सीबीआई ने धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई की है या एनडीटीवी की स्वतंत्रता के खिलाफ? – एस. गुरुमूर्ति

पूरे यूपीए सरकार के कार्यकाल में, एनडीटीवी ने अपनी शेल सहायक कंपनियों में निवेशकों की पहचान का खुलासा करने से इनकार कर दिया। यहाँ तक कि उसने कानूनन आवश्यक अपेक्षित विदेशी सहयोगियों की बैलेंस शीट को भी संलग्न नहीं किया। हैरत की बात तो यह कि यूपीए सरकार के कंपनी कानून विभाग ने भी बैलेंस शीट संलग्न न करने की अनुमति दे दी । इस कूट प्रक्रिया के चलते, बैलेंस शीट से अपनी लंदन शेल सहायक कंपनी में किये गए $ 310 मिलियन डॉलर के पूरे निवेश को बाहर रखा गया, जिसकी 3000 कंपनियों का एक ही पता है, अर्थात सभी एकसाथ एक ही कार्यालय से संचालित की जा रही हैं । ब्रिटेन की कंपनी ने स्वेच्छा से कहा कि उसकी कोई देनदारी नहीं है। उसकी $ 100 मिलियन की बांड देयता और उस पर $ 20 मिलियन का ब्याज, समझौते के बाद 72 मिलियन डॉलर के भुगतान से निबट गया है । एनडीटीवी कर विभाग को निवेशकों या रिफाइननियरों की पहचान नहीं दिखाएगा। परिणामस्वरूप शेल कंपनियों के जरिये एनडीटीवी में आई कुल 417 मिलियन डॉलर की निधियों पर कर चोरी और धन-शोधन (काले धन को सफ़ेद) करने का संदेह है।
जटिल वित्तीय ढांचे को छोड़भी दें तो जरा इस गोलमाल पर नजर दौड़ाईये – मुकेश अंबानी की एक कंपनी ने किसी दूसरी कंपनी को 403 करोड़ रुपये में एनडीटीवी के 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए ब्याज मुक्त ऋण दिया था। उसके बाद शून्य ब्याज के बांड को हिमाचल फर्टिरीशियन ग्रुप से संबंधित दूसरी कंपनी को 50 करोड़ रुपये में स्थानांतरित कर दिया गया – इस प्रकार अंबानी कंपनी को 353 करोड़ रुपये का शुद्ध नुकसान उठाना पड़ा और इसे कर व्यय के रूप में दर्शाया । अंबानी को एनडीटीवी के लिए यह नुकसान क्यों उठाना चाहिए ? क्या एनडीटीवी फंड जुटाने की यही स्वतंत्रता चाहती है ?
अंबानी की कंपनी ने एनडीटीवी के 26% शेयर 403 करोड़ में खरीदे, जबकि एनडीटीवी उनकी कीमत 1440 करोड़ मान रहा था, फिर उसने उन्हीं 26% शेयरों को हिमाचल फ्यूचरिस्टिक के नहटा को 50 करोड़ रुपये में बेच दिया | नाहटा ने शेयर एनडीटीवी के 1 9 2 करोड़ रुपये के कुल मूल्यांकन में खरीदे। ये अलग अलग वैल्यूएशन देखें | एनडीटीवी ने कर अधिकारियों के समक्ष पहले तो 10000 करोड़ रुपये का मूल्यांकन किया। यह जीई कॉरपोरेशन अमरीका द्वारा किये गए 2 अरब डॉलर के एक निवेश के लिए था और दूसरे के लिए $ 200 मिलियन मूल्य रखा । नविन जिंदल ग्रुप और अग्रवाल एग्रो टेक समूह ने एनडीटीवी के 173 करोड़ रुपये के 15% शेयर 26 करोड़ रुपये में खरीदे । एनडीटीवी ने सेबी के समक्ष उनका मूल्यांकन 367 करोड़ रुपये का किया। क्या ये भारी मूल्यांकन टैक्स के मुद्दों पर काले पीले का संकेत नहीं हैं?
यह सब पी. चिदंबरम की मिलीभगत से 2006 में शुरू हुआ –
यूपीए को सीढ़ी पर एनडीटीवी ने तेजी से बुलंदियों को छुआ । एक ईमानदार और साहसी कर अधिकारी, एस.के. श्रीवास्तव ने एनडीटीवी और तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के जुड़ाव के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य उजागर करने के कारण ठोकर खाई । उन्होंने उस खुफिया जानकारी की जांच की जिसमें वित्त मंत्री चिदंबरम ने खुद 5000 करोड़ रुपये प्राप्त किये थे ! कुछ नादान अधिकारियों ने इसी आधार पर श्रीवास्तव के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश कर दी । लेकिन उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि अगर उस आधार पर कार्यवाही हुई तो श्रीवास्तव के खिलाफ कुछ किया जाना संभव नहीं है । इसलिए उन्होंने उस फ़ाइल को दबा दिया या नष्ट कर दिया और एक अन्य फाइल बनाई जिसमें एसके श्रीवास्तव के खिलाफ उनके सहकर्मियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के लिए कार्रवाई की गई थी। लेकिन अधिकारी भी अड़ियल था, वह टूटा नहीं, और सिद्ध किया कि चिदंबरम संभवतः भारत के इतिहास में सबसे निंदनीय वित्त मंत्री थे। श्रीवास्तव ने यह भी पाया कि एनडीटीवी का आकलन करने वाली एक महिला आयकर अधिकारी टीवी चैनल के साथ मिलकर काम कर रही थीं, जिसने 2003 से 2007 तक अपने पति को नियुक्त किया और अपने पति के साथ खुशनुमा यात्राएं कीं ।
यह महिला अधिकारी भी बाद में आकलन का विषय बन गई और सीबीआई ने उन्हें भी कार्रवाई की जद में लिया । श्रीवास्तव ने एनडीटीवी द्वारा की गई भारी कर धोखाधड़ी की ओर इशारा करते हुए सबूतों का भी पता लगाया। उन्होंने एनडीटीवी का नया आकलन किया, जिसमें छह साल में कुल 300 करोड़ रुपये की कर धोखाधड़ी की जानकारी मिली । 7.3.2007 को, एस के श्रीवास्तव ने कर धोखाधड़ी के विवरण की जांच के लिए निरीक्षण नोट लिखा, इसे 07.03.2007 को सीसीआईएट पर भेज दिया, जिसने इसे 13.03.2007 को सीआईटी में पास किया। सीआईटी ने 17.3.2007 को नोटिस जारी किया, 29 दिसंबर, 2007 को एनडीटीवी को अवैध लाभ देने वाले आकलनों को अलग रखा और अगले दिन, 30.9 .2007 को, एसके श्रीवास्तव यह जानकर चौंक गया कि वित्त मंत्री चिदंबरम ने उन्हें निलंबित कर दिया है। एनडीटीवी द्वारा की गई विशाल कर धोखाधड़ी पर नज़र रखने और ट्रैकिंग के लिए उसे इस प्रकार पुरस्कृत किया गया ।
और उसके बाद यूपीए के सबसे शक्तिशाली वित्त मंत्री के खिलाफ एस के श्रीवास्तव की अभूतपूर्व लड़ाई शुरू हुई। तब से यह कर अधिकारी अकेला यह लड़ाई लड़ता चला आ रहा है । अगले कुछ वर्षों के दौरान श्रीवास्तव को और भी ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा: वित्त मंत्री के इशारे पर महिला कर अधिकारियों द्वारा यौन शोषण के आरोप, निलंबन, स्थानांतरण, झूठे आरोपों की एक श्रृंखला, यहाँ तक कि उन्हें पागल तक घोषित करने के भ्रष्ट प्रयास हुए, क्या क्या नहीं सहा इस ईमानदार अधिकारी ने ।
अकेले लड़ता यह इंसान 2013 में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के माध्यम से मुझे मिला । इस छः साल की अवधि में, सभी प्रकार के उत्पीड़न झेलने के बावजूद श्रीवास्तव ने कर विभाग की मदद की और एनडीटीवी की धोखाधड़ी को उजागर किया | विदेशों में सैंकड़ों मिलियन डॉलर की हेराफेरी – जिस पर मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले ही कर विभाग ने करारोपण शुरू कर दिया था । धोखाधड़ी वाले पैसे पर टैक्स लगाने के दौरान टैक्स अधिकारियों ने यही कहा: “प्रकरण में उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि कॉर्पोरेट के गोलमाल पर से पर्दा हटाने की आवश्यकता है | इतने बड़े पैमाने पर बिना किसी आधार या मूल्यांकन के दरों में इतने बड़े बदलाव में संलिप्तता, लेनदेन में आर्थिक आधार और व्यावसायिक उद्देश्य की कमी संदिग्ध है । “जब टैक्स अधिकारी ने 642.54 करोड़ रुपये का टैक्स आरोपित किया, एनडीटीवी ने विरोध किया, परिणाम यह हुआ कि टेक्स बढाकर 1406.25 करोड़ रुपये कर दिया गया । यह 2013 में हुआ, उस समय जबकि यूपीए सत्ता में थी, यह तो वह समय था, जब एनडीटीवी को धोखाधड़ी की पूरी आजादी हासिल थी ।
हर सवाल से भागते हैं ये –
जब संजय श्रीवास्तव ने मुझे समझाया और दस्तावेजों को दिखाया, मैंने राम जेठमलानी को एक नोट लिखा और एनडीटीवी के खिलाफ पूरे मामले को समझाया। जेठमलानी ने दिसंबर 2013 में पी चिदंबरम को एनडीटीवी धोखाधड़ी पर एक आरोप पत्र लिखा, जिसमें एनडीटीवी की रक्षा के लिए और श्रीवास्तव को दंडित करने के लिए दंडात्मक और भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों के विभिन्न वर्गों के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया था। जेठमलानी ने श्री प्रणय रॉय को भी मेरे नोट की एक प्रति भेज दी थी, उसके बाद रॉय ने मुझसे एक संपादक मित्र के माध्यम से संपर्क किया और कहा कि वह दस्तावेजों के साथ उस पर प्रतिक्रिया देना चाहेंगे। जब उनकी प्रतिक्रिया आई, तो मैंने पाया कि उनके द्वारा प्रस्तुत अधिकाँश दस्तावेज प्रामाणिक और विश्वसनीय नहीं थे । मैंने विस्तार से उन दस्तावेजों को अमान्य करने के कारण लिखे और बताया कि मैं क्यों जेठमलानी को लिखे अपने पूर्व पत्र के साथ खड़ा हूँ |
समापन में मैंने लिखा :
“मैंने अपने नोट में जो कुछ कहा है, और जिसे जेठमलानी ने आपको अग्रेषित किया है, मैं अब भी उसी दृढ मत का हूँ ।” उसके बाद प्रणय रॉय चुप हो गये। नातो उन्होंने मुझे कोई चुनौती दी और ना ही मुझ पर कोई मुकदमा किया:
क्या श्री रॉय अब बोलेंगे? सीबीआई ने धोखाधड़ी के खिलाफ कार्रवाई की है या एनडीटीवी की स्वतंत्रता के खिलाफ? क्या आप पैसे छिपाने की स्वतंत्रता चाहते हैं? सहायक कंपनियों की बैलेंस शीट को दबाने के लिए स्वतंत्रता? कर कानून में पूछताछ से स्वतंत्रता? स्वतंत्रता क्या है, अंबानी की आजादी क्या है?

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