कविता शिखा श्रीवास्तव की कविता : कितनी अजीब है रिश्तों की कहानी… December 13, 2012 / December 13, 2012 by शिखा श्रीवास्तव | Leave a Comment ऐसी है बेईमान रिश्तों की कहानी, ताउम्र बंधन का दंभ भरने वाले रिश्ते, एक ही पल में बदल देते हैं अपना रंग और रूप कितनी अजीब है रिश्तों….। जिन मां-बाप ने पाला-पोसा बेटी को, विवाह की बेला आते ही क्यों कम हो जाता है, उनका हक और अधिकार कितनी अजीब है रिश्तों ….। जिस आंगना […] Read more »
कविता कविता : अजीब है ये जिंदगी भी December 13, 2012 / December 13, 2012 by मनीष जैसल | Leave a Comment अजीब है ये जिंदगी भी अजनबी सी ना जाने क्यों लगती है ज़िन्दगी , मुझ पर हसती सी क्यों लगती हैं ज़िन्दगी, रिश्तों की धुप में हमने देखे हैं कितने साये , किसी को अपना किसी को पराया समझती हैं ज़िन्दगी, पल पल में जुडती है इस ज़िन्दगी की सांसें एक ही पल में मगर […] Read more »
कविता मैं … शीर्षकहीन ! December 10, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on मैं … शीर्षकहीन ! विजय निकोर तुम ! तुम्हारा आना था मेरे लिए जीवनदायी सूर्य का उदित होना, और तुम्हारा चले जाना था मेरे यौवन के वसंतोत्सव में एक अपरिमित गहन अमावस की लम्बी कभी समाप्त न होती विशैली रात । मुझको लगा कि जैसे मैं बिना खिड़्की, किवाड़ या रोशनदान की किसी बंद कोठरी में बंदी थी, और […] Read more » poem by vijay nikor
गजल प्यार है लाज़िमी ज़िंदगी के लिये….. December 10, 2012 / December 10, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी तुमने उनको चुना रहबरी के लिये, वो जो मशहूर हैं रहज़नी के लिये। सिर्फ जज़्बातो ताक़त ही काफी नहीं, हौंसला चाहिये दुश्मनी के लिये। शर्त यह है कि तक़सीम सबमें करंे, अपना खूं देंगे हम रोशनी के लिये। भूल लम्हों की सदियां सज़ा पायेंगी, ख़बरें ना छापिये सनसनी के लिये। […] Read more » gazal by iqbal hindustani प्यार है लाज़िमी ज़िंदगी के लिये.....
कविता सम्प्रेषण और भंगिमाएं December 10, 2012 / December 10, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment सम्प्रेषण और भंगिमाएं दोनों की सीमाओं पर सतत निरंतर आँखों का सदा ही बना रहना और पता चल जानें से लेकर प्रकट हो जानें तक की सभी चर्चाओं पर सदा बना रहता है सूर्य. सूर्य के प्रकाश में भावों को भंगिमाओं में बदलनें की ऊर्जा मिलती तो है किन्तु परिवर्तन के इस प्रवाह में सम्प्रेषण […] Read more » . सम्प्रेषण और भंगिमाएं
कविता कविता – उम्र का हिसाब December 8, 2012 / December 8, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment कितने बदल चुके हैं सिकुड़े हुए अंतरिक्ष में मौन तिलक लगाकर मेहराब से टूटता कोई पत्थर कि युगों पुराना अदृश्य हाथ पसीने से सरोबार होकर इसी पत्थर में मेहराब की सर्जना की थी । पहली बार मुझे लगा अंतरिक्ष में दिशाहीन आवेश चेहरे पर आंखें गड़ाये टूकुर-टूकुर देख रहा है उन गोद में बसे […] Read more » poem by motilal कविता - उम्र का हिसाब
कविता जो कह चूका गीत उसे भी न भूल जाओ December 8, 2012 / December 8, 2012 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment तुम्हे मेरे सपनो में अब भी देखा करता हूँ कभी भी यहाँ वहाँ पहले की ही तरह अब भी भटका करता हूँ .. नहीं होते हैं चलती साँसों मैं पेंच अब उस तरह के पर हर साँस से मैं गिरते फूलो को थामा करता हूँ.. साँसों से खयालो की डोर अब भी खिचती चली आती […] Read more »
कविता लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में , December 8, 2012 / December 8, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में , अर्थी चड़ी बहुत कन्याये बैठ न पाई डोली में , कितनो ने अपनी कन्यायो के पीले हाथ कराने में कहाँ कहाँ तक मस्तक टेकें आती शर्म बताने में , जिस पर बीती वही जानता ,शब्द नहीं है कहने को , कितनो ने बेचें […] Read more » poem by manish jaiswal लाखो घर बर्बाद हो गये इस दहेज़ की बोली में
व्यंग्य व्यंग्य बाण : भाषण की दुकान December 4, 2012 by विजय कुमार | Leave a Comment विजय कुमार अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार खाली दिमाग शैतान का घर होता है। यह कहावत संभवतः बच्चों और युवाओं के लिए बनाई गयी होगी; पर शर्मा जी ने जब से अवकाश लिया है, तब से यह उन पर भी फिट बैठ रही है। उनके इस खालीपन से सबसे अधिक परेशान शर्मानी मैडम हैं। […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य बाण : पुस्तक का गर्भकाल December 4, 2012 by विजय कुमार | 1 Comment on व्यंग्य बाण : पुस्तक का गर्भकाल विजय कुमार प्राणी शास्त्र के विद्यार्थियों को यह बताया जाता है कि किस प्राणी का गर्भकाल कितना होता है ? अंडे से जन्म लेने वाले प्राणियों का विकास मां के पेट के अंदर तथा फिर बाहर भी होता है। जो प्राणी सीधे मां के पेट से जन्मते हैं, उनमें से कोई छह मास गर्भ में […] Read more » पुस्तक
आलोचना दान : उपकार या पाखण्ड December 1, 2012 / December 1, 2012 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी विश्वस्तर पर गरीबों, असहायों तथा शारीरिक व मानसिक रूप से असहाय लोगों की सेवा करने हेतु तरह-तरह के निजी व स्वयंसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। दुनिया में बड़े से बड़े दानी सज्जनों का भी एक ऐसा वर्ग है जो इस प्रकार के बेसहारा व कमज़ोर वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए […] Read more » charity
कहानी कहानी / सामञ्जस्य November 30, 2012 by गंगानन्द झा | Leave a Comment मानिक बन्द्योपाध्याय भीतर और बाहर से गम्भीर होकर उस दिन प्रमथ घर लौटा। बहुत दिनों के बाद आज वह गहरी शान्ति महसूस कर रहा है, परम मुक्ति का स्वाद आज उसे मिला है। सोचविचार कर, भावना चिन्ता कर मन स्थिर कर पाने के बाद ही आश्चर्यजनक रूप से उसका मन शान्त हो गया है। आज […] Read more »