व्यंग्य जिसकी बीवी मोटी उसका ही बड़ा नाम हैं… April 22, 2013 / April 22, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी महिला सशक्तीकरण को लेकर महिलाएँ भले ही न चिन्तित हों, लेकिन पुरूषों का ध्यान इस तरफ कुछ ज्यादा होने लगा है। जिसे मैं अच्छी तरह महसूस करता हूँ। मुझे देश-दुनिया की अधिक जानकारी तो नहीं है, कि ‘वुमेन इम्पावरमेन्ट’ को लेकर कौन-कौन से मुल्क और उसके वासिन्दे ‘कम्पेन’ चला रहे हैं, फिर […] Read more »
व्यंग्य कदम-कदम पर जंतर-मंतर और टोटके April 22, 2013 / April 22, 2013 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment सुरेश नीरव अंधविश्वास में अपना बड़ा ही हाईक्वालिटी का विश्वास है। क्योंकि अपनी नज़र में अंधविश्वास ही ऑरीजनल विश्वास है। बाकी सब बकवास है। मैं गर्व से कहता हूं कि मैं अंधविश्वास का अंध-समर्थक हूं। क्योंकि समर्थक ही अंधा हो सकता है। आपने क्या कभी कहीं कोई अंध-विरोधी देखा है। होता ही नहीं तो देखेंगे […] Read more » कदम-कदम पर जंतर-मंतर और टोटके
व्यंग्य बी.ए.आनर्स इन बाबागिरी / मातागिरी April 17, 2013 / April 17, 2013 by बीनू भटनागर | 3 Comments on बी.ए.आनर्स इन बाबागिरी / मातागिरी शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य व्यक्ति को किसी रोज़गार के लियें तैयार करना होता है। पहले विज्ञान, वाणिज्य, कला, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और वकालत के अलावा स्नातक स्तर पर अधिक विषय नहीं पढ़ाये जाते थे, समय के साथ पत्रकारिता, फैशन, अभिनय जैसे क्षेत्र में हर स्तर के 4-6 महीने से लेकर 3 साल के डिग्री […] Read more » बी.ए.आनर्स इन बाबागिरी / मातागिरी
कविता राजेन्द्र सारथी के दोहे April 17, 2013 / April 17, 2013 by राजेन्द्र सारथी | Leave a Comment शहरों में वे आ गये, बेच गांव के खेत। धन धूएं – सा उड़ गया, ख्वाब बन गए प्रेत। नए दौर में हो गए, खंडित सभी उसूल। जो जितना समरथ हुआ, उतना वह मकबूल। परिवर्तित इस जगत में, होती है हर चीज। अजर-अमर कोई नहीं, हर गुण जाता छीज। उन्नत वही […] Read more »
कविता कविता -जवान और किसान April 17, 2013 / April 17, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा हरा भरा खेत खलिहान फिर भी निर्धन क्यों हमारे किसान ? देश में नहीं पानी की कमी फिर भी क्यों रहती है सूखी यहाँ – वहाँ की जमीं ? जिसे देखना है वो देखें […] Read more »
कविता इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ! April 16, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment उस कठोर कठिन श्राप-सी शाम के बाद भी मेरे ख़यालों में स्वर-लहरी बनी कितनी सरलता से चली आती हो, पर जब भी आती हो तुम… तुम इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो ? हर प्रात व्यथित, हर शाम उदास, साँसों के तारों को मानो […] Read more » इतना दर्द बन कर क्यूँ आती हो !
कविता शहर April 16, 2013 / April 16, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” जब गाय मिले चौराहों पर कुत्ता बैठा हो कारों में । तब ये आप समझ जाना कोई शहर आ गया । टकराकर तुमसे जवां मर्द बोले क्या दिखता तुम्हें नहीं । तभी वृद्ध दादा जी बोलें सॉरी बेटे दिखा नहीं । बस इतने से ही जान लेना कोई शहर आ गया ।। […] Read more » शहर
गजल छलकते जज्बात April 16, 2013 by शिखा श्रीवास्तव | Leave a Comment लोगों के बीच में आंखे चुराते हुए मुझे देखना और जब मैं मुस्कराऊं तो तुम्हारी आंखों की चमक गालों की लालिमा, कह जाती है तुम्हें हमसे प्यार है हमारी जरूरत है… मुझे देखते हुए जब लोगों ने शुरू की तुम्हारी खिंचाई , तो बड़ी बहादुरी से आपका यह कहना हां, मैं देख रहा था और […] Read more »
कविता झिरिया April 12, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment झंकृत होती दुनियावीं कामनाओं के स्वर और अपुष्ट अप्रकटित कुछ पुरानी इक्छायें, ढूँढते हुए अपनें मूर्त आकार को आ गईं थी इस गली के मुहानें तक। अपनें दबें कुचलें रूप के साथ कुछ उपलब्धियों का असहज बोझ उठायें उन सब का गली से अन्तरंग होना और उससे तारतम्य में हो लेना एक रूपक ही […] Read more »
कविता पवन पाण्डेय की कविता April 10, 2013 / April 10, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment अमूर्त और निःशब्द परम शांति तुम्हारे प्रेरक हैं प्रियवर समय के मूढ़ कोलाहल का हैं यह शमन? क्या एक त्वरित उपाय? या छद्म अहम् का मायाजाल? भई, मैं तो उस कवि का सजल-उल शिष्य हूँ जिसे नहीं चाहिए शांति उसे चाहिए क्रांति मुझे चाहिए संवेदना विस्तीर्ण नहीं चाहिए भाषा-प्रावीण्य चाहिए एक खगोलीय ककहरा […] Read more » अमूर्त
व्यंग्य जुगाड़ कर ,जुगाड़ कर, जुगाड़ कर!! April 10, 2013 / April 10, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे कल छपने वाले अखबारों की ओर टकटकी लगाए देश वासियो ! छोड़ो कि कल के अखबार में वे क्या कहने वाले हैं तो परसों उसके बदले में वे क्या कहने वाले हैं। अखबार में कुछ देखना ही है तो छूट के, लूट के विज्ञापन देखो, देखो तो एक के साथ एक क्या क्या फ्री […] Read more »
व्यंग्य प्रेम इज सिट्रक्टली प्रहिबिटिड! April 10, 2013 by अशोक गौतम | 1 Comment on प्रेम इज सिट्रक्टली प्रहिबिटिड! वे आए और मेरे पास बैठ गए। चुपचाप! बड़ी देर तक मेरे डार्इ किए बालों को देखते रहे। जब उन्हें कुछ पता न चला तो शरमाते बोले,’ यार! माफ करना ! ये सिर में तुमने काला सा क्या लगा क्या रखा है? इस देश के लोगों के मुंह तो आए दिन काले होते ही रहे […] Read more »