व्यंग्य आर्ट आफ र्टार्चिंग March 6, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बाजारवाद के मौजूदा दौर में आए तो मानसिक अत्याचार अथवा उत्पीड़न यानी र्टार्चिंग या फिर थोड़े ठेठ अंदाज में कहें तो किसी का खून पीना… भी एक कला का रूप ले चुकी है। आम – अादमी के जीवन में इस कला में पारंगत कलाकार कदम – कदम पर खड़े नजर आते हैं। […] Read more » आर्ट आफ र्टार्चिंग
व्यंग्य मैया मोरी , मैं नहीं संसद जायौ! February 26, 2015 by अशोक गौतम | 2 Comments on मैया मोरी , मैं नहीं संसद जायौ! हांतो रसिको! आज आपको ससंद पुराण कीआगे की कथा सुनाता हूं। संसद पुराण अनंत है। इसकी कथाएं अनंत हैं। मेरी इतनी हिम्मत कहां जो इन सात दिनों में आपके सामने पूरे संसद पुराण की कथा बांच सकूं। उसे सुनने के लिए तो ……. पिछले चार दिनों से आपने ससंद पुराण की कथा जिस लगन से […] Read more » मैं नहीं संसद जायौ
व्यंग्य समय से पहुंचने वाली ट्रेनें ही दे दीजिए February 25, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment हे रेलवे के नीति – नियंताओं ! हमें मंजिल पर समय से पहुंचने वाली ट्रेनें ही दे दीजिए …!! तारकेश कुमार ओझा चाचा , यह एलपी कितने बजे तक आएगी। पता नहीं बेटा, आने का राइट टेम तो 10 बजे का है, लेकिन आए तब ना…। शादी – ब्याह के मौसम में बसों की कमी के […] Read more » समय से पहुंचने वाली ट्रेनें ही दे दीजिए
व्यंग्य छुट्टी का हक तो बनता ही है.. February 25, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment शर्मा जी बहुत दिन से घूमने नहीं आ रहे थे। न सुबह, न शाम। बाकी मित्र तो ज्यादा चिन्ता नहीं करते; पर मेरा मन उनके बिना नहीं लगता। बहुत दिन हो जाएं, तो बेचैनी होने लगती है। सो मैं उनके घर चला जाता हूं। मिलना का मिलना, और साथ में भाभी जी के हाथ के […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य बाण : वी.वी.आई.पी. खांसी February 21, 2015 / February 23, 2015 by विजय कुमार | 2 Comments on व्यंग्य बाण : वी.वी.आई.पी. खांसी मुझे फिल्म देखने का कभी शौक नहीं रहा। हां, अच्छे गीत सुनने से मन-मस्तिष्क को आराम जरूर मिलता है। बालगीत भी बहुत अच्छे लगते हैं। ऐसे कुछ गीत और कविताएं मैंने भी लिखी हैं। कई बड़े अभिनेताओं ने बालगीत गाये हैं, यद्यपि वे स्थापित गायक नहीं है। इनमें अशोक कुमार द्वारा फिल्म ‘आशीर्वाद’ में गाया […] Read more » वी.वी.आई.पी. खांसी
व्यंग्य न्याय बिकता है February 19, 2015 by अनुज अग्रवाल | 4 Comments on न्याय बिकता है चरित्र जज साहब, कपिल सिब्बल, गरीब किसान दीना और उसका वकील सुरेश … (किसान दीना के खेत पर प्रधान ने कब्जा कर लिया है | सुनवाई हो ही रही थी कि सिब्बल साहब का फ़ोन आ जाता है) कपिल सिब्बल :- “हेल्लो हजूर, .. माईबाप हैं का ? जज साहब :- कहिये क्या हुआ […] Read more » न्याय बिकता है
व्यंग्य प्रेम दिवस : श्याम सिंह की अधूरी कहानी February 14, 2015 / February 14, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment तब तक बाबा वैलेंटाइन का आविर्भाव भारत की धरा पर नहीं हुआ था। ये कहना मुश्किल है कि उस दौर में देश, प्रेम के प्रभाव से मुक्त्त रहा होगा। प्रेम पर ग्रन्थ और महाकाव्य आदि काल से यहाँ लिखे जा चुके थे। वैलेंटाइन बाबा के दादा-परदादा की औकात नहीं थी कि हिंदुस्तानी प्रेम की ए-बी-सी भी समझ पाते। सोलह कला सम्पन्न भगवान यहाँ […] Read more » प्रेम दिवस
व्यंग्य ” बीबी ” वाले भी “वैलेंटाइन ” ढूँढ रहे हैं February 14, 2015 / February 14, 2015 by आलोक कुमार | Leave a Comment आज सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देनेवाले हमारे देश में संस्कृति मखौल का विषय बन गई है , सभ्यता धुंधली पड़ रही है और संस्कारों का “अंतिम-संस्कार” किया जा चुका है l पहनावे में,बोलचाल में,रहन-सहन में , पर्व-त्यौहार , राजनीतिक-सामाजिक जीवन में हर गलत चीज को मान्यता मिल रही है l आज की मौजूदा पीढ़ी के पास “कॉकटेल” है पूरब और पश्चिम का और अनुभवी लोगों […] Read more » वैलेंटाइन
व्यंग्य व्यंग्य बाण : चमत्कारी अंगूठी February 12, 2015 / February 12, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद परसों मैं शर्मा जी के घर गया, तो एक बाल पत्रिका उनके हाथ में थी। वे एक कहानी पढ़ रहे थे, जिसका शीर्षक था ‘चमत्कारी अंगूठी’। मैंने प्रश्नाकुल आंखों से बुढ़ापे में बाल पत्रिका पढ़ने का कारण पूछा, तो उन्होंने चुपचाप पत्रिका मुझे थमा दी और खुद अंदर […] Read more » चमत्कारी अंगूठी
व्यंग्य ई जो है पॉलिटिक्स…!! February 9, 2015 / February 9, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा राजनयिक और कूटनीतिक दांव – पेंच क्या केवल खादी वाले राजनीतिक जीव या सूट – टाई वाले एरिस्टोक्रेट लोगों के बीच ही खेले जाते हैं। बिल्कुल नहीं। भदेस गांव – देहातों में भी यह दांव खूब आजमाया जाता है। बचपन में हमें अभिभावकों के साथ अक्सर घुर देहात स्थित अपने ननिहाल […] Read more » पॉलिटिक्स
व्यंग्य चुनावी मौसम, देश भक्ति का आलम February 6, 2015 by रवि श्रीवास्तव | 1 Comment on चुनावी मौसम, देश भक्ति का आलम चुनावी मौसम आते ही राजनीतिक पार्टियों के नेताओं में जबरजस्त देश भक्ति का आलम जाग उठता है। जो 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन देखने को मिलता है। हर प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में गाने देश भक्ति के गाने बजते हैं। कार, आटो, से लेकर रिक्शा तक में हम जिएगें और मरेगें ए […] Read more » चुनावी मौसम देश भक्ति का आलम
व्यंग्य मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी February 5, 2015 by अनुज अग्रवाल | 2 Comments on मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी गतांक से आगे (पढ़े पिछला अंक “तोरई आदमी पार्टी ”) मित्रों तोरई आदमी पार्टी अपना पहला चुनाव लड़ने जा रही है | दिल्ली का चुनाव | और चुनाव बिना घोषणापत्र के नहीं लड़ा जा सकता | बाकी सभी पार्टियों के अपना अपना मैनिफेस्टो जारी कर दिया है | आज हम भी अपनी पार्टी का […] Read more » तोरई आदमी पार्टी मैनिफेस्टो मैनिफेस्टो: तोरई आदमी पार्टी