व्यंग्य व्यंग्य/ रब्बा, विवाद दे खाद दे May 4, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम वे धर्म-निरपेक्ष देश में धर्म के नाम पर हुए दंगा ग्रस्त क्षेत्र का दौरा करते सिसकते धारा 144 लगे हुए चौक पर से गुजर रहे थे कि चौक पर दोनों हाथ आसमान की ओर किए किसीके दहाड़े मार मार रो कुछ मांगने की आवाज ने उनके पांव रोक दिए, ‘या रब्ब! चढ़ादे मुझे […] Read more » vyangya व्यंग्य
आलोचना देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास May 3, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास जगदीश्वर चतुर्वेदी• तुलसीदास ने अभिव्यक्ति की शैली के तौर पर रामचरित मानस में वायनरी अपोजीशन की पद्धति का कई प्रसंगों में इस्तेमाल किया है। इस क्रम में रावण और राम दोनों के गुण और अवगुणों की प्रस्तुति को रखा जा सकता है। रावण का राम के प्रत्येक कार्य और अवस्था में विपक्ष में रहना, मन्दोदरी […] Read more » Tulsidas तुलसीदास देरिदा
आलोचना हिन्दी बुद्धिजीवियों का फिलीस्तीन के प्रति बेगानापन April 30, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी एक जमाना था हिन्दी में साहित्यकारों और युवा राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं में युद्ध विरोधी भावनाएं चरमोत्कर्ष पर हुआ करती थीं, हिन्दीभाषी क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में युद्ध विरोधी गोष्ठियां, प्रदर्शन, काव्य पाठ आदि के आयोजन हुआ करते थे, किंतु अब यह सब परीकथा की तरह लगता है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों में अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सरोकारों […] Read more » Filistan फिलीस्तीन हिंदी बुद्धिजीवी
आलोचना कार्ल मार्क्स के बहाने रामचरित मानस की यात्रा April 27, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 4 Comments on कार्ल मार्क्स के बहाने रामचरित मानस की यात्रा मार्क्सवादी नजरिए से प्राचीन साहित्य की यह सार्वभौम विशेषता है कि इसमें मनुष्य के उच्चतर गुणों का सबसे सुंदर वर्णन मिलता है। उच्चतर गुणों के साथ ही साथ मानवीय धूर्तताओं, कांइयापन और वैचारिक कट्टरता के भी दर्शन होते हैं। देवता की सत्ता के बारे में विविधतापूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। प्राचीन साहित्य की महान् कालजयी रचनाएं […] Read more » Karl Marx कार्ल मार्क्स रामचरितमानस
आलोचना मूल्यांकन के पोंगापंथी मॉडल के परे हैं तुलसीदास April 24, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on मूल्यांकन के पोंगापंथी मॉडल के परे हैं तुलसीदास परंपरा और इतिहास के नाम पर हिन्दी का समूचे विमर्श के केन्द्र में तुलसीदास के मानस को आचार्य शुक्ल ने और कबीर को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आधार बनाया। सवाल किया जाना चाहिए कि क्या दलित-स्त्री-अल्पसंख्यकों के बिना धर्मनिरपेक्ष आलोचना संभव है? कबीर के नाम पर द्विवेदीजी की आलोचना दलित साहित्य को साहित्य में […] Read more » Ramcharitmanas तुलसीदास रामचरितमानस
आलोचना रामचरितमानस के नए पैराडाइम की तलाश में April 23, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment रामचरितमानस लोक-महाकाव्य है। इसके उपयोग और दुरूपयोग की अनंत संभावनाए हैं।लोक-महाकाव्य एकायामी नहीं बल्कि बहुआयामी होता है, इसमें एक नहीं एकाधिक विचारधाराएं होती हैं। इसका पाठ संपूर्ण और बंद होता है किंतु अर्थ-संरचनाएं खुली होती हैं, इसके पाठ की स्वायत्तता पाठ की व्याख्या की समस्त धारणाओं के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है। लोक-महाकाव्य […] Read more » Ramcharitmanas रामचरितमानस
आर्थिकी व्यंग्य व्यंग्य/ हम जिंदा हैं मेरे भाई! April 22, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ हम जिंदा हैं मेरे भाई! सौ चूहे खाकर शान से पास बैठी बिल्ली ने नजरें मटकाते कहा, ‘हज करने जा रही हूं। हैप्पी जरनी नहीं कहोगे?’ तो मैंने मन ही मन मुसकाते कहा, ‘एक तो सौ चूहे खाकर बिल्ली हज करने नहीं जा सकती और जाएगी तो हज में नहीं पहुंच पाएगी। कहीं और ही पहुंचेगी।’ ‘क्यों?’ ‘उसका पेट भारी […] Read more » vyangya व्यंग्य
कविता एक गीत/तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! April 22, 2010 / December 24, 2011 by फ़िरदौस ख़ान | Leave a Comment तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गई होंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई राधा कुंज भवन में जैसे सीता खड़ी हुई उपवन में खड़ी हुई थी सदियों से मैं थाल सजाकर मन-आंगन में जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई होंठ हिले तक नहीं, […] Read more » song
साहित्य भारतीयता बचाने के लिये भारतीय भाषाओं में जीना अनिवार्य April 17, 2010 / December 24, 2011 by विश्वमोहन तिवारी | 6 Comments on भारतीयता बचाने के लिये भारतीय भाषाओं में जीना अनिवार्य किसी भी राष्ट्र की संस्कृति उसकी भाषा, संगीत, नृत्य, खानपान, पहनावा तथा धर्म में निहित होती है, भाषा के द्वारा वह पनपती है, अन्यथा वानर भी हमारे ही तरह सुसंस्कृत होते.संस्कार जन्म से ही पडना प्रारम्भ हो जाते हैं.बालक व्यवहार की नकल करता है तथा भाषा द्वारा, अभिव्यक्ति करने से भी अधिक महत्वपूर्ण, जीवन का […] Read more » hindi भारतीय भाषा भारतीयता हिंदी
व्यंग्य व्यंग्य/ चल यार! जिंदगी में कुछ तो बना April 15, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | 4 Comments on व्यंग्य/ चल यार! जिंदगी में कुछ तो बना उस वक्त सुबह के सात की बजे ही सूरज घरवाली की तरह सिर पर चढ़ आया था। चारपाई पर पड़े पड़े योगा करके हटा ही था कि मोबाइल की घंटी बज उठी। पड़ोसी का ही होगा। वही बेचारा हर सुबह परेषानी में उठता है और रात को परेशानी में ही सो जाता है। मोबाइल उठाया […] Read more » vyangya व्यंग्य
आलोचना लोकतांत्रिक आलोचना का परिवेश April 13, 2010 / December 24, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment आंतरिक गुलामी से मुक्ति के प्रयासों के तौर पर तीन चीजें करने की जरूरत है, प्रथम, व्यवस्था से अन्तर्ग्रथित तानेबाने को प्रतीकात्मक पुनर्रूत्पादन जगत से हटाया जाए, दूसरा, पहले से मौजूद संदर्भ को हटाया जाए, यह हमारे संप्रेषण के क्षेत्र में सक्रिय है। तीसरा, नए लोकतांत्रिक जगत का निर्माण किया जाए जो राज्य और आधिकारिक […] Read more » Criticism जगदीश्वर चतुर्वेदी लोकतांत्रिक आलोचना
व्यंग्य व्यंग्य/ क्या बोलूं क्या बकवास करूं April 13, 2010 / December 24, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment जबसे दुनियादारी को समझने लायक हुआ था थोड़ा-थोड़ा करके मरता तो रोज ही था पर माघ शुक्ल द्वितीय को, चार सवा चार के आसपास सरकारी अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े पता नहीं किस गोली का असर हुआ कि मैं रोज-रोज के मरने से छूट गया और सच्ची को मर गया। हा! हा! हा!! अब बंदा […] Read more » vyangya अशोक गौतम व्यंग्य