कहानी साहित्य आसक्ति से विरक्ति की ओर …..! August 30, 2013 / August 30, 2013 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on आसक्ति से विरक्ति की ओर …..! दोस्तों , ये एक प्राचीन बुद्ध कथा है , जिसे मैंने बड़ी मेहनत से अपने शब्दों से सजाया है . इस कथा में एक देशना हम सभी को मिलती है . आपको ये कथा जरुर अच्छी लगेंगी . ::: भाग एक :::: श्रावस्ति नगर के निकट स्थित प्रकृति की सुन्दरता से सजी जेतवन में सुबह की नर्म धूप […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य बाण : आह प्याज, वाह प्याज August 30, 2013 / August 30, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment प्याज मूल रूप से भारतीय उपज है या विदेशी, इस पर शोधार्थियों को खोपड़ी लड़ाने दीजिये; पर हम तो इतना जानते हैं कि प्याज के छिलकों की तरह इसकी कहानी में बाहर से लेकर अंदर तक, और ऊपर से लेकर नीचे तक, कई रंग और आकार की परतें मौजूद हैं। जो लोग प्याज नहीं खाते, […] Read more »
व्यंग्य …तो क्या आप हमारे ‘मैचलेस’ टी.वी. न्यूज चैनल से जुड़ेंगे? August 28, 2013 / August 28, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी एक दिन सपने में मेरी मुलाकात अब तक के सर्वोपरि मीडिया परसन नारद जी से हो गई। वही नारद जो हिन्दी टी.वी. धारावाहिकों के धार्मिक एपीसोड्स में आकाश-पाताल एवं धरती लोक का विचरण करके संवादों का संकलन करते दिखाए जाते हैं। जी हाँ वही जो टी.वी. चैनलों के ओ.बी. वैन के […] Read more » ...तो क्या आप हमारे ‘मैचलेस’ टी.वी. न्यूज चैनल से जुड़ेंगे?
कहानी व्यंग्य रोबोट August 28, 2013 / August 28, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on रोबोट एक समय की बात है किसी देश मे एक विद्वान रहता था, उसे अर्थशास्त्र का बहुत ज्ञान था। उसी देश मे एक विदेशी देवी रहती थीं जिनके भक्तों का एक बड़ा समूह था। ये विद्वान भी उसी समूह से जुड़े थे और विदेशी देवी के भक्त थे। एक दिन देवी ने इन विद्वान महोदय को […] Read more » रोबोट
कविता कविता : कुछ काम तो करो August 26, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा बातें हुई तमाम, कुछ काम तो करो दूर है मुकाम, कुछ काम तो करो। घड़ी इम्तिहान की, संघर्ष है कठिन विजय तुम्हे मिलेगी,कुछ काम तो करो। प्यार का ही दिन हो, प्यार की ही रात नफरत से न कोई वास्ता, कुछ काम तो करो। एकता में बल है, प्रेम में […] Read more » कुछ काम तो करो
गजल सत्येंद्र गुप्ता की गजले August 26, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | 1 Comment on सत्येंद्र गुप्ता की गजले संग बीमार नहीं हुआ जाता टूटी किश्ती में सवार नहीं हुआ जाता ! हज़ार कयामतें लिपटती हैं क़दमों से मगर फिर भी लाचार नहीं हुआ जाता ! बेशुमार धब्बे हैं धूप के तो दामन पर हम से ही गुनाहगार नहीं हुआ जाता ! रहमतें तो बरसती हैं आसमां से बहुत रोज़ के रोज़ साहूकार नहीं […] Read more »
कविता कविता – नेता August 23, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment जिनके पीछे तुम भाग रहे हो जिनके लिए तुम कुछ भी करने को तैयार हो क्या तुम्हें पता है कि वो भी भाग रहा है कि वो भी तैयार है सभी कुछ करने को तत्पर । खुश हो रहे हो तुम यही सोचकर उसका भागना और उसका त्याग तुम्हारे लिए है शायद तुम्हें नहीं दिख […] Read more »
कविता कुछ भी निश्चित नहीं है August 23, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment चाँद तुम रोज़ क्यो मुस्कुराते हो ? तुम्हारा आसमान मे निकलना, खिलना कितना सुनिश्चित है। तुम्हे कभी कोई बादल भी ढकले, तो तुम उदास हो जाते हो […] Read more » कुछ भी निश्चित नहीं है
कविता बाहें August 19, 2013 / August 19, 2013 by विजय निकोर | 1 Comment on बाहें तुम थे तो तुम्हारी बाहों के साथ मेरी बाहों का विस्तार बहुत लंबा था । मुझको लगता था मैं कुछ भी छू सकती थी.. कर सकती थी, कह सकती थी, मेरी ज़िन्दगी तब इस तरह कोई कानून नहीं थी, झूमती हवा के समान स्वच्छंद थी मैं, केवल धरती ही नहीं थी अपनी, […] Read more »
कविता कहीं से काले बादल आही जाते हैं August 17, 2013 by बीनू भटनागर | 4 Comments on कहीं से काले बादल आही जाते हैं तेज़ चमकती धूप मे कहीं से, उमड़ धुमड़ कर काले बादल, आ ही जाते हैं। जैसे शांत मन मे अचानक, नकारात्मक संवेग कभी भी, छा ही जाते हैं। अंतर्मन पर धुंध सी छाने लगती है, जो वेदना का धुंआ सा बन जाती है। ये ज़हरीला धुंआ भीतर ही भीतर फैलता है…. धुटन ही धुटन देता […] Read more » कहीं से काले बादल आही जाते हैं
आलोचना कबीर-तुलसी के काव्यों में स्त्री-विरोध August 17, 2013 by सारदा बनर्जी | 3 Comments on कबीर-तुलसी के काव्यों में स्त्री-विरोध सारदा बैनर्जी भक्तिकालीन साहित्य में पाखंड-विरोध के समानांतर स्त्री-विरोध का स्वर भी स्पष्टतः मुखर हुआ है। खासकर कबीर जैसे प्रगतिशील और भक्त कवि ने अपने दोहों में स्त्री को दो रुपों में विभाजित कर उसका चरित्रांकन किया है। ये दो रुप हैं, ‘पातिव्रत्य’ रुप और ‘कामिनी’ रुप। कबीर ने नारी के कामिनी रुप की भरसक […] Read more »
कविता कैसी आजादी August 14, 2013 by चन्द्र प्रकाश शर्मा | Leave a Comment 15 अगस्त 1947 को हुआ भारत आज़ाद धरती रोई रोया अम्बर और रोया ताज। करोड़ो बेघर हुए लाखो हुए हलाल इतना खून बहा धरती पर धरती हो गई लाल घर लुटा अस्मत लुटी, लुट गए सब कारवाँ , देख दशा भारत माँ की बिलख उठा आसमां। बिछड़ गए लाखो अपने चली न कोई तदबीर याद […] Read more » कैसी आजादी