दोहे विश्वास ना निज स्वत्व में ! March 26, 2019 / March 27, 2019 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment विश्वास ना निज स्वत्व में, अस्तित्व के गन्तव्य में; ना भरोसा जाया है जो, ले जाएगा ले दिया जो ! बुद्धि वृथा ही लगा कर, आत्मा की बिन पहचान कर; ना नियंता को जानते, ना सृष्टि की गति चीन्हते ! आखेट वे करते फिरे, आक्रोश में झुलसे रहे; बिन बात दूजों को हने, वे स्वयं के भी कब रहे ! राहों को वे मुश्किल किए, राहत किसी को कब दिए; चाहत किसी की कहँ लखे, व्याहत हुए बिन रब तके ! ‘मधु’ की महक औ ठुमक में, रचना के रस की ललक में; वे सहज हो पाए नहीं, आ स्वयम्भू की गोद में ! Read more »
कविता होली में क्या क्या होना चाहिए March 26, 2019 / March 27, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment होली में जब तक हलवाई ना हो |देशी घी की मिठाई बनाई ना हो ||गर्म गर्म भांग के पकोड़े ना हो |उन पर चटनी की लाग लगाई ना हो ||तब तक होली क्या होली है ?वर्ना रंगों के साथ ठठोली है || होली में जब तक रंग गुलाल ना हो |खेलने वालो के दिल में […] Read more » Poem on Holi होली
व्यंग्य इलेक्शन की माउथ स्ट्राइक March 26, 2019 / March 26, 2019 by प्रभुनाथ शुक्ल | Leave a Comment प्रभुनाथ शुक्ल होली रंग और मन मिजाज का त्यौहार है। क्योंकि अपना देश भी रंगीला है। यहां की हर बात निराली है। होली और चुनाव में चोली-दामन का साथ है। दोनों उमंग, उन्माद, उत्साह, उम्मीद, रंग-भंग, दबंग, मृदंग और हुड़दंग के महामिश्रण से निर्मित हैं। होली में छेड़छाड़ के एक सौ एक गुनाह माफ है। गुलाल लगाने के बहाने कुछ […] Read more » माउथ स्ट्राइक
लेख है अंधेरी रात, पर दीवा जलाना कब मनाना है March 24, 2019 / March 24, 2019 by अरुण तिवारी | 1 Comment on है अंधेरी रात, पर दीवा जलाना कब मनाना है अरुण तिवारीकरोङों हिंदुस्तानियों की तरह नाना ने भी सूखे का संत्रास देखा; आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवार वालों के दर्द भरे साक्षात्कार सुने। मैने भी सुने। मेरी हमदर्दी कलम तक सीमित रही, किंतु नाना ने कहा कि टेलीविजन पर देखे दृश्यों से उनका दम घुटने लगा; उनकी नींद उङ गई। उन्होने सोचा – ”जो […] Read more »
कविता अब तो पुराने दिन याद कर लेते है | March 14, 2019 / March 14, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment अब तो पुराने दिन याद कर लेते है |अपनी ख्वासियो के चराग बुझा देते है || कभी सोलह आने स्वपन सच होते थेअब तो एक आने भी सच नहो होते है || बस अब तो मन मसोस कर रह जाते है |फिर से पुरानी यादे ताजा कर लेते है || पहले समय में पुडिया में […] Read more » अब तो पुराने दिन याद कर लेते है |
कविता साहित्य इलेक्शन आ गया… !! March 13, 2019 / March 13, 2019 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment चुनावी चकल्लस पर पेश है खांटी खड़गपुरिया कविता… इलेक्शन आ गया… !! समझा मत मैं समझ गियाइलेक्शन आ गियादामी गाड़ी घूम रहाकैडर लोग झूम रहाअफिसर लोग सुंघ रहानेता लोग चूम रहागरीब लोग खट रहाकपड़ा – साड़ी बंट रहाफोकट का चा – सिंघाड़ालड़का लोग कूट रहासमझा मत मैं समझ गियाइलेक्शन आ गिया————————— Read more »
कहानी साहित्य मां तुझे सलाम March 12, 2019 / March 12, 2019 by अल्का श्रीवास्तव | 1 Comment on मां तुझे सलाम र “इक़बाल भाई! ये देखो अमन की चिट्ठी आई है। ज़रा पढ़कर बताना तो, क्या लिखा है उसने? वह होली पर घर तो आ रहा है न? कहीं पिछली बार की तरह इस बार भी उसकी छुट्टियां रद्द तो नहीं हो गयीं?” कमला देवी एक साँस में बोलती चली गयीं। “अरे कमला बहन! अमन होली वाले […] Read more »
कविता आ गया है बुढ़ापा March 12, 2019 / March 12, 2019 by आर के रस्तोगी | 1 Comment on आ गया है बुढ़ापा आ गया है बुढ़ापा,शरीर अब चलता नहीं |चेहरा जो गुलाब था,वह अब खिलता नहीं || हो गयी आँखे कमजोर,अब दिखता नहीं |काँपने लगे है हाथ,अब लिखा जाता नहीं || हो गये है कान कमजोर,अब सुना जाता नहीं |लगा लिया चश्मा भी,उससे काम चलता नहीं || टूट गये सभी दाँत,अब खाना खाया जाता नहीं |लगा लिया […] Read more » आ गया है बुढ़ापा
कहानी अनिका एक पहेली March 12, 2019 / March 12, 2019 by विजय हरित | Leave a Comment कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा घटित होता है जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। मैं हॉस्पिटल अपने एक परिचित को देखने गया था, परिचित को देखने के बाद मैं थोड़ी देर के लिए रिसेप्शन के सामने एक कुर्सी पर बैठ गया, तभी मुझे डॉक्टर से बात करती एक लड़की दिखाई थी, जो बेहद सिंपल […] Read more » अनिका
कविता नारी तू है एक ,पर तेरे रूप है अनेक March 11, 2019 / March 11, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment –आर के रस्तोगी नारी तू है एक,पर तेरे नाम है अनेक \ विद्या की दायनी सरस्वती कहलाती तू धन की दायनी लक्ष्मी भी कहलाती mनारी तू है एक,पर तेरे नाम है अनेक जब तू सुबह सुबह आती उषा कहलातीrr जब तू शाम को जाती संध्या है बन जाती कैसे तू दोनों टाइम बन जाती है […] Read more » नारी तू है एक पर तेरे रूप है अनेक
व्यंग्य उपानह प्रहार का हाईप्रोफाइल प्रचलन March 11, 2019 / March 11, 2019 by भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment अस्त्र और शस्त्र में अन्तर को लेकर काफी अरसे से जानकारों द्वारा अपने-अपने तरीके से व्याख्यान दिये जाते रहे हैं। फागुन के महीने में जब लोग मस्ती के मूड में रहते हैं तब विश्लेषक अस्त्र और शस्त्र के उदाहरण के रूप में हर घर की रसोई में उपलब्ध बेलन का जिक्र किया करते हैं। गुझिया, […] Read more »