व्यंग्य व्यंग्य बाण : हम बने, तुम बने… September 12, 2013 by विजय कुमार | Leave a Comment बात बहुत पुरानी है। एक राजा की अत्यधिक विद्वान बेटी का सही नाम तो न जाने क्या था; पर लोग उसे विद्योत्तमा कहकर बुलाते थे। अपनी विद्या के गर्व से दबी राजकुमारी अपने से अधिक विद्वान युवक से ही विवाह करना चाहती थी। उसने विवाह के इच्छुक कई विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया। […] Read more »
कविता उत्तराखण्ड महान है | September 12, 2013 / September 12, 2013 by डा.राज सक्सेना | 1 Comment on उत्तराखण्ड महान है | डा. राज सक्सेना पग-पग पर पावन नवगंगा, कण – कण देव समान है | हरित हिमालय से संपूरित , उत्तराखण्ड महान है | गौरवमय गिरिराज, गोमुखी- गंगा का श्री-द्वार है | शिवसमसुन्दर,श्रेष्टसुसज्जित, कनखलमय , हरिद्वार है | सांध्यआरती गंगा-तट की, पुलकित, पुण्य प्रमाण है | हरितहिमालय […] Read more » उत्तराखण्ड महान है |
कविता कौन हो तुम September 12, 2013 by रवि कुमार छवि | Leave a Comment अकेला रहता हूं तो तुम दौड़कर कसकर अपनी बाहों में भर लेती हो रोमांच के इस पड़ाव पर पहुंचाकर कुछ ही पलों में रुखसत हो जाती हो क्यों आती ? क्यों जाती हो इस सवाल का जवाब नहीं हैं तुम्हारा अतीत में ले जाना अतीत से वापस लाकर फिर से उसी हालत में पटक […] Read more » कौन हो तुम
दोहे भारत दुर्दशा की ताजा तस्वीर [दोहे] September 11, 2013 by श्रीराम तिवारी | 3 Comments on भारत दुर्दशा की ताजा तस्वीर [दोहे] यु पी वेस्ट में इन दिनों ,चल रहा जंगल राज। मानों अब परलोक से ,निकल पड़े यमराज।। दो वाहन टकराए क्या , झगड़ पडीं दो कौम। मजहब की तकरार में , धुन्धलाया है व्योम।। मँहगाई की मार या , भ्रष्टाचार का शूल । कोल आवंटन फायलें ,कहाँ पर खातीं धूल ।। मुद्रा का अवमूल्यन ,या […] Read more » भारत दुर्दशा की ताजा तस्वीर
कविता आओ खेलें नया एक खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल! September 8, 2013 / September 8, 2013 by भारत भूषण | Leave a Comment आओ खेलें नया एक खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल! है यह बहुत निराला खेल, नेताओं का प्यारा खेल !! भगवा रंग को कम्यूनल कहना, हरे रंग का सेक्युलर रहना ! होगा बहुत रंगीला खेल, सेक्युलर-कम्यूनल वाला खेल!! नेताओं का प्यारा खेल, है यह बहुत निराला खेल!! तुम मुस्लिम हित की बात है करना, हमेशा ही सेक्युलर […] Read more » भारत भूषण
व्यंग्य रे रामा! हरे कामा! September 6, 2013 / September 6, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे कामदेव! तुम्हें रति की कसम! सच सच बतलाना!! इस द्वीप में अब तुमको क्या युवा नहीं मिल रहे जो तुमने अब संसार से विरक्तों पर भी अपने कामबाण चला उन्हें अपवित्र करना षुरू कर दिया ? माना, आज की भाग दौड़ की जिंदगी में बेचारे युवा युवा होने से पहले ही बुढि़याए जा रहे […] Read more »
गजल हर वक्त तो हाथ में गुलाब नहीं होता September 5, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | 2 Comments on हर वक्त तो हाथ में गुलाब नहीं होता हर वक्त तो हाथ में गुलाब नहीं होता उधार के सपनों से हिसाब नहीं होता। यूं तो सवाल बहुत से उठते हैं ज़हन में हर सवाल का मगर ज़वाब नहीं होता। शुहरत मेरे लिए अब बेमानी हो गई ख़ुश पाकर अब मैं ख़िताब नहीं होता। रात भर तो सदाओं से घिरा रहता हूँ मैं सुबह […] Read more » हर वक्त तो हाथ में गुलाब नहीं होता
कविता इश्किया शायरी- फेसबुक पर September 5, 2013 / September 5, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment फेसबुक पर लगा है इश्क का बाज़ार, दो रुपये मे ढ़ाई किलो आज का है भाव, कवि मित्र लिख रहे हैं मधुमास के गीत, कवियत्रियों को भी किसी का इंतज़ार है। इश्क के बाज़ार मे माल बहुत पड़ा है, कविता ग़ज़ल शायरी सबकी भरमार है, लूटलो कंमैंट बेशुमार भरलो झोलीयाँ , लाइक की बात क्या, […] Read more » इश्किया शायरी- फेसबुक पर
व्यंग्य साक्षात्कार प्रहसन -उभरते कलाकार September 5, 2013 / September 5, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on प्रहसन -उभरते कलाकार पात्र- पत्रकार और मैं स्थान- BHT चैनल का स्टूडियो पहला दृष्य पत्रकार– (दर्शकों को संबोधित करते हुए) दर्शकों ‘उभरते कलाकार’ में आपका स्वागत है। आज पहली बार इस मंच पर, इस कार्यक्रम में मैं आपको एक 65 वर्षीय लेखिका से मिलवा रही हूँ। कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती तो किसी […] Read more »
कविता कविता : अच्छा लगता है September 3, 2013 by मिलन सिन्हा | 2 Comments on कविता : अच्छा लगता है मिलन सिन्हा कभी कभी खुद पर हंसना भी अच्छा लगता है कभी कभी दूसरों पर रोना भी अच्छा लगता है। हर चीज आसानी से मिल जाये सो भी ठीक नहीं कभी कभी कुछ खोजना भी अच्छा लगता है। भीड़ से घिरा रहता हूँ आजकल हर घड़ी कभी कभी तन्हा रहना भी अच्छा लगता […] Read more » अच्छा लगता है
कहानी सुबह की कालिमा -सुधीर मौर्य September 2, 2013 / September 2, 2013 by सुधीर मौर्य 'सुधीर' | 1 Comment on सुबह की कालिमा -सुधीर मौर्य अंकिता आज थोड़ा उलझन में है। वो जल्द से जल्द अपने रूम पर पहुँच जाना चाहती है। न जाने क्यूँ उसे लग रहा है, ऑटो काफी धीमे चल रहा है। वो ऑटो ड्राइवर को तेज़ चलाने के लिए बोलना चाहती है, पर कुछ सोच कर चुप रह जाती है। आज उसे निर्णय लेना है। जिसके […] Read more »
कविता बहिष्कार September 2, 2013 / September 2, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment निर्मल बाबा हो या आसाराम, या कोई भी और संत महान, धन और सत्ता के मतवाले, शिष्यों को भरमाने वाले, उनका लाभ उठाने वाले, तिज़ोरी अपनी भरने वाले, धर्म […] Read more » बहिष्कार