कविता शोर बरपा है अजब April 9, 2014 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment सियासती मयख़ाने में कुछ रिंद नहीं पी रहे अबके उनके पैमाने से ठुकरा कर मुदब्बिर का हर जाम ए नज़राना उड़ जाना चाहे बंदी सियासी कैदखाने से गर दस्तूर पुराने टूट गये जाल से परिंदे छूट गये जीने में क़नाअत कर बैठे लालच से बग़ावत कर बैठे कैसे भी ये आग बुझा डालो इरादे पर […] Read more » शोर बरपा है अजब
व्यंग्य केजरी का मुखरक्षक … मफलर April 9, 2014 / April 9, 2014 by एल. आर गान्धी | 3 Comments on केजरी का मुखरक्षक … मफलर एल आर गांधी हे राम …. अच्छा हुआ यह दिन देखने को आज बापू नहीं हैं ….गांधी टोपी धारी माडरन गांधी वादियों की ऐसी धुनाई … हे राम आज राजधानी के ‘अमन’ विहार के आम टैम्पो चालक ‘लाली ‘ ने केज़रीवाल जी का मुंह नीला कर दिया … आँख पर चोट आयी … टैम्पो चालक […] Read more » केजरी का मुखरक्षक … मफलर
कविता चुनाव राजनीति आ गया फिर चुनाव April 7, 2014 / April 7, 2014 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment -मिलन सिन्हा- लो, आ गया फिर चुनाव ! न जाने इस बार किस -किस की डूबेगी नाव इसी सोच में पड़े नेतागण घूमेंगे अब गांव-गांव पहले जहां यदा-कदा ही पड़ते थे उनके पांव लो, आ गया फिर चुनाव ! आज जब कि बाजार में कई चीजों का बना है अभाव और जो मिल […] Read more » satire on election आ गया फिर चुनाव
चुनाव राजनीति व्यंग्य नई नाटक-मंडली की नित नई पटकथाएं April 5, 2014 by आलोक कुमार | Leave a Comment -आलोक कुमार- ‘टोपी – झाड़ू’ वाली नयी नाटक – मंडली के सारे ‘ड्रामे’ कैमरे के सामने ही क्यों होते हैं ? इसे समझना ‘रॉकेट साईन्स’ समझने जैसा कठिन नहीं हैl अपने शुरुआती दौर ‘नुक्कड़’ से लेकर आज तक इस मंडली के निर्देशक और अन्य ‘नाटककार’ आज के दौर में कैसे सुर्खियों में बना रहा जाता है, इसका‘फलसफा’ भली- भांति समझ व जान चुके हैंl रामलीला मैदान, जंतर-मंतर से लेकर ‘रंगशाला’ तक के इनके सफर में ‘कैमरे’ की […] Read more » satire on politics नई नाटक-मंडली की नित नई पटकथाएं
कविता चुनाव राजनीति चुनावी मौसम April 5, 2014 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment आज कल तो जैसे हर सू है त्यौहार का मौसम वादों और उम्मीदों का इक खुशगवार सा मौसम रौशन तकरीरो की जवां अंगड़ाइयां सियासी तब्बसुम की ये अठ्ठखेलियां आबे गौहर सी सियासती शोखियां बाग़े उम्मीद की गुलनारी मस्तियां सियासी महक से सरोबार हर कोना न कही मातम न किसी बात का रोना लगता ही नहीं […] Read more » election season satiric poem on election चुनावी मौसम
कविता राष्ट्रबंधुजी April 4, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment मिला एक दिन दादाजी से, वह दादा हैं राष्ट्रबंधुजी| बच्चों की खातिर सब करने, आमादा हैं राष्ट्रबंधुजी| नहीं कोई छल छंद दिखावा, बस, सादा हैं राष्ट्रबंधुजी, बच्चों का संसार सुनहरा, एक वादा हैं राष्ट्रबंधुजी| Read more » poem on nation-unity राष्ट्रबंधुजी
कविता राजनीति April 3, 2014 / April 5, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -राम सिंह यादव- बहुत सारे चेहरे हैं कुछ मुस्कुरा रहे हैं कुछ चिल्ला रहे हैं कुछ भोले से दिख रहे हैं… कुछ चेहरों मे छिपा लोभ है कुछ चेहरों में ठेकेदारी है कुछ तो धर्म के पूरक हैं… काटते, छांटते और बांटते आदमी चिल्लाते हैं वोट दो…. पानी लो, बिजली लो, विकास लो,,, मैं ट्रेन दूंगा, मैं रोड दूंगा, […] Read more » poem on politics राजनीति
कविता प्रेम April 3, 2014 / April 3, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 1 Comment on प्रेम -विजय कुमार- हमें सांझा करना था धरती, आकाश, नदी और बांटना था प्यार मन और देह के साथ आत्मा भी हो जिसमें ! और करना था प्रेम एक दूजे से ! और हमने ठीक वही किया ! धरती के साथ तन बांटा नदी के साथ मन बांटा और आकाश के साथ आत्मा को सांझा […] Read more » poem on affection प्रेम
कविता गरमी मई की जून की April 2, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment आई चिपक पसीने वाली, गरमी मई की जून की| चैन नहीं आता है मन को, दिन बेचेनी वाले | सल्लू का मन करता कूलर , खीसे में रखवाले | बातें तो बस उसकी बातें , बातें अफलातून की | दादी कहतीं सत्तू खाने , से जी ठंडा होता | जिसने बचपन से खाया है, तन […] Read more » poem on summer गरमी मई की जून की
चुनाव व्यंग्य चुनावी फसल से खलिहान भरने की चाहत…! April 1, 2014 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment -तारकेश कुमार ओझा- गांव – देहात से थोड़ा भी संबंध रखने वाले भलीभांति जानते हैं कि खेतीबारी कितना झंझट भरा, श्रमसाध्य और जोखिम भरा कार्य है। यदा-कदा गांव जाने पर उन मुर्झाए चेहरों वाले रिश्तेदारों से मुलाकात होती है, जो अपना दुखड़ा सुनाते हुए बताते हैं कि बेटा .. खेतीबारी से गुजारा मुश्किल है। पुश्तैनी […] Read more » satire on current election चुनावी फसल से खलिहान भरने की चाहत...!
चुनाव राजनीति व्यंग्य राजनैतिक आत्महत्या: घूंघट नहीं खोलूंगी सैंया तोरे आगे April 1, 2014 by डा. अरविन्द कुमार सिंह | Leave a Comment -डॉ. अरविन्द कुमार सिंह- बहुत दिनों के बाद आज कुछ लिखने के लिये कलम उठाया हूं। देश चुनावी ताप से तप रहा है। राजनेताओं का कहा हर लफ्ज, कई अर्थों को जन्म दे रहा है। सब अपनी विश्वसनियता को साबित करने हेतु दूसरों पर जमकर आरोप प्रत्यारोप का सहारा ले रहे हैं। मैं समझ नही […] Read more » satire on Arvind Kejrival राजनैतिक आत्महत्या: घूंघट नहीं खोलूंगी सैंया तोरे आगे
कविता आज़ादी के पहले अनगिनत शहीद हुए March 30, 2014 by जावेद उस्मानी | Leave a Comment -जावेद उस्मानी- आज़ादी के पहले अनगिनत शहीद हुए कड़ी राहों से हँसते हुए गुज़रे हम सब के लिए कि हमारे लिए ज़रूरी थी आज़ादी हमारी ! आज़ादी के बाद शहीद हुए हमारे गांधी कि हम नव-आज़ाद लोगों को शायद ज़रूरत न थी उस रहबरी की अब कि वह रोकती मनचाही आज़ादी हमारी ! आज़ादी के […] Read more » Poem on Martyrs आज़ादी के पहले अनगिनत शहीद हुए