कविता अनुवर्त्ती रात December 15, 2012 / December 15, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on अनुवर्त्ती रात विजय निकोर दीवार पर दो घड़ियाँ लगा देने से रात कभी जल्दी नहीं कटती । कोई हादसा नया छोटा-सा, बड़ा-सा ढीठ और बेअदब संतरी-सा कमरे में खड़ा रात को सोने नहीं देता, सरकने नहीं देता । कितने पुराने असम्बद्ध हादसे कि जैसे सारे सोय संतरी जागे, इन आन्तरिक संतरियों की फ़ौज रात को अभित्रस्त […] Read more » अनुवर्त्ती रात
कविता शिखा श्रीवास्तव की कविता : कितनी अजीब है रिश्तों की कहानी… December 13, 2012 / December 13, 2012 by शिखा श्रीवास्तव | Leave a Comment ऐसी है बेईमान रिश्तों की कहानी, ताउम्र बंधन का दंभ भरने वाले रिश्ते, एक ही पल में बदल देते हैं अपना रंग और रूप कितनी अजीब है रिश्तों….। जिन मां-बाप ने पाला-पोसा बेटी को, विवाह की बेला आते ही क्यों कम हो जाता है, उनका हक और अधिकार कितनी अजीब है रिश्तों ….। जिस आंगना […] Read more »
कविता कविता : अजीब है ये जिंदगी भी December 13, 2012 / December 13, 2012 by मनीष जैसल | Leave a Comment अजीब है ये जिंदगी भी अजनबी सी ना जाने क्यों लगती है ज़िन्दगी , मुझ पर हसती सी क्यों लगती हैं ज़िन्दगी, रिश्तों की धुप में हमने देखे हैं कितने साये , किसी को अपना किसी को पराया समझती हैं ज़िन्दगी, पल पल में जुडती है इस ज़िन्दगी की सांसें एक ही पल में मगर […] Read more »
कविता मैं … शीर्षकहीन ! December 10, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on मैं … शीर्षकहीन ! विजय निकोर तुम ! तुम्हारा आना था मेरे लिए जीवनदायी सूर्य का उदित होना, और तुम्हारा चले जाना था मेरे यौवन के वसंतोत्सव में एक अपरिमित गहन अमावस की लम्बी कभी समाप्त न होती विशैली रात । मुझको लगा कि जैसे मैं बिना खिड़्की, किवाड़ या रोशनदान की किसी बंद कोठरी में बंदी थी, और […] Read more » poem by vijay nikor
कविता सम्प्रेषण और भंगिमाएं December 10, 2012 / December 10, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment सम्प्रेषण और भंगिमाएं दोनों की सीमाओं पर सतत निरंतर आँखों का सदा ही बना रहना और पता चल जानें से लेकर प्रकट हो जानें तक की सभी चर्चाओं पर सदा बना रहता है सूर्य. सूर्य के प्रकाश में भावों को भंगिमाओं में बदलनें की ऊर्जा मिलती तो है किन्तु परिवर्तन के इस प्रवाह में सम्प्रेषण […] Read more » . सम्प्रेषण और भंगिमाएं
कविता कविता – उम्र का हिसाब December 8, 2012 / December 8, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment कितने बदल चुके हैं सिकुड़े हुए अंतरिक्ष में मौन तिलक लगाकर मेहराब से टूटता कोई पत्थर कि युगों पुराना अदृश्य हाथ पसीने से सरोबार होकर इसी पत्थर में मेहराब की सर्जना की थी । पहली बार मुझे लगा अंतरिक्ष में दिशाहीन आवेश चेहरे पर आंखें गड़ाये टूकुर-टूकुर देख रहा है उन गोद में बसे […] Read more » poem by motilal कविता - उम्र का हिसाब
कविता जो कह चूका गीत उसे भी न भूल जाओ December 8, 2012 / December 8, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment तुम्हे मेरे सपनो में अब भी देखा करता हूँ कभी भी यहाँ वहाँ पहले की ही तरह अब भी भटका करता हूँ .. नहीं होते हैं चलती साँसों मैं पेंच अब उस तरह के पर हर साँस से मैं गिरते फूलो को थामा करता हूँ.. साँसों से खयालो की डोर अब भी खिचती चली आती […] Read more »
कविता लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में , December 8, 2012 / December 8, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में , अर्थी चड़ी बहुत कन्याये बैठ न पाई डोली में , कितनो ने अपनी कन्यायो के पीले हाथ कराने में कहाँ कहाँ तक मस्तक टेकें आती शर्म बताने में , जिस पर बीती वही जानता ,शब्द नहीं है कहने को , कितनो ने बेचें […] Read more » poem by manish jaiswal लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में
कविता कौन हो तुम ? November 28, 2012 / November 28, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on कौन हो तुम ? विजय निकोर कौन हो तुम ? पहेली-सी आई, पहेली ही रही। बहुत करी थी कोशिश मैंने कि शायद समझ लूँ तुमको बातों से ….. आँखों से, पास से ….. या दूर से, पर मेरे लिए अभी तक तुम परिच्छन्न पहेली ही रही हो । कुछ ऐसा लगता है तुम कभी जाड़े की किरणों की […] Read more »
कविता बच्चों का पन्ना क्म्प्यूटर पर चिड़िया November 27, 2012 / November 26, 2012 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 1 Comment on क्म्प्यूटर पर चिड़िया बहुत देर से कम्प्यूटर पर, बैठी चिड़िया रानी| बड़े मजे से टाईप कर रही, थी कोई बड़ी कहानी|| तभी अचानक चिड़िया ने ,जब गर्दन जरा घुमाई| किंतु न जाने किस कारण,वह जोरों से चिल्लाई|| कौआ भाई फुदक फुदक कर,शीघ्र वहां पर आये| तुम्हें क्या हुआ बहिन चिरैया, कौआजी घबराये|| चिड़िया बोली पता […] Read more » क्म्प्यूटर पर चिड़िया
कविता नदी का परिचय November 26, 2012 / November 26, 2012 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on नदी का परिचय गहराती हुई नदी में बन रहे थे पानी के बहुत से व्यूह नदी के किनारों की मासूमियत पड़ी हुई थी छिटकी बिटकी यहाँ वहां जहां बहुत से केकड़े चले आते थे धुप सेकनें. किनारों पर अब भी नहीं होता था व्यूहों का या गहराईयों का भान पर नदी थी कि हर पल अपना परिचय देना […] Read more »
कविता कविता – उसे चुनना है November 24, 2012 / November 24, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मैं अंतरिक्ष में भटक रहा हूँ पिंजरे में कैद मात्र शून्य की तरह लचीली रेखा भी मेरे साथ घुम रही है मैं आश्वस्त हूँ सभी बंद रास्तों के बावजूद महाशून्य मेरी आंखों में नहीं उतरा है । मेरे समझ से मैं उस काल में अस्त हो रहा हूँ जहाँ दिशाएं निर्वाण की तरह लटकने […] Read more » poem by motilal कविता - उसे चुनना है