कविता शिक्षक दिवस September 6, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment माँ ही मेरी पहली शिक्षक है क्यों न उसे मै शीश निवाऊ पढ़ा लिखा कर बड़ा किया है क्यों न शिक्षक दिवस मनाऊ पहले जैसे गुरु नही अब रहे पहले जैसी नहीं अब दीक्षा पहले जैसे शिष्य नहीं रहे पहले जैसे नहीं अब शिक्षा गुरु शिष्य में पहले जैसा अब रहा नहीं अब नाता समय […] Read more » गुरु माँ शिक्षक दिवस शिक्षा दिवस
कविता आज हिंदी भाषा की दशा September 5, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment भाषाओं की डारि पर,हिंदी फल की कैसी चाहत हैं जब छोटे से पौधे को,इंगलिश दी जावत है उत्तर से लेकर दक्षिण तक,केवल भाषा ही एक अदावट है कोई हिंदी को बोलन चाहत है,कोई तमिल बोलन चाहत है हिंदी का कैसे विकास होगा,जब इसको हीन द्रष्टि से देखत जावत है जब बड़े नेता अपने बच्चो को,इंगलिश […] Read more » अंग्रेजी भाषा आज हिंदी भाषा की दशा तमिल
व्यंग्य पति की अभिलाषा September 5, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment सुन्दर डीपी लगा रखी है मोहतरमा अब तो चाय पिला दें सुबह उठते से ही देखो की है तारीफ़ अब तो चाय पिला दें सोच रखा है छुट्टी का दिन सारा आराम करके गुजार दूँगा चाय पीके सो जाऊंगा, कहीं वो शॉपिंग की याद न दिला दें हफ़्ते भर की थकान मीठी नींद, भीने सपनो […] Read more » पति की अभिलाषा शॉपिंग सुन्दर डीपी
गजल जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई September 4, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment रूपेश जैन ‘राहत जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई दफ़्तरी से हुए वाबस्ता तो आवारगी चली गई शौक़ अब रहे न कोई ज़िंदगी की भागदौड़ में दुनियाँ के दस्तूर में मिरि कुशादगी चली गई ज़िम्मेदारियों का वज़न ज्यूँ बढ़ता चला गया ईमान पीछे छूट गया और शर्मिंदगी चली गई भागते भागते दौलतें न […] Read more » आवारगी जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई शर्मिंदगी
कविता क्यों मौन है आवाम September 4, 2018 / September 4, 2018 by डॉ छन्दा बैनर्जी | Leave a Comment – डॉ. छन्दा बैनर्जी जाने अख़बार क्या कहता है, पढ़कर, पूरा आवाम क्यों मौन रहता है ? हां, बस्तर का यही है वह गांव पहचान थी जिसकी, तेंदू और महुआ का छाँव, उल्लास झलकता था जहाँ मांदर की थाप में खुशियां बयान होती थी पहाड़ी मैना के आलाप में … […] Read more » क्यों मौन है आवाम गांव तेंदू महुआ मौत झांकती
गजल मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है September 4, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है उम्र के साथ जिन्दगी के ढंग बदलते देखा है वो जो चलते थे तो शेर के चलने का होता था गुमान उनको भी पाँव उठाने के लिये सहारे के लिये तरसते देखा है जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग उन्ही नजरों को बरसात […] Read more » इंसान एक गजल -मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है पत्तो रोज जमाने
कविता अगर कृष्ण कलयुग में जन्म लेते September 3, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment अच्छा हुआ कृष्ण ने लिया द्वापर के जमाने में वर्ना दुर्गति हो जाती उनकी इस कलयुगी जमाने में अच्चा हुआ कृष्ण ने जन्म नहीं लिया इस जमाने में वर्ना केस लग जाता उनपर गोपियों के फसाने में अच्छा हुआ कृष्ण ने सुदामा के पैर नहीं धोये इस जमाने में वर्ना अखिलेश नाराज हो जाते,यदुवंशी से […] Read more » अखिलेश कृष्ण कलयुग सुदामा
गजल मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था September 3, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था ख़ाहिश-ए-ख़लीक़ इज़हार करना चाहा था धुएँ सी उड़ा दी आरज़ू पल में यार ने मिरि तिरा इस्तिक़बाल शानदार करना चाहा था भले लोगो की बातें समझ न आईं वक़्त पे मैंने तो हर लम्हा जानदार करना चाहा था तिरे काम आ सकूँ इरादा था बस इतना सा तअल्लुक़ आपसे आबदार करना चाहा था इंतिज़ार क्यूँ करें फ़स्ल-ए-बहाराँ सोचकर चमन ये ‘राहत’ खुशबूदार करना चाहा था Read more » ख़ाहिश-ए-ख़लीक़ फ़स्ल-ए-बहाराँ मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था
कविता दास्तां सुन कर क्या करोगे दोस्तों …!! September 3, 2018 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा ————————- बचपन में कहीं पढ़ा था रोना नहीं तू कभी हार के सचमुच रोना भूल गया मैं बगैर खुशी की उम्मीद के दुख – दर्दों के सैलाब में बहता रहा – घिसटता रहा भींगी रही आंखे आंसुओं से हमेशा लेकिन नजर आता रहा बिना दर्द के समय देता रहा जख्म पर जख्म […] Read more » आंसुओं गमों का प्याला दास्तां सुन कर क्या करोगे दोस्तों ...!! शिकवे
कविता भव्य भव की गुहा में खेला किए ! September 3, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment गोपाल बघेल ‘मधु’ भव्य भव की गुहा में खेला किए, दिव्य संदेश सतत पाया किए; व्याप्ति विस्तार हृदय देखा किए, तृप्ति की तरंगों में विभु भाए ! शरीर मन के परे जब धाए, आत्म आयाम सामने आए; समर्पण परम आत्म जब कीन्हे, मुरारी मुग्ध भाव लखि लीन्हे ! झाँकना परा मन से जब आया, […] Read more » भव्य भव की गुहा में खेला किए ! मुरारी मुग्ध समर्पण परम
कविता कान्हा का धाम September 3, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रीति सुराना गोकुल कान्हा का धाम न होता। जग में गौ मां का नाम न होता,.. अमृत मंथन से निकली गौ माते, धर्मशास्त्र हैं यह बात बताते। पूजी जाती है गाय युगों से, संस्कृति यही भारत की सदियों से। धर्म में भी ऐसा काम न होता, गोकुल कान्हा का धाम न होता। जग में गौ […] Read more » अमृत मंथन कान्हा का धाम गोकुल संस्कृति
कविता प्रवक्ता न्यूज़ भगवान कृष्ण के जन्म का आँखों देखा हाल September 3, 2018 / September 3, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment भादों की अष्टमी की रात थी,जब जन्मे कृष्ण मुरारी खुल गई तब बेड़ियाँ सारी,जब जन्मे कृष्ण बनवारी धन्य हुये वासुदेव,ये खुशियाँ जब जीवन में पधारी कंस के अंत की हो गई थी,अब सारी वहाँ तैयारी खुल गए सब ताले झट से,सो गये चौकीदार सारे लेकर कान्हा को फिर वासुदेव आये यमुना किनारे घनघोर घटाये घिरी […] Read more » भगवान कृष्ण के जन्म का आँखों देखा हाल मुरारी यमुना वासुदेव