कविता
बटुये में दाल
/ by प्रभुदयाल श्रीवास्तव
प्रभुदयाल श्रीवास्तव दाल खदबदाएगी,खूब महक आएगी।मन मयूर नाचेगा,नाक बहक जाएगी।खुशियों से मत पूछो,क्या होगा हाल।शम्मी ने मोहन ने,रम्मी ने खाई है।अम्मा को बापू को,बहुत- बहुत भाई है।दादी के हाथों की,अमृत सी दाल।ऐसी ये दाल गरम,थाल सजा देती है।चांवल में घी के संग,बहुत मजा देती है।जैसे मिल बैठे हों,सुर के संग ताल।
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