व्यंग्य

 फेसबुक टैगिंग या फिर डिजिटल रैगिंग

डिजिटल आपाधापी के इस घोर कलयुग में भी इंसानियत समाप्त नहीं हुई है, अभी भी कई लोग टैग की गई सभी पोस्ट अपनी वाल पर दिखने के लिए allow कर देते है। दया और करुणा का एक्स्ट्रा रिचार्ज करवा कर धरती पर डिलीवर किये गए लोग तो टैग किए जाने पर इतने भावविभोर हो जाते है कि टैग किये जाने को ही अपना सम्मान समारोह समझ लेते है और कमेंट बॉक्स में “थैंक्स फॉर द टैग” लिखकर टैगीत होने के ऋण से उऋण होते है।

हां, भगवान है   

अब पटना में देखो। वहां विपक्ष से अधिक बखेड़ा सत्ता पक्ष में ही चल रहा है। पहलवान हर दिन लंगोट लहराते हैं; पर बांधते और लड़ते नहीं। लालू जी का निश्चय है कि उनके घर का हर सदस्य उनकी भ्रष्ट परम्परा को निभाएगा। उन्होंने चारा खाया था, तो बच्चे प्लॉट, मॉल और फार्म हाउस खा रहे हैं। आखिर स्मार्ट फोन और लैपटॉप वाली पीढ़ी अब भी घास और चारा ही खाएगी क्या ? उधर नीतीश कुमार अपने सुशासन मार्का कम्बल से दुखी हैं। पता नहीं उन्होंने कम्बल को पकड़ रखा है या कम्बल ने उन्हें। इस चक्कर में शासन भी ठप्प है और प्रशासन भी। फिर भी हर साल की तरह वहां बाढ़ आ रही है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान का अस्तित्व जरूर हैं।