गजल अपनी ही आस्तीन में एक सांप है पला….. December 28, 2012 / December 28, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी है रहनुमा मेरा वो मेरे साथ ही चला, रहज़न नहीं मिला कोई किसने मुझे छला। औरों को रोशनी मिले वो इसलिये जला, इंसान वो लगा मुझे दुनिया से यूं भला। झूठा ना फ़रेबी है मगर आइना है वो, इंसान वो ज़माने को यूं ही तो है खला। रोता किसी को […] Read more »
कविता चलो नरेंद्र…….दिल्ली तुम को बोल रही December 28, 2012 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गुजरात के नये क्षितिज पर नवभारत की आशाएं कुछ डोल रहीं। चलो नरश्रेष्ठ, चलो नरेन्द्र! भारत माता की दिल्ली तुमको बोल रही।। पर दिल्ली जाने से पहले, भारत मां के पूत वेदों का ये संदेश कण्ठस्थ करो। मनुर्भव: जनया दैव्यं जनम और साथ में कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम हृदयस्थ करो।। राजसूय अभी शेष है […] Read more » poem for narendra modi
कविता नये साल का शोर क्यों? December 28, 2012 / December 28, 2012 by श्यामल सुमन | Leave a Comment कुछ भी नया नहीं दिखता पर नये साल का शोर क्यों? बहुत दूर सत – संकल्पों से है मदिरा पर जोर क्यों? हरएक साल सब करे कामना हो समाज मानव जैसा दीप जलाते ही रहते पर तिमिर यहाँ घनघोर क्यों? अच्छाई है लोकतंत्र में सुना है जितने तंत्र हुए जो चुनते हैं सरकारों […] Read more »
गजल बिखरा पड़ा है हर इक पर्चा मेरी वफ़ा का December 28, 2012 / December 28, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment परमजीत सिंह ! क्या खूब कर रही है चर्चा मेरी वफ़ा का ! वो आये गर हमारे पहलु में पूछ लेंगे ? क्या तुमने बना रक्खा है चेहरा मेरी वफ़ा का ! इक तुम ही मिले हो जो मुझे जानते नहीं ? हर शक्स जानता है किस्सा मेरी वफ़ा का ! सच […] Read more »
साहित्य छोटे साहिबजादे बड़ी कुर्बानी…. December 26, 2012 / December 25, 2012 by परमजीत कौर कलेर | 1 Comment on छोटे साहिबजादे बड़ी कुर्बानी…. ( स्पैशल 26 , 27 दिसम्बर) परमजीत कौर कलेर हमारा देश कुर्बानियों और शहादत के लिए जाना जाता है और यहां तक के हमारे गुरूओं ने भी देश कौम के लिए अपनी जानें न्यौछावर की हैं…देश और कौम के लिए अपनी शहादत देने के लिए गुरूओं के लाल भी पीछे नहीं रहें…जी हां गुरूओं […] Read more »
व्यंग्य प्रभु मोहे मन की मक्खी मिले December 25, 2012 / December 25, 2012 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव हमें गर्व है कि हम उस मक्खी-प्रधान देश के वासी हैं जिसे कि मक्खियों के मामले में दुनिया में एक विकसित सुपरपावर देश का दर्जा हासिल है। मक्खी हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मक्खी के बिना हमारी ज़िंदगी वैसी ही बेमतलब है जैसे गोरेपन की क्रीम के बिना रेशमी त्वचा। […] Read more » प्रभु मोहे मन की मक्खी मिले
कविता भीगी यादें December 25, 2012 / December 25, 2012 by विजय निकोर | Leave a Comment विजय निकोर तुम्हारी रुपहरी यादें लौट आती हैं इस तरह जैसे प्रतीक्षक पर्वत पर बादल ! बादल आ-आकर करते आलिंगन शिलीभूत धीर शिख़र का, पर्वत से लिपटे और पर्वत से अलग भी, बिखरे-बिखरे, खेल-खेल में धूप-छाओं, अभी उजाला, अभी अंधेरा करते, माथा टकराते, बरस-बरस पड़ते । ऐसी बेमौसम बारिश में जाग उठती है सोई […] Read more »
कविता श्रध्दानन्द की अमर कहानी December 22, 2012 / December 22, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment हम सब मिल शीश झुकायेंगे, उस वीर धीर बलिदानी को, उस वेद राह लासानी की गायेंगे अमर कहानी को। अट्ठारह सौ सत्तावन में, तलवन की भूमि पावन कर दी, नानक, शिवदेवी के घर में, मुन्शी ने आकर खुशी भर दी। बुद्धि कुशाग्र सुन्दर बालक, मिल गया सेठ-सेठानी को॥ हम सब… पैसे की कोई […] Read more »
गजल बन जाओगे मिसाल ज़माने के वास्ते….. December 21, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी ज़ालिम को जा रहा हूं बताने के वास्ते, मेरा लहू नहीं है बहाने के वास्ते। मुफ़लिस हैं शेरदिल हैं मगर सो गये हैं जो, रहबर बनो तो उनको जगाने के वास्ते। हक़ पे हो मुजाहिद हो तो कोहराम मचादो, बन जाओगे मिसाल ज़माने के वास्ते। खुद अपने घर को […] Read more »
साहित्य बड़ा दिन यानी भीष्म पितामह का निर्वाण पर्व December 19, 2012 / December 19, 2012 by राकेश कुमार आर्य | 4 Comments on बड़ा दिन यानी भीष्म पितामह का निर्वाण पर्व महाभारत का युद्घ संसार का प्राचीन काल का विश्व युद्घ था। इस युद्घ को कुछ लोगों ने भारतीय इतिहास को अंधकारमयी सिद्घ करने के लिए काल्पनिक करार दिया। लेकिन वैज्ञानिक शोधों से अब प्रमाणित हो चुका है कि महाभारत का युद्घ हुआ था। अब प्रश्न ये आता है कि यह युद्घ हुआ कब? सचमुच जानने […] Read more » भीष्म पितामह का निर्वाण पर्व
कविता अनुवर्त्ती रात December 15, 2012 / December 15, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on अनुवर्त्ती रात विजय निकोर दीवार पर दो घड़ियाँ लगा देने से रात कभी जल्दी नहीं कटती । कोई हादसा नया छोटा-सा, बड़ा-सा ढीठ और बेअदब संतरी-सा कमरे में खड़ा रात को सोने नहीं देता, सरकने नहीं देता । कितने पुराने असम्बद्ध हादसे कि जैसे सारे सोय संतरी जागे, इन आन्तरिक संतरियों की फ़ौज रात को अभित्रस्त […] Read more » अनुवर्त्ती रात
गजल बाहर तकरार देखिये December 13, 2012 / December 13, 2012 by श्यामल सुमन | Leave a Comment बाहर तकरार देखिये कैसा अजीब रिश्ता, व्यवहार देखिये लड़ते हैं, झगड़ते हैं मगर प्यार देखिये रहते नहीं जुदा ये कभी बात मजे की दिल में है प्यार, बाहर तकरार देखिये बाहर में कहते शौहर इक शेर है वही जाते ही घर में बनते हैं सियार देखिये समझौता हुआ ऐसा बेगम से काम […] Read more »