कविता मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी अब मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी कविताएँ ही पढ़ता हूँ कविता ही क्या ? तुम्हें भी तो पढता हूँ… महज़ एक कोशिश ! तुम्हारी मुस्कान के पीछे छुपा वो दर्द कचोटता है मेरे मन को तुम्हारी खिलखिलाती हँसी सुनकर लगता है जैसे किसी गहराई से एक दबी सी आवाज़ भी उसके पीछे से कराहती है […] Read more » मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी
कविता कितने प्यार से May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on कितने प्यार से सींचा था मैंने उस रिश्ते को अपने ही हाथों मे संभाला था उसे किसी फूल की तरह समझदार तो था मगर हरबार हौसला बढाता रहा मैं वो आगे बढता रहा आगे बढते हुए वो इतना आगे निकल गया कि अब वो मुडकर भी नहीं देख पाता गिला वो नहीं कि वो आगे […] Read more »
कविता मेरे होने, न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये … May 27, 2013 by पंकज त्रिवेदी | Leave a Comment मेरे होने, न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये … कितना कुछ घुमड़ रहा है मेरे अंदर और बाहर से मेरे अंदर तक फैलता कोलाहल किसी धुएँ की तरह प्रदूषित कर देता है मेरे मन को… मैं हरपल – मेरे होने के साथ जीना चाहता हूँ मगर मेरे होने, न होने के […] Read more » न होने के बीच का अवकाश है तुम्हारे लिये ... मेरे होने
कविता हवाओं में बसी देहगंध May 25, 2013 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on हवाओं में बसी देहगंध कहाँ से आ रही है हवा ? ये पता नहीं बस इसमें बसी देह गंध पहचान आती है. तभी तो पहचाना कि तुम बहती हवा की दिशा में हो. नहीं है इसमें वो सब कुछ जो एक पहाड़ पर होता है शिखर, गरिमा,संपदा, और थोड़ी जड़ता भी बस है तनिक सहजता जो सदा उँगलियों […] Read more » हवाओं में बसी देहगंध
कविता मैं सागर में एक बूँद सही May 25, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैं सागर में एक बूँद सही मैं सागर में एक बूँद सही, मैं पवन का एक कण ही सही, मैं भीड़ में इक चेहरा सही, जाना पहचाना भी न सही, मैं तृण हूँ धरा पर एक सही, अन्तर्मन की गहराई में कभी, मैंने जो उतर कर देखा है कभी, सीप में बन्द मोती की तरह, उन्माद निराला पाया है, उत्कर्ष शिखर का पाया है। जब भी कुछ मैंने लिखा है कभी, ख़ुद को ही ढ़ूंढ़ा पाया है । तब,लेखनी ने इक दिन मुझसे कहा, ‘’मैंने तुमसे तुम्हे मिलाया है।‘’ मैंने फिर उससे कुछ यों कहा, ‘’ओ मेरी लेखनी मेरी बहन! तूने मुझको तो मेरी नज़र में, कुछ ऊपर ही उठाया है।‘’ मैं सागर की एक बूंद सही, मैंने अपना वजूद यहाँ […] Read more » मैं सागर में एक बूँद सही
कविता हास्य व्यंग्य कविता : माडर्न पत्नी के माडर्न विचार May 24, 2013 / May 24, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on हास्य व्यंग्य कविता : माडर्न पत्नी के माडर्न विचार मिलन सिन्हा सावन की सुहानी रात थी पति पत्नी की बात थी कहा, पति ने बड़े प्यार से देखो, प्रिये कल मुझे आफ़िस जल्दी है जाना वहां बहुत काम पड़ा है सब मुझे ही है निबटाना . प्लीज ,जाने मन कल, सिर्फ कल बना लेना अपना खाना इसके लिए मैं तुम्हारा ‘ग्रेटफूल’ रहूँगा आगे […] Read more » माडर्न पत्नी के माडर्न विचार हास्य व्यंग्य कविता
कविता कविता : देश का बजट May 21, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा फिर पेश हुआ देश का बजट । चल भाई हट मत कर खटपट करें काम झटपट क्यों करें हम अपना समय नष्ट फिर पेश हुआ देश का बजट । किसको मिला लाभ हमें न बता किसको होगी हानि हमें है पता गरीबों की नहीं कोई खता फिर भी बढ़ेगा उनका […] Read more » कविता : देश का बजट
कविता घाव समय के May 21, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment अस्तित्व की शाखाओं पर बैठे अनगिन घाव जो वास्तव में भरे नहीं समय को बहकाते रहे पपड़ी के पीछे थे हरे आए-गए रिसते रहे । कोई बात, कोई गीत, कोई मीत या केवल नाम किसी का उन्हें छिल देता है, या यूँ ही मनाने चला आता है — मैं तो कभी रूठा नहीं था […] Read more »
कविता “गुलाब भरा आँगन” May 19, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment सहजता सिमटता हवा का झोंका सहज होनें का करता था भरपूर प्रयास. बांवरा सा हवा का वह झोंका गुलाबों भरे आँगन से चुरा लेता था बहुत सी गंध और उसे तान लेता था स्वयं पर. गुलाब वहां ठिठक जाते थे हवा के ऐसे अजब से स्पर्श से किन्तु हो जाते थे कितनें ही विनम्र मर्म […] Read more » “गुलाब भरा आँगन”
कविता कविता – सुकून शेष नहीं May 17, 2013 / May 17, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment जब सो गयी है मेरे आंगन की तुलसी खूंटे में बंधी गाय सुनाई नहीं देती मुझे चिड़ियों की चहचहाट । इतनी रात गये कई शोर उठते हैं तब दिखते हैं धू-धू जलती झोपड़ियाँ जबकि सामने पक्का मकान हंस रहे होते हैं और कान के परदे फटने लगते हैं बम बिस्फोटों के स्वरों से । तब […] Read more » कविता - सुकून शेष नहीं
कविता कविता : काला पानी का सच May 15, 2013 / May 15, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा काला पानी का सच जो थे राष्ट्रभक्त और स्वतंत्रता सेनानी उन्हें तो उठानी पड़ी थी अनेकानेक परेशानी। भेज देते थे उन्हें बर्बर गोरे अंग्रेज भोगने काला पानी। तथापि, वे सत्याग्रह करते गए बेशक इस क्रम में अनेक मर गए, तो कुछ गुमनामी के अँधेरे में खो गए। लेकिन, देश को यही लोग […] Read more » कविता : काला पानी का सच
कविता हास्य व्यंग्य कविता : पॉपुलर कारपोरेट मंत्र May 13, 2013 / May 13, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा सुबह से हो जाती थी शाम पर, हर दिन रहता था वह परेशान. मामला ओफिशिएल था कुछ -कुछ , कांफिडेंसिएल था. इसीलिए किसी से कुछ न कहता था खुद ही चुपचाप , सबकुछ सहता था. देखी जब मैंने उसकी दशा सुनी गौर से उसकी समस्या, सब कुछ समझ में आ गया . […] Read more » पॉपुलर कारपोरेट मंत्र