गजल चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है ! March 30, 2014 / September 3, 2018 by भारत भूषण | 3 Comments on चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है ! चारों तरफ हैं रास्ते, हर रास्ते पे मोड़ है ! तुही बता ये जिन्दगी, जाना तुझे किस ओर है !! हर तरफ़ से आवाजें, कोलाहल और शोर है ! कुछ समझ आता नहीं, मंजिल मेरी किस ओर है !! सब के सब बेकल यहाँ , सबके सपनों का जोड़ है ! किसके सपने […] Read more » gazal ग़जल भारत भूषण
कविता व्यंग्य मिक्सिंग और फिक्सिंग March 27, 2014 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on मिक्सिंग और फिक्सिंग -मिलन सिन्हा- उसने पहले ढंग से जाना गेम का सब ट्रिक्स फिर मैच को अच्छे से किया फिक्स जब शोर हुआ तब राजनीति से किया उसे मिक्स पकड़ा गया फिर भी शर्म नहीं किसी बात का कोई गम नहीं क्योंकि उसे मालूम है यहां मैच को करके मिक्स और फिक्स कैसे मारा जाता है सिक्स […] Read more » satire poem on match fixing मिक्सिंग और फिक्सिंग
कविता अहंकार बलिदान बड़ा है, देह के बलिदान से March 27, 2014 by डॉ. मधुसूदन | Leave a Comment -मधुसूदन- मिट्टी में जब, गड़ता दाना, पौधा ऊपर, तब उठता है। पत्थर से पत्थर, जुड़ता जब, नदिया का पानी, मुड़ता है। अहंकार दाना, गाड़ो तो, राष्ट्र बट, ऊपर उठेगा, कंधे से कंधा, जोड़ो तो, इतिहास का स्रोत, मुड़ेगा। अहंकार-बलिदान, बड़ा है, देह के, बलिदान से, इस रहस्य को,जान लो, जीवन सफल, होकर रहेगा इस अनन्त […] Read more » poem on inspiring human being अहंकार बलिदान बड़ा है देह के बलिदान से
साहित्य साहित्य की मुख्य धारा में समकालीन गीत March 25, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -भारतेंदु मिश्र- साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है और वह कई मायने में है भी। अब यदि साहित्य की मुख्यधारा की बात करें तो उसमे गद्य की ही अनेक विधाए आती हैं। यह हमें स्वीकार करना होगा कि यह गद्य का युग है। अब गद्य और पद्य का भेद मिट गया है।अर्थात छन्दहीन नीरस […] Read more » on the base of literatute साहित्य की मुख्य धारा में समकालीन गीत
कविता सूरज का डोला March 24, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment -प्रभुदयाल श्रीवास्तव- चिड़ियों ने जब चूं-चूं बोला, पूरब ने अपना मुंह खोला| उदयाचल अपने कंधे पर, ले आया सूरज का डोला| पीपल पर कोयल चिल्लाई, तब कौओं को भी सुध आई| कांव-कांव कहकर चिल्लाये, उठो सबेरा जागो भाई| फूलों पर भौंरे मंडराये, लगी भूख है रस मिल जाये| जीने का आधार चाहिये, थोड़ा सा ही […] Read more » poem on early morning सूरज का डोला
व्यंग्य व्यंग्य बाण : उफ, ये सादगी March 19, 2014 by विजय कुमार | Leave a Comment छात्र जीवन में मैंने ‘सादा जीवन उच्च विचार’ पर कई बार निबन्ध लिखा है। निबन्ध में यहां-वहां का मसाला, कई उद्धरण और उदाहरण डालकर चार पंक्ति की बात को चार पृष्ठ बनाने में मुझे महारथ प्राप्त थी। मेरे निबन्ध को इसीलिए सर्वाधिक अंक भी मिलते थे। वस्तुतः किसी भी बात के, बिना बात विस्तार को […] Read more » ये सादगी व्यंग्य बाण : उफ
व्यंग्य शिशुपाल और केजरीवाल March 19, 2014 by विपिन किशोर सिन्हा | 9 Comments on शिशुपाल और केजरीवाल दिल्ली का मुख्यमन्त्री बनने के पहले अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस और भ्रष्टाचार-विरोध का एक मुखौटा लगा रखा था जो समय के साथ-साथ तार-तार हो रहा है। कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते। केजरीवाल की हरकतें इस कहावत की सत्यता सिद्ध करती हैं। शक तो तभी होने लगा था, जब […] Read more » शिशुपाल और केजरीवाल
कविता समझ लेना युवा है… March 18, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 1 Comment on समझ लेना युवा है… अन्यायों से लड़ता, सूर्य सा सुलगता, जो हो कर्तव्य निभाता, अपना पथ स्वयं बनाता, समझ लेना युवा है… हुँकार अपनी भरता, आँधियों को चीरता, समर को खदेड़ता, विद्रोही स्वर दिखाता, समझ लेना युवा है… प्रेम में उलझा हुआ, सपनों से झुलसा हुआ, बहुत दूर तक उड़ने को संकल्पित हुआ, पर अपनों की आशाओं से बंधा […] Read more » समझ लेना युवा है...
कविता रंग नहीं होली के रंगों में March 15, 2014 by हिमकर श्याम | 2 Comments on रंग नहीं होली के रंगों में -हिमकर श्याम- फिर बौरायी मंजरियों के बीच कोयल कूकी, दिल में एक टीस उठी पागल भोरें मंडराने लगे, अधखिली कलियों के अधरों पर पलाश फूटे या आग किसी मन में, चूड़ी की है खनक कहीं, कहीं थिरकन है अंगों में, ढोल-मंजीरों की थाप गूंजती है कानों में मौसम हो गया है अधीर, बिखर गये चहूं […] Read more » Poem on Holi रंग नहीं होली के रंगों में
व्यंग्य घुटन का मौसम March 15, 2014 / March 15, 2014 by विजय कुमार | Leave a Comment -विजय कुमार- मौसम विज्ञानियों की बात यदि मानें, तो दुनिया भर में मुख्यत: तीन मौसम होते हैं। सर्दी, गर्मी और वर्षा। जहां तक भारत की बात है, तो यहां षड्ऋतु में वसंत, शिशिर और हेमंत भी शामिल हैं। हमारे कुछ मित्रों का कहना है कि दक्षिण भारत में गर्मी और बहुत अधिक गर्मी तथा पहाड़ों […] Read more » satire on leaders घुटन का मौसम
व्यंग्य चुनावी मौसम बड़ा सुहाना लगे March 15, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -नजमून नवी खान- प्रकति के बनाये हूये तीन मौसम हमें मिले जिन्हें हम सर्दी, गर्मी और बरसात के नाम से जानते हैं, इनके अलावा हम इंसानों ने भी एक मौसम बनाया है जिसे हम सभी चुनावी मौसम के नाम से जानते हैं। ये सबसे सुहाना मौसम होता है जिसमें ना कोई छोटा है ना कोई […] Read more » satire on electoral system and leaders चुनावी मौसम बड़ा सुहाना लगे
कविता भोलाराम का प्रजातंत्र March 13, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment -प्रभुदयाल श्रीवास्तव- जब पवित्र पावक मनमोहक दिन चुनाव का आता है भोलाराम निकलकर घर से वोट डालने जाता है| किसे चुने या किसे वोट दें नहीं समझ वह पाता है सौ का नोट उसे जो देता वह उसका हो जाता है| दो दिन पहले तक चुनाव के लोग कई घर आते हैं लालच देकर हाथ […] Read more » poem on reality of democracy भोलाराम का प्रजातंत्र