व्यंग्य हास्य-व्यंग्य-भाई-भाईचारा और भाई-भतीजावाद May 10, 2013 / May 10, 2013 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव ये जो भाई है यह बड़ा ही विचित्र किंतु सत्य किस्म का जीव होता है। मानव समाज में इसकी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। मसलन- सगा भाई,सौतेला भाई,जुडवां भाई,छोटा भाई, मोटा भाई, गुरुभाई, धरम का भाई,दिहाड़ी भाई,तिहाड़ी भाई,घुन्नाभाई,मुन्नाभाई और चोरी-चोरी इक चोरी की डोरी से बंधे मौसेरे भाई। यानीकि यत्र-तत्र-सर्वत्र भाई-ही-भाई। एक […] Read more »
गजल लो जान हथेली पे तो दुनिया है तुम्हारी….. May 8, 2013 / May 8, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 1 Comment on लो जान हथेली पे तो दुनिया है तुम्हारी….. -इक़बाल हिंदुस्तानी तूफ़ां में कश्तियों को किनारा नहीं मिलता, अपनों का भी गुरबत में सहारा नहीं मिलता। लातूर से सूरत से सबक़ सीखना होगा, कुदरत से बार बार इशारा नहीं मिलता। रहबर ही तंगनज़र है तो फिर लोग क्या करें, हो जिसमें सबकी बात वो नारा नहीं मिलता। लो जान हथेली पे तो […] Read more »
गजल रिश्तों को निभाना है मगर यह नहीं सोचा…. May 8, 2013 / May 8, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी पैसा तो कमाना है मगर यह नहीं सोचा, किरदार बचाना है मगर यह नहीं सोचा। मंदिर बने मस्जिद बने हंगामा है बरपा, मकतब भी बनाना है मगर यह नहीं सोचा। बेटा मेरा अफ़सर बने हर बाप का सपना, इंसां भी बनाना है मगर यह नहीं सोचा। कीमत चुका के आपने रिश्ते […] Read more »
कविता व्यंग्य कविता : मनहूस चेहरा May 7, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा पूरे पांच वर्ष बाद चुनाव के समय जब नेताजी लौटकर अपने गाँव आए तो देखकर उन्हें गांववाले बहुत गुस्साए कहा, उनलोगों ने उनसे आप फ़ौरन यहाँ से चले जाइए और फिर कभी अपना यह मनहूस चेहरा हमें न दिखलाइए सुनकर यह नेताजी हो गए उदास कहा, लोगों को बुलाकर अपने पास भाई, अगर […] Read more » poem by milan sinha व्यंग्य कविता
कविता मैं कोई किताब नहीं May 6, 2013 / May 6, 2013 by मंजुल भटनागर | 1 Comment on मैं कोई किताब नहीं मंजुल भटनागर मैं कोई किताब नहीं , एक कविता भी नहीं , एक शब्द भी नहीं , मेरा कोई अक्स नहीं , कोई रूप नहीं , सिर्फ भाव् है , विचारों का एक पुलिंदा है ——- विचार और भाव जब फैलते हैं दिगंत में प्रकृति के हर बोसे में , मेरा अक्स फैल जाता है […] Read more » मैं कोई किताब नहीं
कविता भ्रष्टाचार को रोके कैसे ? May 5, 2013 / May 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on भ्रष्टाचार को रोके कैसे ? यू.पी. ए. 2 सरकार हमारी, भोली भाली और बेचारी, राजकुमार उनके ब्रम्हचारी, राज करें उनकी महतारी। प्रधानमंत्री भी भोले भाले, सारे काँण्ड करें मंत्रीगण, कभी कामनवेल्थ धोटाला, 2जी, 3जी मे नहा नहाकर, हैलीकौप्टर की घूस खाकर, कोलगेट से दाँत साफकर, आर्म्स गेट से अन्दर जाकर, रेल गेट से बाहर आकर, कलावती की रोटी खाकर, दामाद को अरबपति बनाकर, हम तो बालक भोले भाले, मंत्री हमारे सारे चमचे, भ्रष्टाचार को रोकें कैसे, वो ही तो हाथ पैर हमारे। Read more » poem by binu bhatnagar भ्रष्टाचार को रोके कैसे ?
कविता मजदूर May 4, 2013 / May 4, 2013 by मंजुल भटनागर | 1 Comment on मजदूर मंजुल भटनागर मजदूर कहाँ ढूंढ़ता हैं छत अपने लिए वो तो बनाता है मकान धूप में तप्त हो कर उसकी शिराओ में बहता है हिन्दुस्तान —- मजदूर न होता तो क्या कभी बनता मुमताज़ के लिए ताज महल सी शान और चीन की दिवार आश्चर्य, कहाती सीना तान —— मजदूर ने खडे किये गुम्बद मह्ल […] Read more » poem by manjul bhatnagar
कविता चंद शब्दों के अंश May 4, 2013 / May 4, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कुछ कहानियां और किस्से गाँव से बाहर के हिस्से में पुरानें बड़े दरख्तों पर टंगे हुए. कुछ कानों और आँखों में कही बातें जो थी किसी प्रकार कोमल स्निग्ध पत्तों पर टिकी और चिपकी हुई और चंद शब्दों के अंश जो टहनियों पर बचा रहें थे अपना अस्तित्व. यही कुछ तो था जो […] Read more » poem by praveen gugnani चंद शब्दों के अंश
आलोचना अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा May 4, 2013 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की […] Read more »
आलोचना विरोध और स्त्री May 4, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment आदित्य कुमार गिरि आमतौर पर यह धारणा है कि स्त्री विमर्श के अन्तर्गत स्त्री लेखिकाएँ पुरुषों के प्रति घृणा का भाव रखती हैं।उन्हें मानो पुरुष चाहिए ही नहीं।वे पुरुषवादी दृष्टिकोण से नफरत करने के क्रम में पुरुष से ही नफरत करने लगी हैं।पुरुष का हर रवैया उसे नापसंद है कुलमिलाकर वह स्त्रीवादी समाज में पुरुष […] Read more »
कविता अक्सर……………….!!! May 3, 2013 / May 3, 2013 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment अक्सर ज़िन्दगी की तन्हाईयो में जब पीछे मुड़कर देखता हूँ ; तो धुंध पर चलते हुए दो अजनबी से साये नज़र आते है .. एक तुम्हारा और दूसरा मेरा…..! पता नहीं क्यों एक अंधे मोड़ पर हम जुदा हो गए थे ; और मैं अब तलक उन गुमशुदा कदमो के निशान ढूंढ रहा हूँ. अपनी अजनबी ज़िन्दगी की जानी पहचानी राहो में ! कहीं […] Read more » poem by vijay kumar sappati
कविता आखिर क्यों ? May 3, 2013 by बीनू भटनागर | 8 Comments on आखिर क्यों ? हम कसाव को बिरयानी, खिलाते रहे- पूरी न्यायिक प्रकिया के बाद, लगाई फाँसी.. उन्होने सरबजीत को, पीट पीट कर मार डाला, मानवाधिकार, की बात करने वाले, सोते रहे। आखिर क्यों ? टाइम्स आफ इण्डिया , अमन की आशा जगाते रहे, अरनव गोस्वामी न्यूज आवर मे पाकिस्तानियों को, पैनल पर लाकर उनकी बकवास सुनते सुनाते […] Read more » poem by binu bhatnagar आखिर क्यों ?