व्यंग्य योग्य उम्मीदवार March 13, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment -प्रभुदयाल श्रीवास्तव- चुनाव सिर पर थे और योग्य उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी थी। सभी राजनैतिक दल एक दूसरे को पटकनी देने के जुगाड़ में थे। किसी भी तरह चुनाव में बढ़त बनायें और सत्ता हथियाएं, मात्र यही एक सूत्रीय कार्यक्रम सबके पास था। बहुमत मिल जाये तो फिर क्या कहने हैं। […] Read more » satire on election candidates योग्य उम्मीदवार
कविता मीठी वाणी March 13, 2014 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment -प्रभुदयाल श्रीवास्तव- छत पर आकर बैठा कौवा, कांव-कांव चिल्लाया| मुन्नी को यह स्वर ना भाया, पत्थर मार भगाया| तभी वहां पर कोयल आई, कुहू कुहू चिल्लाई| उसकी प्यारी प्यारी बोली, मुनिया के मन भाई| मुन्नी बोली प्यारी कोयल, रहो हमारे घर में| शक्कर से भी ज्यादा मीठा, स्वाद तुम्हारे स्वर में| मीठी बोली वाणी वाले, […] Read more » poem on speaking मीठी वाणी
महत्वपूर्ण लेख साहित्य हिन्दू राजा वीर राय का मौन स्मारक है-आसाम की धरती March 12, 2014 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment आसाम-अर्थात पूर्वी भारत का अंतिम छोर। जी हां, ये वही पुराना कामरूप है जहां कभी सूर्य सबसे पहले आकर अपनी किरणें बिखेरता था, आज यह सौभाग्य चाहे अरूणांचल प्रदेश को मिल रहा है, पर हमें यह नही भूलना चाहिए कि आज का अरूणांचल प्रदेश भी पुराने आसाम का ही एक भाग है। पूर्व दिशा प्रकाश […] Read more » हिन्दू राजा वीर राय
व्यंग्य टिकट खत्म! प्रचार शुरू March 9, 2014 by अशोक गौतम | 1 Comment on टिकट खत्म! प्रचार शुरू बड़े दिनों से उनकी पार्टी की चौखट पर मेरे जैसे कर्इ गधे अपने कार्यकर्ताओं के साथ टिकट के लिए पड़े थे। एक लिस्ट में नहीं तो दूसरी लिस्ट में ही सही। मुझे लग रहा था कि कम से कम मेरा नाम आ ही जाएगा। और बस एक बार लिस्ट में नाम पड़ गया तो समझो […] Read more » टिकट खत्म! प्रचार शुरू
कविता फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! March 6, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment अश्विनी कुमार हर कदम पर मुझे दबाने का प्रयास किया जा रहा है फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! सुरक्षित महसूस नहीं करती हूँ मैं इस सभ्य समाज में फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! मुझे इस पुरुष प्रधान समाज में उपभोग की वस्तु समझा जा रहा है फिर भी मुझे […] Read more »
महत्वपूर्ण लेख साहित्य श्रीमद भागवत गीता में मोक्ष संन्यास योग March 4, 2014 by बी एन गोयल | 2 Comments on श्रीमद भागवत गीता में मोक्ष संन्यास योग बी एन गोयल गीता के अंतिम अध्याय का नाम है – मोक्ष सन्यास योग। भारतीय चिंतन में मानव जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना अथवा आवागमन के चक्र से मुक्ति माना गया है। स्वामी शिवानंद ने गीता की अपनी व्याख्या में अँग्रेज़ी में इसे – The Yoga of Liberation by Renunciation अर्थात त्याग द्वारा […] Read more » मोक्ष संन्यास योग
व्यंग्य हिंदी साहित्य का अखाड़ा March 2, 2014 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on हिंदी साहित्य का अखाड़ा ::: भाग एक::: बहुत समय पहले की बात है। मुझे एक पागल कुत्ते ने काटा और मैंने हिंदी साहित्यकार बनने का फैसला कर लिया। ये दूसरी बार था कि मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा था और मैं अपनी ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ कोई महत्वपूर्ण फैसला कर रहा था। पहली बार जब एक महादुष्ट पागल […] Read more » हिंदी साहित्य का अखाड़ा
महत्वपूर्ण लेख साहित्य बुन्देलखण्ड की वीरभूमि के सपूत आल्हा-ऊदल March 2, 2014 / March 2, 2014 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on बुन्देलखण्ड की वीरभूमि के सपूत आल्हा-ऊदल भारत की पवित्र भूमि के लिए बड़ा सुंदर गीत गाया जाता है :- मेरे देश की धरती सोना उगले.. उगले हीरे मोती…मेरे देश की धरती………….. मैं समझता हूं भारत मां के लिए जिस कवि के हृदय में भी ये भाव मचले होंगे और उन्होंने जब कुछ शब्दों का रूप लिया होगा तो वह कवि भी […] Read more » बुन्देलखण्ड की वीरभूमि के सपूत आल्हा-ऊदल
व्यंग्य अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन “लोकतंत्र की फ्रीस्टाईल नूराकुश्ती” March 1, 2014 / March 1, 2014 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment – सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”- राजनीति एक बार दोबारा अपने चिर-परिचित स्वरूप की ओर बढ़ चली है। वही स्वरूप जिसमें पद पिपासा और अवसरवाद सर्वाधिक लोकप्रिय सिद्धांत है। इस बात को देखकर मेरे बाबा का एक पुराना शेर याद आ गया जो वे अक्सर ही कहा करते थे, सियासत नाम है जिसका वो कोठे की […] Read more » satire on democracy अस्सी वाले स्वतंत्र बाबा कहीन "लोकलंत्र की फ्रीस्टाईल नूराकुश्ती"
कविता जय हो पण्डित लेखराम February 27, 2014 by विमलेश बंसल 'आर्या' | 1 Comment on जय हो पण्डित लेखराम -विमलेश बंसल ‘आर्या’- जन्म लिया था रावलपिंडी, पाढीवार के कुहुटा ग्राम-2। तारा का अनमोल सितारा, जय हो पंडित लेखराम-2॥ 1. थे पंडित, विद्वान, साहसी, सच्चे देशभक्त प्यारे। तारा सिंह के पुत्र प्यारे, मां की आँखों के तारे। संस्कृत, हिंदी में पारंगत, फ़ारसी, उर्दू बनी हमांम॥ तारा का अनमोल सितारा… 2 एक दिवस पढ़ रहे मदरसे, घटना […] Read more » poem on Pandit Lekhram जय हो पण्डित लेखराम
व्यंग्य जैसे कैसे हो गया बस ! February 27, 2014 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम- बरसों से महसूस होने का सारा सिस्टम खटारा होने के बाद भी कई दिनों से मैं महसूस कर रहा था कि जब-जब पत्नी की चिल्ल-पों बंद होती और अपने कानों को जरा चैन देने की कोशिश में होता तो उनके घर के भीतर से किसी चीज को ठोकने-बजाने की आवाजें आने […] Read more » satire on political system जैसे कैसे हो गया बस !
कविता सरफरोशी की तमन्ना अब बड़़ी मुश्किल में है February 27, 2014 by सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र” | Leave a Comment – सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”- सरफरोशी की तमन्ना को बिस्मिल जी ने किस मनोभाव में लिखा होगा… कभी गौर से पढ़िये तो एक एक शब्द एक शहादत की कहानी कहता मिलेगा, लेकिन आज कहां लुप्त है हमारा सरफरोशी का ये भाव… एक बार सोचिये… आज हालात कुछ यूं है- सरफरोशी की तमन्ना अब बड़़ी मुश्किल […] Read more » poem on national integrity सरफरोशी की तमन्ना अब बड़़ी मुश्किल में है