लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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 डॉ. मयंक चतुर्वेदी

डोकलाम क्षेत्र को लेकर चीन के विदेश विभाग की ओर से लगातार जिस तरह के बयान दिए जा रहे हैं, उससे यही लगता है कि चीन किसी भी सीमा तक जाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्‍जा जमाने की मंशा रखता है। वह इन दिनों इसी कोशिश में लगा हुआ है‍ कि किसी भी तरह से भारत से धमकाने में सफल हो जाए और अपनी मंशाएं पूरी कर ले। डोकलाम पर पिछले दो माह से चल रहे गतिरोध पर अब चीन कह रहा है कि यदि सीमा पर भारत के बुनियादी ढांचे के खिलाफ हमारी सेना कदम उठाती है तो कोहराम मच जाएगा। चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा कहा जा रहा है कि चीन किसी भी देश या व्यक्ति को अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं देगा। डोकलाम पर जारी गतिरोध का समाधान भारत पर निर्भर है। समाधान के लिए भारत को क्षेत्र से बिना शर्त अपनी सेना को वापस बुलाना होगा।

इस पूरे मामले में चीन किस तरह से उलझा है और उसकी खीज किस तरह से बाहर निकल रही है, वह सीधेतौर पर दी गई उसकी इस प्रतिक्रिया से प्रकट हो रही है। चीन ने कोहराम मचा देने की बात कहकर यह जताने का प्रयत्‍न किया है कि वह चाहे तो भारत में 1962 जैसे हालात पैदा कर सकता है। किंतु वह इस सब के बीच इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि आज हिन्‍दी-चीनी भाई-भाई का नारा देने वाले और उसके मैत्रीपूर्ण संबंधों के झांसे में आनेवाले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तरह के वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिल्‍कुल नहीं हैं। आज भारतीय विदेश विभाग एवं गृहविभाग राजनीतिक एवं कूटनीतिक स्‍तर पर जो प्रक्रिया अपनाए हुए हैं, उससे यह स्‍पष्‍ट नजर भी आता है। प्रधानमंत्री मोदी कुछ नहीं बोल रहे, किंतु एक के बाद एक देश भारत के पक्ष में मोदी के समर्थन में चीन के विस्‍तारवाद के विरोध में उठ खड़े हुए हैं। पाकिस्‍तान को छोड़कर अब तक कोई देश ऐसा नहीं है, जिसने कि डोकलाम मुद्दे पर चीन का समर्थन किया हो, इससे भी पता चलता है कि भारतीय पक्ष इस क्षेत्र को लेकर कूटनीतिक स्‍तर पर कितना मजबूत है।

एतिहासिक परिदृष्‍य में यदि भारत एवं चीन के अतीत को देखें और भारतीय फौज की हार का अवलोकन करें तो स्‍पष्‍ट हो जाता है कि जब चीन ने सीमा विवाद को लेकर 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ भारतीय क्षेत्र पर हमले शुरू किये थे, उस समय दोनों मोर्चे में भारतीय बलों की तुलना में चीनी सेना इसलिए उन्नत साबित हुई थी क्‍योंकि हमारा राजनीतिक नेतृत्‍व सो रहा था और उसने चीन मामले में कठोर निर्णय लेने में बहुत देरी की थी। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नेहरु चीन के साथ अपनी दोस्‍ती की गलतफहमी में डूबे हुए थे, जबकि देश की आजादी के बाद से 15 दिसम्बर 1950, जब तक सरदार वल्‍लभ भाई पटेल भारत के गृहमंत्री रहे वे उन्‍हें बार-बार समझाते रहे थे कि हमें चीन से सदैव सावधान रहने की जरूरत है। नेहरू ने उनकी कही इस समझाइश को हमेशा नजरअंदाज किया था, जिसका परिणाम अपार पुरुषार्थ होने के बाद भी हार के रूप में 1962 के युद्ध में भारतीय सेना के साथ हम सभी को देखने को मिला।

इस युद्ध के बाद अक्साई चि‍न से भारतीय पोस्ट और गश्ती दल हटा दिए गए थे, जिसके बाद भारत के 43 हजार 180 वर्ग किलोमीटर पर चीन ने अवैध कब्जा कर लिया। इसमें  वर्ष 1962 के बाद से हमारी भूमि का 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तथा 2 मार्च 1963 को चीन तथा पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित तथाकथित  चीन-पाकिस्तान ‘सीमा करार’ के अंतर्गत पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को दे दिया। किंतु क्‍या वर्तमान में ऐसा कमजोर राजनीतिक नेतृत्‍व है ? जिस पर कहना यही होगा कि ऐसा बिल्‍कुल नहीं है। विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज और स्‍वयं प्रधानमंत्री व गृहमंत्री चीन की एक-एक हरकत पर सीधे नजर रखे हुए हैं।

इसे लेकर गृह मंत्री राजनाथ सिंह का वक्‍तव्‍य भी हर भारतीय के मन में उम्‍मीद जगाता है जिसमें उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की है‍ कि चीन शीघ्र ही सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाएगा। डोकलाम में जारी गतिरोध का समाधान शीघ्र निकल आएगा। भारत ने किसी देश पर कभी आक्रमण नहीं किया और यह किसी विस्तारवादी व्यवहार को भी बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन द्वारा सिक्किम सीमा के समीप स्थित डोकलाम में सड़क बनाने से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर खतरा पैदा होगा । डोकलाम पर पहले से भूटान का दावा है लेकिन चीन इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है। भूटान के प्रति सहयोग करने के लिए भारत ने संधि‍ की हुई है, भूटान का भारत के साथ हुआ यह सुरक्षा समझौता कहता है, कि भूटान की सुरक्षा का दायित्व भारत सरकार का है।

यथार्थ यही है कि भूटान और भारत के बीच 1949 से ही परस्पर विश्वास और स्थायी दोस्ती का करीबी संबंध है। दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग का करार है। 2007 में भारत और भूटान द्वारा हस्ताक्षर किए गये मैत्री संधि के अनुच्छेद 2 में कहा गया है कि भूटान और भारत के बीच घनिष्ठ दोस्ती और सहयोग के संबंधों को ध्यान में रखते हुए, भूटान साम्राज्य की सरकार और भारत गणराज्य की सरकार निकट सहयोग करेगी अपने राष्ट्रीय हितों से संबंधित मुद्दों पर एक दूसरे के साथ है।  वस्‍तुत: आज भूटान के अनुरोध पर भारतीय सैनिकों ने डोकलाम में चीन के सड़क निर्माण-कार्य को रोका है।  भारत तो अपने वायदे का पालन अपने स्‍तर पर करने का प्रयत्‍न कर रहा है। इसलिए वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में भारतीय सीमाओं पर चीन हमें कितनी भी आँखे दिखाता रहे, फर्क कुछ पड़नेवाला नहीं है। चीन को आज नहीं तो कल यह बात अवश्‍य ही सही ढंग से समझ आ जाएगी कि अब भारत 1962 का भारत नहीं रहा है, जो उसकी भभकियों के चलते समर्पण करने के लिए तैयार हो जाएगा।

इसके इतर जो चीन की असल परेशानी आज समझ आ रही है, वह विस्‍तारवाद के साथ एशिया का अकेले नेतृत्व करने की इच्छा रखता है, किंतु केंद्र में भाजपा की सरकार आने एवं प्रधानमंत्री मोदी के सशक्‍त नेतृत्‍व के कारण से लगातार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत का कद बढ़ रहा है, जिससे कि वह बेहद परेशान है। वह हमें एक प्रतिद्वंद्वी की तरह देख रहा है । विश्‍व में भारत आज तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में स्‍थापित हो रहा है। इसलिए समुची दुनिया हमारी ओर आशाभरी दृष्‍ट‍ि से देख रही है। दूसरी ओर चीन है जो अपनी विस्‍तारवादी नीति छोड़ने को कतई तैयार नहीं।

विस्‍तारवाद की इसी भूख के कारण ही 1959 में तिब्बत जैसे शांतिप्रिय राष्ट्र को उसने हड़प लिया। जिन्‍हें चीन का यह निर्णय पसंद नहीं आया, वहां उन सभी को या तो चीन ने मरवा दिया या फिर वे सभी अपनी जान बचाकर भारत जैसे लोकतान्त्रिक देशों में शरणार्थी बनकर अपना जीवन गुजारने पर मजबूर हैं। उसकी विस्‍तारवाद की भूख इतने पर भी शांत नहीं हुई । 1962 में हमारा 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हड़प गया, फिर पाकिस्‍तान के साथ मिलकर उसने अधिकृत कश्‍मीर का जिसका की पूर्व में जिक्र हुआ है 5180 वर्ग किलोमीटर हिस्‍सा अपने में मिला लिया, इतना करने के बाद भी वह चुप नहीं बैठा। चीन अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत दक्षिण चीन सागर पर अपने एकाधिकार का दावा करता है। जिसके कारण से इस क्षेत्र में आनेवाले देश विएतनाम, फिलीपींस, ब्रूनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया इत्‍यादि में चीन के प्रति आज भारी नाराजगी है।

दक्षिण चीन के मसले पर इसके तटीय देशों के अलावा अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, भारत आदि से भी चीन के मतभेद हैं। चीन ने यहां कई स्‍थानों पर अवैध समुद्री टापू स्‍थापित कर लिए हैं। वस्‍तुत: चीन की इसी विस्तारवादी मानसिकता के कारण ही तटवर्ती देश चीन के विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं। इस सब को देखते हुए कहना होगा कि भले ही सिक्किम सीमा पर भारत, चीन और भूटान के त्रिकोणीय मिलन (ट्राई जंक्शन) के नजदीक डोकलाम में भारतीय सेना को रात-दिन चीन का विरोध करना पड़ रहा हो,किंतु भारतीय सेना का अधिक से अधिक यहां मुस्‍तैद रहना चीन की विस्‍तारवादी सोच पर कहीं न कहीं अंकुश लगाने का काम कर रहा है। वस्‍तुत: चीन की विस्तारवादी नीति पर भारतीय प्रतिकार का आगे होकर जमीन पर विरोध करने का यह तरीका निश्‍चित ही उसे अपने मिशन में सफल करेगा, ऐसी आशा है ।

One Response to “चीन की विस्तारवादी नीति पर भारतीय प्रतिकार”

  1. R P Pandey

    बिस्तृत जानकारी देने के लिए बहुत बहुत धन्यबाद मयंक जी ,

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