कविता व्यंग्य कविता : मौके की बात August 12, 2013 / August 12, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा आधुनिक युग कलयुग तो है ही ‘क्यू’ युग भी है जहाँ जाइए वहां क्यू नल पर नहाइए, वहां क्यू राशन लेना है, क्यू में आइए बच्चे का एडमिशन है, क्यू में आइए भाषण देना है, क्यू में आइए रोजगार दफ्तर में बेकारों के लिए क्यू श्मशान में मुर्दों के लिए क्यू एक दिन […] Read more » मौके की बात
राजनीति व्यंग्य व्यंग्य बाण : मनमोहन सिंह ‘मजबूर’ August 10, 2013 by विजय कुमार | 1 Comment on व्यंग्य बाण : मनमोहन सिंह ‘मजबूर’ दुनिया में गद्य और पद्य लेखन कब से शुरू हुआ, कहना कठिन है। ऋषि वाल्मीकि को आदि कवि माना जाता है; पर पहला गद्य लेखक कौन था, इसका विवरण नहीं मिलता। इन लेखकों के साथ एक बीमारी जुड़ी है। लेखन का कीड़ा काटते ही उन्हें यह ज्ञान हो जाता है कि माता-पिता ने उनका नाम […] Read more » मनमोहन सिंह ‘मजबूर’
कविता व्यंग्य नेता- अभिनेता, असरकारी August 10, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा हास्य व्यंग्य कविताएं : नेता- अभिनेता, असरकारी नेता-अभिनेता नेता और अभिनेता चुनाव मैदान में खड़े थे । मतदातागण सोच में पड़े थे । उधर, छिड़ा था विवाद, मतदाता देगा किसका साथ । एक के पास था आश्वासनों और वादों का झोला, तो दूसरे के पास था भुलावे में रखने का नायाब मसाला । […] Read more »
कविता कविता : खुद को जानो August 9, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा कोई बोले न बोले खुद से तू बोल अपने तराजू में खुद को तू तौल खुद को पहले जान तभी खुदा मिलेंगे नहीं तो तुमसे वो जुदा रहेंगे खुद से कर प्यार जमाने से प्यार हो जाएगा फिर तो जीवन तेरा खुशियों से भर जाएगा । Read more » कविता : खुद को जानो
गजल तेरी आहट August 8, 2013 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन तेरी वक्रोक्ति को लबों की सजावट समझकर हम खिल खिलाते रहे मुस्कुराहट समझकर जब जब घण्टी बजी किसी भी द्वार की हम दौड कर आये तेरी आहट समझकर ना आना था , ना आये तुम कभी संतोष कर लिया तेरी छलावट समझकर […] Read more » तेरी आहट
व्यंग्य गरीबी -मानसिक अवस्था और खैरात August 7, 2013 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment एल आर गाँधी आत्मविश्वास से लबरेज़ चोखी लामा वी -शेप की चप्लियाँ चटकाते सुबह सुबह आ धमके …. हलो … की हुंकार लगाई । आवाज़ में जोश और आक्रोश एक साथ छलक रहा […] Read more » गरीबी -मानसिक अवस्था और खैरात
राजनीति व्यंग्य नवीन का संस्कार सुरक्षा बिल August 6, 2013 / August 6, 2013 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment एल आर गाँधी राजमाता और उनके दरबारी तो गरीबी रेखा मापने की माथापच्ची में ही उलझे थे। क़ोइ १२/- में गरीब को भरपेट खाना परोस रहा था और कोई ५/- और १/- में गरीब का पेट भर रहा था …. राजमाता १४ में नयी ताजपोशी से पहले ‘खाद्य सुरक्षा ‘बिल पास करवा कर गरीबों को भूख से […] Read more » नवीन का संस्कार सुरक्षा बिल
कविता कविता : कुछ बात बने August 6, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा दुःख में भी सुख से रह सको तो कुछ बात बने। पहले खुद को पहचान सको तो कुछ बात बने। जानता हूँ , तुम वो नहीं जो तुम वाकई हो जो तुम हो, वही रह सको तो कुछ बात बने। माना की दुनिया बड़ी जालिम है फिर भी जालिम को भी […] Read more » कविता : कुछ बात बने
कविता “प्रेमपत्र नंबर : 1409” August 5, 2013 / August 5, 2013 by विजय कुमार सप्पाती | 3 Comments on “प्रेमपत्र नंबर : 1409” जानां ; तुम्हारा मिलना एक ऐसे ख्वाब की तरह है , जिसके लिए मन कहता है कि , कभी भी ख़त्म नहीं होना चाहिए … तुम जब भी मिलो , तो मैं तुम्हे कुछ देना चाहूँगा , जो कि तुम्हारे लिए बचा कर रखा है ………….. एक दिन जब तुम ; मुझसे मिलने आओंगी प्रिये, […] Read more » “प्रेमपत्र नंबर : 1409”
कविता तेरे लिए August 4, 2013 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment मै,तेरे लिए आया, इस जिंदगी में, चाहकर कर भी तेरा ना हो सका, मुरझे हुए फूलों की तरह मेरी सवेंदनाएं भी मुरझा गई, खिली हुई कलियों की खुशियों जैसे प्यार का अहसास होने लगा था, कुछ सपने थे, जो पतझड़ की तरह हो गए, बिन उसके एक पल भी एक नागवार लगने लगा राहें बनाने […] Read more » तेरे लिए
व्यंग्य बेदागियों से सवधान! August 3, 2013 / August 3, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment देखो जी, कहे देते हैं अपना कानून अपने पास रखो और हमारे दाग हमारे पास! वरना हमारे से बुरा कोर्इ न होगा! अरे आपको तो समाज के दाग धोने के लिए रखा था और आप हो कि हमारे चेहरे के ही दाग धोने निकल पड़े? आपके पास कोर्इ और काम नहीं है क्या? देखो तो, […] Read more » बेदागियों से सवधान!
कविता हरियाली तीज August 3, 2013 / August 3, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मेहंदी मंडित तेरी हथेली हाथों में चूड़ी अलबेली, लाल हरी और नीली-पीली झूलन सावन चली सहेली। तेरी कुन्दन सी है काया रूप कहूँ या कह दूँ माया नेह सभी का तूने पाया सुख की है बस तुझपर छाया । मेघा […] Read more » हरियाली तीज