने। पहले खुद को पहचान सको तो कुछ बात बने। जानता हूँ , तुम वो नहीं जो तुम वाकई हो जो तुम हो, वही रह सको तो कुछ बात बने। माना की दुनिया बड़ी जालिम है फिर भी जालिम को भी […] Read more » कविता : कुछ बात बने
कविता “प्रेमपत्र नंबर : 1409” August 5, 2013 / August 5, 2013 by विजय कुमार सप्पाती | 3 Comments on “प्रेमपत्र नंबर : 1409” जानां ; तुम्हारा मिलना एक ऐसे ख्वाब की तरह है , जिसके लिए मन कहता है कि , कभी भी ख़त्म नहीं होना चाहिए … तुम जब भी मिलो , तो मैं तुम्हे कुछ देना चाहूँगा , जो कि तुम्हारे लिए बचा कर रखा है ………….. एक दिन जब तुम ; मुझसे मिलने आओंगी प्रिये, […] Read more » “प्रेमपत्र नंबर : 1409”
कविता तेरे लिए August 4, 2013 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment मै,तेरे लिए आया, इस जिंदगी में, चाहकर कर भी तेरा ना हो सका, मुरझे हुए फूलों की तरह मेरी सवेंदनाएं भी मुरझा गई, खिली हुई कलियों की खुशियों जैसे प्यार का अहसास होने लगा था, कुछ सपने थे, जो पतझड़ की तरह हो गए, बिन उसके एक पल भी एक नागवार लगने लगा राहें बनाने […] Read more » तेरे लिए
कविता हरियाली तीज August 3, 2013 / August 3, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मेहंदी मंडित तेरी हथेली हाथों में चूड़ी अलबेली, लाल हरी और नीली-पीली झूलन सावन चली सहेली। तेरी कुन्दन सी है काया रूप कहूँ या कह दूँ माया नेह सभी का तूने पाया सुख की है बस तुझपर छाया । मेघा […] Read more » हरियाली तीज
कविता मृदु-मंगल उपहार हो August 3, 2013 by डा.राज सक्सेना | Leave a Comment डा.राज सक्सेना मधुमय-मधुर कमल पांखों का, परिपूरित आगार हो | संरचना सुन्दर संविद की , श्रुत – संगत उपहार हो | कज्जलकूट केश, कोमलतम्, गहन-बरौनी, अविरलभंगिम | मृगछौने सम, नयन सलोने, नहीं ठहरते, चंचल अग्रिम | तीव्र नासिका, अधर अछूते, अमृत-मयी बहार हो | संरचना सुन्दर संविद की , श्रुत – संगत उपहार हो […] Read more » मृदु-मंगल उपहार हो
कविता कविता : जीने का रहस्य July 30, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा न जाने कितनी रातें आखों में काटी हमने प्रेम में नहीं, मुफलिसी में रातें ऐसे काटी हमने खाते-खाते मर रहें हैं न जाने कितने बड़े लोग एक नहीं, हजारों को भूखों मरते देखा हमने दोस्त जो कहने को तो थे बिल्कुल अपने वक्त पर उन्हें मुंह फेर कर जाते देखा […] Read more » जीने का रहस्य
कविता भारत की व्यथा July 29, 2013 / July 29, 2013 by प्रवीण कुमार | Leave a Comment प्रवीण कुमार मै थी एक सोने की चिड़िया , मेरी थी हर बात निराली . सदाबहार नदी-तालों से ,खेतों में उगती हरियाली. घोर-परिश्रम और ज्ञान से , हर घर में थी खुसिहाली. तप-त्याग और सदाचार से , मेरे चेहरे पर थी लाली. सोने-चान्दी,हीरे-पन्नों से , घर- आँगन थे भरे-भरे . […] Read more » भारत की व्यथा
कविता हवा की नाराजगी July 29, 2013 / July 29, 2013 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment हैरान हू, कि, आज हवा भी मुझसे नाराज है, पेरशान हूँ कि, जमीन मेरे भावनओं पर टिकी है, बसंत के मौसम में, मुरझाया हुआ सा हूँ, कला साहित्य से प्रेम होने पर भी, सिर्फ , चंद किताबों को टटोलता रहा, सोचने के तरीकों में, अनायास परिवर्तन आ गया, रास्ते में खड़े होकर, बार बार, वक़्त […] Read more » हवा कि नाराजगी