लेख इंटरनेट के दौर में कम हो रही है पठनीयता ! January 10, 2025 / January 10, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment सुनील कुमार महला आज सोशल मीडिया का दौर है। सूचना क्रांति के इस दौर में आज पठनीयता का अभाव हो गया है। आज से दस-बीस बरस पहले लोग जितने अखबार और पत्र-पत्रिकाएं पढ़ा करते थे, आज शायद उतना कोई नहीं पढ़ता है। पुस्तकालय में जाकर तो आज कोई व्यक्ति पुस्तक, पत्रिका या अखबार इश्यू करवाकर […] Read more » Readability is decreasing in the Internet era इंटरनेट के दौर में पठनीयता
लेख हिंदी दिवस वैश्विक भाषा बन रही हिंदी January 10, 2025 / January 10, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल वर्तमान संदर्भों में कहें तो आज हम ऐसे देश में रह रहे हैं जिसमें हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान पर सबसे ज्यादा जोर है। हिंदू संस्कृति और सनातनी सभ्यता पिछले कुछ समय से रोज ही हवा में तैरती दिखाई दे जाती हैं । हालांकि सच यह भी है कि संवैधानिक रूप से आज भी […] Read more »
लेख सामूहिक भागीदारी से आदर्श गांव का निर्माण संभव है January 10, 2025 / January 10, 2025 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment सुमनअजमेर, राजस्थान किसी भी देश के विकास की संकल्पना केवल महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों की संख्या से ही नहीं होती है बल्कि इसमें गांव की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है. विशेषकर ऐसा गांव जिसे आदर्श गांव की संज्ञा दी जा सके. एक आदर्श गांव वह है जहां लोगों को बुनियादी सुविधाएं, सामाजिक सद्भाव, शिक्षा और […] Read more » आदर्श गांव का निर्माण
राजनीति लेख हर वक्त महाविनाशकारी भूकम्प का खतरा January 9, 2025 / January 9, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment जयसिंह रावतनये साल के पहले ही सप्ताह तिब्बत के शिगात्से क्षेत्र में लगभग 7 परिमाण का भूचाल आता है और उसके भय के झटके उत्तर भारत और खास कर हिमालयी राज्यों में महसूस किये जाते हैं। यह भूकंप उत्तर भारत और खास कर हिमालयी राज्यों के लिए एक चेतावनी है। भूकम्प का खौफ हिमालयी राज्यों […] Read more » There is always a threat of a devastating earthquake महाविनाशकारी भूकम्प का खतरा
लेख स्वास्थ्य-योग नए वायरस पर सतर्कता और जागरूकता जरूरी? January 9, 2025 / January 9, 2025 by रमेश ठाकुर | Leave a Comment डॉ. रमेश ठाकुर चाइना की धरती से निकलकर दुनिया में कोहराम मचाने वाले जानलेवा वायरस बेकसूर इंसानों का पीछा करना कभी छोड़ेंगे या नहीं? क्योंकि प्रत्येक खतरनाक वायरसों का केंद्र चीन ही होता है? कोविड-19 के बाद एक ऐसी अबूझ पहेली है जिसे न डब्ल्यूएचओ सुलझा पाया और न ही दुनिया की तमाम चिकित्सा रिसर्च […] Read more » वायरस पर सतर्कता और जागरूकता
लेख समाज स्वास्थ्य-योग परंपरागत एवं आधुनिक चिकित्सा में समन्वय की जरूरत January 9, 2025 / January 9, 2025 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग-एक और नये चीनी वायरस ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (एचएमपीवी) के संक्रमण के उपचार को लेकर दुनिया भारत की प्राचीन प्राकृतिक व परंपरागत चिकित्सा पद्धति की ओर आशाभरी निगाहों से देख रही है, क्योंकि मानव इतिहास की सबसे बड़ी एवं भयावह महामारी कोरोना के निदान में भी उसकी भूमिका प्रभावी एवं कारगर रही है। निस्संदेह, आधुनिक […] Read more » Need for coordination between traditional and modern medicine परंपरागत एवं आधुनिक चिकित्सा
लेख स्वास्थ्य-योग ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस को मात दे पायेगा भारत ? January 8, 2025 / January 8, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment भारत को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पहलों के माध्यम से निगरानी, निदान और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करके मानव मेटान्यूमोवायरस जैसे उभरते वायरल खतरों से निपटने के लिए अपने नियामक ढांचे को बढ़ाना चाहिए। वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ-साथ वैक्सीन और एंटीवायरल अनुसंधान में निवेश से ऐसे प्रकोपों को कम करने में मदद मिलेगी। कमजोर […] Read more » ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस
लेख शख्सियत युवाओं के प्रेरणास्त्रोत – स्वामी विवेकानंद January 8, 2025 / January 8, 2025 by कुमार कृष्णन | Leave a Comment कुमार कृष्णन स्वामी विवेकानन्द संभवतः भारत के एकमात्र ऐसे संत हैं जो अध्यात्म, दर्शन और देशभक्ति जैसे गंभीर गुणों के साथ-साथ युवा शक्ति के भी प्रतीक हैं। उनकी छवि भले ही एक धर्मपुरूष और कर्मयोगी की है किन्तु उनका वास्तविक उद्देश्य अपने देश के युवाओं को रचनात्मक कर्म का मार्ग दिखाकर विश्व में भारत के […] Read more »
लेख क्या मानवीय गतिविधियों का परिणाम हैं भूकंप ? January 8, 2025 / January 8, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment सुनील कुमार महला भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है, जो बहुत बार बड़े जान-माल के नुकसान का कारण बनती है। भूकंप पृथ्वी के स्थलमंडल या इसके ऊपरी मेंटल में ऊर्जा के अचानक मुक्त होने के कारण आते हैं। गौरतलब है कि भूकंप के तीन मुख्य प्रकार होते हैं, जिनमें क्रमशः टेक्टोनिक, ज्वालामुखीय और पतन भूकंपों को […] Read more » Are earthquakes the result of human activities भूकंप
लेख यूनियन कार्बाइड कचरा फसलों और जलस्त्रोत को प्रदूषित कर सकता है January 8, 2025 / January 8, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment शादाब सलीम यूनियन कार्बाइड का कचरा इंदौर के निकट पीथमपुर में लाकर नष्ट किया जाएगा। भोपाल गैस त्रासदी मानवीय भूल पर होने वाली सज़ा का शिखर है। किसी भी मानवीय भूल पर इससे बड़ी और विकराल सज़ा विश्व के इतिहास में कहीं भी नहीं हुई है। पूर्व प्रधानमंत्री एवं इंजीनियरिंग के छात्र रहे राजीव गांधी […] Read more » यूनियन कार्बाइड कचरा
आर्थिकी लेख अमेरिकी आर्थिक नीतियां अन्य देशों को विपरीत रूप से प्रभावित कर सकती है January 8, 2025 / January 8, 2025 by प्रह्लाद सबनानी | Leave a Comment वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अन्य देशों की मुद्राओं की कीमत अमेरिकी डॉलर की तुलना में गिर रही है। इससे, विशेष रूप से विभिन्न वस्तुओं का आयात करने वाले देशों में वस्तुओं के आयात के साथ मुद्रा स्फीति का भी आयात हो रहा है। इन देशों में मुद्रा स्फीति बढ़ती जा रही है और इसे नियंत्रित करने के उद्देश्य से एक बार पुनः ब्याज दरों में वृद्धि की सम्भावना भी बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए के अवमूल्यन को रोकने के लिए भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में से लगभग 5,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर को बेचना पड़ा है जिससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अपने उच्चत्तम स्तर 70,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से घटकर 65,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के भी नीचे आ गया है। अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने के चलते विश्व के लगभग सभी देशों की यही स्थिति बनती हुई दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, अमेरिका में बजटीय घाटा एवं बाजार ऋण की राशि अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई है एवं अमेरिका को इसे नियंत्रित करने के लिए अपनी आय में वृद्धि करना एवं व्यय को घटाना आवश्यक हो गया है। परंतु, 20 जनवरी 2025 को डॉनल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति बनते ही सम्भव है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा आयकर में भारी कमी की घोषणा की जाय। डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने चुनावी भाषण में इसके बारे में इशारा भी किया था। हां, सम्भव है कि आयकर को कम करने के चलते कुल आय में होने वाली कमी की भरपाई अमेरिका द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में वृद्धि कर इसके निर्यात में वृद्धि एवं अमेरिका में विभिन्न वस्तुओं के अमेरिका में होने वाले आयात पर कर में वृद्धि करने के चलते कुछ हद्द तक हो सके। परंतु, कुल मिलाकर यदि आय में होने वाली सम्भावित कमी की भरपाई नहीं हो पाती है तो अमेरिका में बजटीय घाटा एवं बाजार ऋण की राशि में अतुलनीय वृद्धि सम्भव है। जो एक बार पुनः अमेरिका में मुद्रा स्फीति को बढ़ा सकता है और फिर से अमेरिका में ब्याज दरों में कमी के स्थान पर वृद्धि देखने को मिल सकती है। पूरे विश्व में पूंजीवादी नीतियों के चलते मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से विभिन्न देशों द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की घोषणा की जाती रही है। किसी भी देश में मुद्रा स्फीति की दर यदि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि के चलते बढ़ रही है तो इसे ब्याज दरों में वृद्धि कर नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है। हां, खाद्य पदार्थों की बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर जरूर मुद्रा स्फीति को तुरंत नियंत्रण में लाया जा सकता है। अतः यह मांग की तुलना में आपूर्ति सम्बंधी मुद्दा अधिक है। उत्पादों की मांग में कमी करने के उद्देश्य से बैंकों द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की जाती है, जिससे ऋण की लागत बढ़ती है और इसके कारण अंततः विभिन्न उत्पादों की उत्पादन लागत बढ़ती है। उत्पादन लागत के बढ़ने से इन उत्पादों की मांग बाजार में कम होती है जो अंततः इन उत्पादों के उत्पादन में कमी का कारण भी बनती है। उत्पादन में कमी अर्थात बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा कर्मचारियों की छँटनी करने के परिणाम के रूप में भी दिखाई देती है। हाल ही के वर्षों में अमेरिका में जब मुद्रा स्फीति की दर पिछले लगभग 50 वर्षों के उच्चत्तम स्तर पर अर्थात 10 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई थी, तब फेडरल रिजर्व द्वारा फेड दर (ब्याज दरों) को भी 0.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत तक लाया गया था, और यह दर लम्बे समय तक बनी रही थी। इसका प्रभाव, अमेरिका की सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य कर रही कम्पनियों पर अत्यधिक विपरीत रूप में पड़ता दिखाई दिया था और लगभग 2 लाख इंजीनियरों की छँटनी इन कम्पनियों द्वारा की गई थी। अतः मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में लाने के उद्देश्य से ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करने का निर्णय अमानवीय है एवं इसे उचित निर्णय नहीं कहा जा सकता है। ब्याज दरों में वृद्धि करने का परिणाम वैश्विक स्तर पर कोई बहुत अधिक सफल भी नहीं रहा है। अमेरिका को मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में लाने के लिए लगभग 3 वर्ष(?) का समय लग गया है और यह इस बीच ब्याज दरों को लगातार उच्च स्तर पर बनाए रखने के बावजूद सम्भव नहीं हो पाया है। भारत में भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से रेपो दर (ब्याज दर) में पिछले लगभग 22 माह तक कोई परिवर्तन नहीं किया गया था एवं इसे उच्च स्तर पर बनाए रखा गया था जिसका असर अब भारत के आर्थिक विकास दर पर स्पष्ट: दिखाई दे रहा है एवं वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही में भारत में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर गिरकर 5.2 प्रतिशत रही है, जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में 8.2 प्रतिशत की रही थी। आर्थिक विकास दर में वृद्धि दर का कम होना अर्थात देश में रोजगार के कम अवसर निर्मित होना एवं नागरिकों की आय में वृद्धि की दर का भी कम होना भी शामिल रहता है। अतः लंबे समय तक ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर नहीं बनाए रखा जाना चाहिए। यह सही है कि मुद्रा स्फीति को एक दैत्य की संज्ञा भी दी जाती है और इसका सबसे अधिक विपरीत प्रभाव गरीब वर्ग पर पड़ता है। अतः किसी भी देश के लिए इसे नियंत्रण में रखना अति आवश्यक है। परंतु, मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने हेतु लगातार ब्याज दरों में वृद्धि करते जाना भी अमानवीय कृत्य है। ब्याज दरों में वृद्धि की तुलना में विभिन्न उत्पादों की बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर मुद्रा स्फीति को तुरंत नियंत्रण में लाया जा सकता है। विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए। आपूर्ति बढ़ाने के प्रयासों में इन उत्पादों के उत्पादन में वृद्धि करना भी शामिल होगा, कम्पनियों द्वारा उत्पादन में वृद्धि करने के साथ साथ रोजगार के नए अवसरों का निर्माण भी किया जाएगा। इस प्रकार के निर्णय देश की अर्थव्यवस्था के लिए हितकारी एवं लाभदायक साबित होंगे। अमेरिका द्वारा आर्थिक क्षेत्र से सम्बंधित की जा रही विभिन्न घोषणाओं जैसे चीन एवं अन्य देशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं पर आयात कर में 60 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि करना, अमेरिका पर लगातार बढ़ रहे ऋण को कम करने हेतु किसी भी प्रकार के प्रयास नहीं करना, अमेरिकी बजटीय घाटे का लगातार बढ़ते जाना, विदेशी व्यापार के क्षेत्र में व्यापार घाटे का लगातार बढ़ते जाना, विभिन्न देशों द्वारा डीडोलराईजेशन के प्रयास करना आदि ऐसी समस्याएं हैं जिनका हल यदि शीघ्र ही नहीं निकाला गया तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ साथ अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगी। प्राचीन भारत के इतिहास में मुद्रा स्फीति जैसी परेशानियों का जिक्र नहीं के बराबर मिलता है। भारतीय आर्थिक दर्शन के अनुसार भारत में उत्पादों की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता रहां है अतः वस्तुओं की बढ़ती मांग के स्थान पर बाजार में वस्तुओं की आपूर्ति ही अधिक रही है। ग्रामीण इलाकों में 50 अथवा 100 ग्रामों के क्लस्टर के बीच हाट (बाजार) लगाए जाते थे जहां स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुओं/उत्पादों/खाद्य पदार्थों को बेचा जाता था। स्थानीय स्तर पर निर्मित की जा रही वस्तुओं को स्थानीय बाजार में ही बेचने से इन वस्तुओं के बाजार मूल्य सदैव नियंत्रण में ही रहते थे। अतः वस्तुओं की मांग की तुलना में उपलब्धता अधिक रहती थी। कई बार तो उपलब्धता का आधिक्य होने के चलते इन वस्तुओं के बाजार में दाम कम होते पाए जाते थे। इस प्रकार मुद्रा स्फीति जैसी समस्याएं दिखाई नहीं देती थीं। जबकि वर्तमान में, विभिन्न देशों के बाजारों में विभिन्न उत्पादों की उपलब्धता पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है, इन वस्तुओं की मांग बढ़ने से इनकी कीमतें बढ़ने लगती हैं, और, इन कीमतों पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से यह प्रयास किया जाने लगता है कि किस प्रकार इन वस्तुओं की मांग बाजार में कम की जाय, इसे एक नकारात्मक निर्णय ही कहा जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर अर्थशास्त्र के वर्तमान सिद्धांत (मॉडल) विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं को हल करने के संदर्भ में बोथरे साबित हो रहे हैं। इसलिए अमेरिकी एवं अन्य विकसित देशों के अर्थशास्त्री आज साम्यवादी एवं पूंजीवादी सिद्धांतों (मॉडल) के स्थान पर वैश्विक स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में आ रही विभिन्न समस्याओं के हल हेतु एक तीसरे रास्ते (मॉडल) की तलाश करने में लगे हुए हैं और इस हेतु वे भारत की ओर बहुत आशाभारी नजरों से देख रहे हैं। प्राचीन भारतीय आर्थिक दर्शन इस संदर्भ में निश्चित ही वर्तमान समय में आ रही विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं के हल में सहायक एवं लाभकारी सिद्ध हो सकता है। प्रहलाद सबनानी Read more » अमेरिकी आर्थिक नीतियां
लेख स्वास्थ्य-योग ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस: फिर से चिंता में डूबी दुनिया। January 8, 2025 / January 8, 2025 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस, न्यूमोविरिडे परिवार का हिस्सा है, यह एक श्वसन वायरस है जो हल्की सर्दी से लेकर निमोनिया और ब्रोंकियोलाइटिस जैसे गंभीर फेफड़ों के संक्रमण तक की बीमारियों का कारण बनता है। हालाँकि फ्लू या रेस्पिरेटरी सिन्सिटियल वायरस की तुलना में कम पहचाना जाने वाला, ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस दुनिया भर में श्वसन सम्बंधी बीमारियों का एक […] Read more » Human metapneumovirus ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस