व्यंग्य व्यंग/ भ्रष्टाचार के बदलते रंग December 14, 2009 / December 25, 2011 by सतीश सिंह | Leave a Comment कलयुग में एक मुस्लिम फ़कीर अपनी दुआ बिना कैश और काइंड लिये हुए राहगीरों को अता फ़रमा रहा है-अल्लाह आपकी नाज़ायज़ तमन्नाओं को पूरा करे। अल्लाह आपको ज़कात और ख़ैरात देने के काबिल बनाये। अल्लाह आपको हाज़ी-नमाज़ी और पाज़ी बनाये। अल्लाह आपको कोड़ा की सोहबत में रखे। अल्लाह आपको अच्छी कंपनियों के खाते अता फ़रमाये। […] Read more » Corruption भ्रष्टाचार
व्यंग्य व्यंग्य/ एक डिर्स्टब्ड जिन्न November 28, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कंप्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद […] Read more » vyangya व्यंग्य
राजनीति व्यंग्य उल्टा-पुल्टा व्यंग्य / नेताजी का जनम दिन November 28, 2009 / December 25, 2011 by पंकज व्यास | Leave a Comment छुट भैयेजी मनाए जनम दिन। बांटें कंबल, मिठाई, फल-फूल बिस्किट। जनता मारे ताने, सुन मेरे भैये, जनम दिन पर याद नहीं आया होगा सगा बाप। पर, नेताजी का जनम दिन मनाएं धूमधाम। भैये जी क्या समझाए मुई जनता को मेरे यार। खुद का जनम दिन मत मनाओ, पर बड़े नेताजी का जनम दिन तो मनाना […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य अब आगे देखेंगे हम लोग : व्यंग्य – अशोक गौतम November 9, 2009 / December 25, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment धुन के पक्के विक्रमार्क से जब रामदीन की पत्नी की दशा न देखी गई तो उसने महीना पहले घर से बाजार आटा दाल लेने गए रामदीन को ढूंढ घर वापस लाने की ठानी। रामदीन की पत्नी का विक्रमार्क से रोना नहीं देखा गया तो नहीं देखा गया। ये कैसी व्यवस्था है भाई साहब कि जो […] Read more » Ashok Gautam Satire अशोक गौतम व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य: खट्टे सपने के सच – अशोक गौतम November 2, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment रात व्यवस्था की दीवारों से खुद को लहूलुहान करने के बाद थका हारा छाले पड़े पावों के तलवों में नकली सरसों के तेल की मालिश कर नकली दूध का गिलास पी फाइबर के गद्दों पर जैसे कैसे आधा सोया था कि अचानक जा पहुंचा गांव। देखा गांव वाले लावारिस छोड़ी अपनी गायों को ढूंढ ढूंढ […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य बिल है कि मानता नहीं.. October 30, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 1 Comment on बिल है कि मानता नहीं.. बिल, टैक्स, सेक्स और सेंसेक्स… जीवन का अर्थशास्त्र इन सबके इर्द-गिर्द घूम रहा है। उधर दुनिया में बिलगेट्स छाए हुए हैं, इधर हम बिल-टैक्स से जूझ रहे हैं। कई बार लगता है कि मनुष्य का जन्म बिल और टैक्स भरने के लिए ही हुआ है। इन बिलों का भरते-भरते मनुष्य का दिल बैठा जाता है […] Read more » Bill Girish Pankaj गिरीश पंकज बिल है कि मानता नहीं व्यंग्य
व्यंग्य नानक दुखिया सब करोबार : व्यंग्य – अशोक गौतम October 26, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on नानक दुखिया सब करोबार : व्यंग्य – अशोक गौतम धुन के पक्के विक्रमार्क ने जन सभा में वर्करों द्वारा भेंट की तलवार कमर में लपेटी चुनरी में खोंस बेताल को ढूंढने महीनों से खराब स्ट्रीट लाइटों के साए में निकला ही था कि एक पेड़ की ओट से उसे किसीके सिसकने की मर्दाना आवाज सुनाई दी। विक्रमार्क ने कमर में ठूंसी तलवार निकाल हवा […] Read more » Ashok Gautam Nanak Dukhiya Karobar अशोक गौतम करोबार नानक नानक दुखिया सब करोबार व्यंग्य
व्यंग्य योगा: नया आइटम सांग…. गिरीश पंकज October 23, 2009 / December 26, 2011 by गिरीश पंकज | 2 Comments on योगा: नया आइटम सांग…. गिरीश पंकज पहले सड़कों पर तमाशा दिखाने वाले मदारियों का ड्रेस कोड नहीं होता था। अब वे समझदार हो गए हैं। आजकल वे भगवा ड्रेस में नज़र आते हैं। उस दिन शहर में एक हाइटेक मदारी आया। वह भगवा ड्रेस पहने हुए था। मदारी ने डुगडुगी बजाई । भीड़ जुटी। मदारी ने पापी पेट के लिए सबके […] Read more » Girish Pankaj Item Song Yoga आइटम सांग गिरीश पंकज योगा
व्यंग्य इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम : व्यंग्य – अशोक गौतम October 22, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on इक्कीसवीं सदी के लेटेस्ट प्रेम : व्यंग्य – अशोक गौतम वे सज धज कर यों निकले थे कि मानो किसी फैशन शो में भाग लेने जा रहे हों या फिर ससुराल। बूढ़े घोड़े को यों सजे धजे देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। बेचारों के कंधे कोट का भार उठाने में पूरी तरह असफल थे इसीलिए वे खुद को ही कोट पर लटकाए चले […] Read more » 21st Century Ashok Gautam Latest Love अशोक गौतम इक्कीसवीं सदी लेटेस्ट प्रेम व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य: अवतारी अब बाजारन के – अशोक गौतम October 18, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment हे मेरे देश के दीवाली के दिन राम के चौदह बरस का बनवास काट कर आने की खुशी में रात भर जुआ खेलने वाले जुआरियो! हे मेरे देश के दीवाली के नाम पर मातहतों का गला काट कर गिफ्टों के नाम पर शूगर के पेशेंट होने के बाद भी अपना घर मिठाइयों से भरने के […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य साहित्य व्यंग्य/ चलो हरामपना करें !! October 7, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ चलो हरामपना करें !! सरकारी नौकरी लगते ही नालायक से नालायक बंदे की दिली इच्छा होती है कि वह महीना भर घर में, दफ्तर में कुर्सी पर सर्दियों में हीटर के आगे टांगें पसार कर, गर्मियों में पंखे के नीचे उंघियाता रहे और हर पहली को पेन भी औरों का ले सेलरी के कालम में घुग्गी मार जेब पर […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य साहित्य व्यंग्य/दाम बनाए काम October 5, 2009 / December 26, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment धुन के पक्के विक्रमार्क ने पुन: मैली कुचैली बिजलीविहीन संपूर्ण सफाई अभियान में पुरस्कृत हुई माडल गली से भूख भय, भ्रष्टाचार के मारे बीमार वोटर के शव को उठाया और उसे कंधे पर डाल कर राज्य सभा की ओर बढ़ने लगा। तब शव के अंदर के वोटर ने अपना गला साफ करते हुए कहा, ‘हे […] Read more » vyangya व्यंग्य