कविता कविता : प्रशासन और दु:शासन May 3, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा जनता आज द्रौपदी बन गयी है पांडवों की ईमानदारी कल की बात हो गयी है कृष्ण का अता-पता नहीं गलत को ही लोग कह रहे हैं सही द्रौपदी का है बुरा हाल फैला है चारों ओर छल -प्रपंच का जाल प्रशासन के कारनामे हैं कमाल, बेमिसाल दु:शासन का बढ़ रहा अत्याचार जिधर देखो, […] Read more » कविता : प्रशासन और दु:शासन
कविता ज़िन्दगी May 3, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” क्या सर्दी और क्या गर्मी, मुफ़लिसी तो मुफ़लिसी है । कांपती और झुलसती ज़िन्दगी चलती तो है , पर भूख की मंज़िल तो बस खुदकुशी है । गंदे चीथड़ों में खुद को बचाती , इंसानी भेड़ियों से इज्ज़त छिपाती । हर रोज जीती और मरती है […] Read more »
कविता गीत कैसे बनाऊँ May 2, 2013 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बेसुरी सी ज़िन्दगी मे, स्वर मै कैसे लगाऊँ। गति ही जब रुक गई हो ताल कौन सी बजाऊँ वीणा के हैं तार टूटे, साज़ सारे मुझसे रूठे, संगीत को कैसे मनाऊँ, आज गीत गा न पाऊँ, कल शायद […] Read more » गीत कैसे बनाऊँ
गजल रिश्ते भी हो गये हैं व्यापार की तरह…. May 2, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी दावा तो कर रहे थे वफ़ादार की तरह , अब क्यों खड़े हैं आप ख़तावार की तरह। अफ़सोस मेरे क़त्ल में ऐसे भी लोग थे, आये थे घर मेरे जो मददगार की तरह । दौलत तमाम रिश्तों की चाबी है आजकल, रिश्ते भी हो गये […] Read more » रिश्ते भी हो गये हैं व्यापार की तरह....
कविता मुझको “तुम्हारी” ज़रूरत है! April 30, 2013 / April 30, 2013 by विजय निकोर | 3 Comments on मुझको “तुम्हारी” ज़रूरत है! दूर रह कर भी तुम सोच में मेरी इतनी पास रही, छलक-छलक आई याद तुम्हारी हर पल हर घड़ी। पर अब अनुभवों के अस्पष्ट सत्यों की पहचान विश्लेषण करने को बाधित करती अविरत मुझको, कि “पास” हो कर भी तुम व्यथा से मेरी अनजान हो कैसे, या, ख़्यालों के खतरनाक ज्वालामुखी पथ पर कब किस चक्कर, […] Read more » मुझको "तुम्हारी" ज़रूरत है!
कविता धुप पर सवार लय April 29, 2013 / April 29, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कहीं से एक लय सुनाई दे रही थी और दूर कहीं एक ताल जैसे उस लय को खोजती हुई तेज गर्मियों की धुप पर सवार होकर अपनें अस्तित्व के इकहरे पन को ख़त्म कर लेना चाहती थी. लय और ताल अपनी इस यात्रा में अपनें अस्तित्व को साथ लिए चलते थे किन्तु उनका ह्रदय […] Read more » धुप पर सवार लय
कविता हास्य व्यंग्य कविता : आरोप और आयोग April 28, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा आरोप और आयोग हमारे महान देश में जब जब घोटाला होता है और हमारे मंत्रियों , नेताओं आदि पर गंभीर आरोप लगाया जाता है तब तब सरकार द्वारा पहले तो इसे बकवास बताया जाता है लेकिन, ज्यादा हो-हल्ला होने पर एक जांच आयोग बैठा दिया जाता है आयोग का कार्यकाल महीनों, सालों का […] Read more » आरोप और आयोग हास्य व्यंग्य कविता
कविता अम्माँ April 28, 2013 / April 28, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment बच्चे ज्यों ज्यों हुये सयाने, चीर पुराने अम्माँ के । खेत हुये बेटों के बस कुछ पानी दाने अम्माँ के । सबसे सुंदर कमरे में माँ बहू बनी दर्पण तकतीँ बङी बहू के आते छिन गये ठौर ठिकाने अम्माँ के । पूछ पूछ कर अम्माँ से बाबूजी ईँटें चिनवाते । आँगन में […] Read more » अम्माँ
व्यंग्य हास्य व्यंग्य कविता: गांधीवादी परम्परा April 25, 2013 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on हास्य व्यंग्य कविता: गांधीवादी परम्परा मिलन सिन्हा हमारे नेता जी काफी चर्चित थे . जनता से जो काम करने को कहते थे उसे पहले खुद करते थे . इस मामले वे अपने को पक्के सिद्धान्तवादी-गांधीवादी कहते थे . एक बार उन्होंने कहा, हम गरीबी हटाकर रहेंगे अब गरीबी रहेगी या हम रहेंगे . सिद्धान्त के मुताबिक उन्होंने पहले अपनी गरीबी […] Read more » गांधीवादी परम्परा हास्य व्यंग्य कविता
व्यंग्य मैं आदमी नहीं हूं मुनिया! April 22, 2013 / April 22, 2013 by अशोक गौतम | 2 Comments on मैं आदमी नहीं हूं मुनिया! देश की राजनीतिक नगरी में आयोजित देश की महान विभूतियों के पद्म श्री और पद्म विभूषण सम्मान समारोह में स्वर्ग की परियों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। बड़े दिनों तक सोच विचार के बाद स्वर्ग के प्रशासन ने परियों को सम्मान समारोह मे आने की अनुमति नहीं दी तो परियों ने अपने […] Read more » मैं आदमी नहीं हूं मुनिया!
कहानी बच्चों का पन्ना झुन्ने और शन्नो April 22, 2013 / April 22, 2013 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment बसंत उभार पर था|और जब यह शहंशाह उभार पर होता है तो फिर क्या कहनें| जागते हुये भी लोगों को रंगीन और हसीन सपने आने लगते हैं|चारों तरफ बहार ,क्या जंगल क्या गांव और क्या शहर,मजे ही मजे|पीली सरसों, गेहूं की पकती हुईं बालियां और आम […] Read more » झुन्ने और शन्नो
कविता वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा April 22, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा मेरी तंग उदास गलियों में बिछे घनान्धकार ने अकस्मात जाना पूर्णिमा का चाँद इतना सौम्य, इतना संपन्न क्यूँ है ? मात्र तुम्हारे आने से मेरा संसार इतना दीप्तिमान क्यूँ है ? वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा […] Read more » वेदना ने स्पर्श जब पाया तुम्हारा