कविता लहू तो एक रंग है August 4, 2014 / October 8, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- लहू तो एक रंग है, आपस में एक दूसरे से, हो रही क्यों जंग है ? लहू तो एक रंग है, लहू तो एक रंग है। हर तरफ तो शोर है, किस पर किसका जोर है? ढ़ल रही है चांदनी, आने वाली भोर है। रक्त का ही खेल है, रक्त का ही मेल […] Read more » एकता कविता भाईचारा भाईचारा कविता लहू तो एक रंग है
व्यंग्य किसकी आवाज़ बिकाऊ नहीं यहां August 4, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -अंशु शरण- 1. अवसरवाद लोकतन्त्र स्थापना के लिए वो हमेशा से ऐसे लड़ें, कि उखड़े न पाये सामंतवाद की जड़ें, इसलिए तो लोकतंत्र के हर स्तम्भ पर पूंजी के आदमी किये हैं खड़े। किसकी आवाज़ बिकाऊ नहीं यहाँ, संसद से लेकर अख़बार तक, हर जगह दलाल हैं भरे पड़े। तो हम क्यों ना जाये बाहर, […] Read more » किसकी आवाज़ बिकाऊ नहीं यहां व्यंग्य हिन्दी व्यंग्य
लेख साहित्य हिन्दी को न्याय और भारत को स्वत्व की पहचान मिले August 2, 2014 / October 8, 2014 by नरेश भारतीय | Leave a Comment -नरेश भारतीय- हाल में भारत के गृह मंत्रालय ने सरकार और समाज के बीच दूरी को पाटने की क्षमता रखने वाले सामाजिक माध्यम या कथित ‘सोशल मीडिया’ के उपयोग और भारत की राजभाषा हिन्दी के महत्व को रेखांकित करते हुए शासकीय कामकाज में हिन्दी का उपयोग करने के निर्देश जारी किए थे. मेरे जैसे विदेशस्थ […] Read more » भारत की स्वत्व पहचान हिन्दी हिन्दी का न्याय
व्यंग्य वोट देवता जिन्दाबाद August 2, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -विजय कुमार- दिल्ली में ‘नमो सरकार’ बनने से सामाजिक संस्थाओं का रुख भी बदला है। जिस संस्था ने मुझे कभी श्रोता के रूप में बुलाने लायक नहीं समझा, पिछले दिनों उसके सचिव का फोन आया कि स्वाधीनता दिवस पर ‘संभ्रांत’ लोगों की सभा में मुझे भाषण देना है। यह सुनकर मैं डर गया। सम्भ्रान्त (सम्यक […] Read more » वोट वोट देवता वोट देवता जिन्दाबाद वोट व्यंग्य
कविता दूध पीकर, नाग देव प्रसन्न August 2, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’- 1.दूध पीकर, नाग देव प्रसन्न, नाग पंचमी। 2.आओ झूलेँगे, द्वारे नीम सखियां, झूला पड़ा है। 3.बहनें सजीँ, गुड़िया जैसी लगें, गुड़िया पर्व। 4.दंगल लगें, मल्लयुद्ध के लिए, योद्धा तैयार। 5.सजी दुकानें, घूम रहे हैं बच्चे, लगा है मेला। 6.घुघुरी पकी, भर-भरके दोना, सभी चबाएँ। 7.रंग-बिरंगी, धरा पोशाक धारे, गुड़िया पर्व। 8.ऊँची […] Read more » दूध पीकर नाग देव प्रसन्न नाग पंचमी
कविता मेरी नानी का घर August 2, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment –बीनू भटनागर- बहुत याद आता है कभी, मुझे मेरी नानी का घर, वो बड़ा सा आंगन, वो चौड़े दालान, वो मिट्टी की जालियां, झरोखे और छज़्जे। लकड़ी के तख्त पर बैठी नानी, चेहरे की झुर्रियाँ, और आँखों की चमक, किनारी वाली सूती साड़ी, और हाथ से पंखा झलना। नानी की रसोई, लकड़ी चूल्हा और फुंकनी, रसोई में गरम गरम रोटी खाना, वो पीतल के बर्तन , वो काँसे की थाली, उड़द की दाल अदरक वाली, देसी घी हींग, ज़ीरे का छौंक, पोदीने की चटनी हरी मिर्च वाली। खेतों से आई ताज़ी सब्ज़ियां, बहुत स्वादिष्ट होता था वो भोजन। आम के बाग़ और खेती ही खेती। नानी कहती कि, ‘’बाज़ार से आता है, बस नमक वो खेत मे ना जो उगता है।‘’ कुएँ का मीठा साफ़ पानी। और अब पानी के लिये इतने झंझट, फिल्टर और आर. ओ. की ज़रूरत। तीन बैडरूम का फ्लैट, छज्जे की जगह बाल्कनी, न आंगन न छत बरामदे की न कोई निशानी, और रसोई मे गैस,कुकर, फ्रिज और माइक्रोवेव, फिर भी खाने मे वो बात नहीं, ना सब्ज़ी है ताज़ी, किटाणुनाशक मिले हैं, फिर उस पर ,अस्सी नब्बे का भाव। क्या कोई खाये क्या कोई खिलाये। आज नजाने क्यों , नानी का वो घर याद आये। Read more » कविता मेरी नानी का घर हिन्दी कविता
कहानी उतर जा…! August 2, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -क़ैस जौनपुरी- मुंबई की लोकल ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पे रूकी. फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे में फ़र्स्ट क्लास वाले आदमी चढ़ गए. फ़र्स्ट क्लास वाली औरतें अपने डिब्बे में चढ़ गईं. तभी एक नंग-धड़ंग आदमी फ़र्स्ट क्लास लेडीज़ डिब्बे में चढ़ गया. वो शकल से खुश दिख रहा है. उसके दांत और आंखें अन्धेरे में चमक रही […] Read more » उतर जा लघु कथा
कहानी हर कदम पर बंदिशें August 2, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment -अश्वनी कुमार- जाड़ों का समय है सूरज के किरणों ने समुद्र की कोख में जाने का मन बना लिया है. धीरे-धीरे वह अगले दिन फिर से आने का संकेत करती हुई चमक (रोशनी) निरंतर कम होती हुई, संतरी और नीले आसमान से गायब हो रही है. हरियाणा के गांव सुकना के प्रधान के घर आज […] Read more » हर कदम पर बंदिशें हिन्दी कहानी
कविता भ्रष्टाचार है इक मायावी राक्षस August 1, 2014 / August 1, 2014 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment -रवि श्रीवास्तव- भ्रष्टाचार है इक मायावी राक्षस, बन गया इस देश का भक्षक, हर तरफ है ये तो फैला, लड़ा नहीं जा सकता अकेला, बन गया ये तो झमेला, जायेगा न अब ज्यादा झेला, मिलकर सभी दिखाओ जोर, कर तुम इसको कमजोर , तोड़ दो इसकी रीढ़ की हड्डी, बंध न पाए जिसमे पट्टी , कर […] Read more » भ्रष्टचार है इक मायावी राक्षस भ्रष्टाचार पर कविता
कविता रक्षा बंधनः भाई बहन स्नेह August 1, 2014 / August 1, 2014 by बीनू भटनागर | 1 Comment on रक्षा बंधनः भाई बहन स्नेह -बीनू भटनागर- 1 रक्षा बंधन, भाई बहन स्नेह, प्यारा त्योहार। सखी सहेली, सावन की बारिश, अंग भिगोये। 3- हर सिंगार खिलते ही, झड़ते ख़ुशबू फैले। 4- नौका विहार, झील के उस पार, कुमुद खिले। 5 नीढ़ छोड़के पंछी निकले, दूर सांझ लौटेंगे। 6. प्रत्यूष काल, सुनहरा सा जाल, धूप की ज्योति। मंद समीर के […] Read more » भाई बहन स्नेह रक्षा बंधन रक्षा बंधनः भाई बहन स्नेह हिन्दी कविताएं
कविता ये मुट्ठी भर लोग July 28, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment -बीनू भटनागर- इन मुट्ठी भर लोगों के, भड़काने और बहकाने से, क्यों राम के भक्त और अल्लाह के बन्दे, मरने मारने पर, आमदा हो जाते हैं! कभी मुज़्जफ़रनगर तो कभी, सहारनपुर जलाते हैं। चंद नेता और कुछ कट्टरवादी (अ)धार्मिक तत्व, कैसे मजबूर कर देते हैं, अपनो को अपनो का ख़ून बहाने को, सिर्फ इसलियें कि […] Read more » कविता ये मुट्ठी भर लोग हिन्दी कविता
गजल इंसा खुद से ही हारा निकला July 28, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -नवीन विश्वकर्मा- किसके गम का ये मारा निकला ये सागर ज्यादा खारा निकला दिन रात भटकता फिरता है क्यों सूरज भी तो बन्जारा निकला सारे जग से कहा फकीरों ने सुख दुःख में भाईचारा निकला हथियारों ने भी कहा गरजकर इंसा खुद से ही हारा निकला चांद नगर बैठी बुढ़िया का तो साथी कोई न […] Read more » इंसा खुद से ही हारा निकला गजल जीवन गजल