लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

(एक)वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख “चर्च बिक रहे हैं”
लेखक का नाम है; Naftali BenDavid।
गत रविवार – ४ जनवरी २०१५ के वॉल स्ट्रीट जर्नल के आलेख पर आधारित है आज का आलेख।
नेदरलॅण्ड के कुल १६०० रोमन कॅथोलिक चर्चों में से,  दो तिहाई चर्च अगले दस वर्षों में बंद होने का अनुमान स्वयं रोमन कॅथोलिक चर्च के नेतृत्व ने ही लगाया है।
उसी प्रकार हॉलण्ड के ७०० प्रोटेस्टंट चर्च भी अगले चार वर्षों में बंद होनेका अनुमान है।
जर्मनी के रोमन कॅथोलिक चर्च ने ५१५ चर्च गत दशक में बंद किए हैं।
२०० डॅनिश चर्च अनुपयोगी हो चुके है।
इंग्लैण्ड भी प्रतिवर्ष प्रायः २० चर्च बन्द कर रहा है।
यही कहानी है, सारे युरप भर के चर्चों की।
“The numbers are so huge that the whole society will be confronted with it,” says Ms. Grootswagers, an activist with Future for Religious Heritage, which works to preserve churches.
Everyone will be confronted with big empty buildings in their neighborhoods.”
संख्या इतनी बडी है , कि, सारे समाज  को इस समस्या का सामना करना पडेगा; कहना है “ग्रुट्सवेजर” का जो धार्मिक परम्परा को बचानेवाली संस्था का काम करती है।

(दो) अमरिका अभी बचा है।
अमरिका अभी भी बचा हुआ है। पर “वॉल स्ट्रीट जर्नल का आलेख  का लेखक कहता है, अमरिका में भी चर्च जानेवालों की संख्या घट ही रही है। कहता है, अमरिका भी, आनेवाले वर्षों में इसी समस्या का सामना करेगा।
एक चर्च का पादरी दुःख के साथ कहता है, कि हम चर्च का मकान कोई जूआ-घर (कसिनो) बनते देख नहीं सकते, या कोई वासना (sex Shop) तृप्ति के व्यावसायिकों  के हाथ में जाने नहीं देना चाहते।

(तीन) वॉल स्ट्रीट जर्नल की सामजिक सर्वेक्षण सांख्यिकी ==>”चर्च जानेवाले घट रहे हैं।”
वॉल स्ट्रीट जर्नल की सामजिक सर्वेक्षण सांख्यिकी, कहती है, जिस के लेखक का नाम है; Naftali BenDavid कि, युरप में चर्च जानेवालों की संख्या घट चुकी है। ध्यान रहे इसाइयत सामूहिक प्रार्थना में विश्वास करती है। सप्ताह में एक बार चर्च जाना आवश्यक समझा जाता है। ये इसाइयत के संगठन की नींव है।आज निम्न प्रतिशत इसाई ही, कम से सप्ताह में एक बार चर्च जाते हैं। बहुत सारे चर्च खाली पडे हैं, इस लिए, चर्च की बैठकें खाली होती है।

(चार)चर्च जानेवालों इसाइयों के २०१२ के आँकडे :
आयर्लॅण्ड में ४८ %,
इटाली में ३९%,
नेदरलॅण्ड ३० %,
स्पैन २५%,
यु के २२%,
जर्मनी १२%,
फ्रांस ११%,
डेन्मार्क ५%
इतनी  इसाई जनसंख्या सप्ताह में कम से कम एक बार चर्च जाती है।
इस के कारण हज्जारों गिरजाघरों को बेचने की बारी आयी है। जिसका वृत्तान्त ऊपर आ ही  चुका है।
जब इसाईयत भौतिकता से ही अपना प्रभाव फैलाती है; तो ऐसा स्वाभाविक ही मानता हूँ। क्यों कि, भौतिकता का प्रभाव अल्प कालिक होता है। पर उसमें स्थायी आध्यात्मिक शक्ति अपवादात्मक  होती है। डेविड फ्राव्ले ने भी इसी बिन्दुका उल्लेख किया था; जो आप ने पढा ही है।

(पाँच) पाप आप करें, फिर इसाइयत स्वीकारें, और स्वर्ग आरक्षित”
कोई भोला-भाला मनुष्य ही,ऐसा तर्क सहसा मान लेगा। फिर भी इसाइयत, “पाप आप करें, पर इसाइयत स्वीकार करने पर, आप का स्वर्ग में स्थान आरक्षित करवाने का वचन देती है।” अब जब विज्ञान आगे बढ चुका है, तो पढी लिखी जनता इसे स्वीकार करने में हिचकिचाती है। इसके कारण चर्च जानेवालों की संख्या घटना संभव लगता है।
बुद्धिमान इसाई ऐसा वचन संभवतः स्वीकार नहीं कर सकता। फलतः इसाइयत में विश्वास घट रहा है। उसके अन्य कारण भी हो सकते हैं, पर यह एक कारण स्पष्ट है। कुछ मित्र जिन्हें जानता हूँ,वे भी ऐसी मान्यता रखते हैं।
फिर इसी की  पुष्टि करनेवाला यह आलेख भी गत रविवार (४ जनवरी २०१५)की,  “वॉल-स्ट्रीट जर्नल” के प्रथम पृष्ठ पर ही छपा है। जिसका शीर्षक है, (“Europe’s Empty Churches Go on Sale”–अर्थात युरप के चर्च बिक रहे हैं। इस लम्बे आलेख का उत्तरार्ध ८ वें पृष्ठ पर है।

(छः)बिके हुए गिरजाघरों के रंगीन छाया चित्र।
आलेख में तीन बिके हुए गिरजाघरों के रंगीन छाया चित्र भी छपे हैं। इन बिके हुए, चर्चों का  उपयोग कैसे किया जा रहा है, इसका अनुमान कीजिए। ये बडे बडे गिरजाघर हैं।
उदाहरणार्थ ब्रिस्टल इंग्लॅंण्ड का  “सॅन्ट पॉल चर्च”– “सर्कस ट्रैनिंग स्कूल” बना हुआ है। ऊंची दिवालों के कारण उसका ऐसा उचित उपयोग हो रहा है।
दूसरा एडिन्बरो का लुथरन चर्च फ़ॅन्केस्टाइन का बार (मद्यालय) बन चुका है।
और १९ वी शताब्दी का नेदरलॅण्ड का अर्नेहॅम चर्च बडी कपडोकी दुकान बन गया है।
एक चित्र में स्केटिंग की प्रशिक्षा दी जा रही है। दूसरे चित्र में सर्कस के कलाकारों को सिखाया जा रहा है। और तीसरे में एक  कपडों की बहुत बडी दुकान दिखाई गयी है।
इन युरप के देशों में चर्च नगर के केंद्र या मध्य में एक विशेष वास्तुकला का आकर्षण केंद्र हुआ करता था; उसे क्षति पहुंच रही है। आलेख इस समस्यापर ही प्रकाश फेंकता है। उसके हल पर मौन है, आलेख का अंत भी कुछ ऐसी हताशा ही दर्शाता है। “You have a building of value-historic value, cultural value-that is still owned by the (catholic) church.But there are no worshipers any more.”
“आप के पास एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक  मूल्य की वास्तु है, जिसका स्वामित्व चर्च के पास है। पर उसका उपयोग करनेवाले श्रद्धालु ही नहीं है।” इन्हीं शब्दों से आलेख का अंत होता है।
अब इन चर्च त्यागियों की तो घर वापसी भी नहीं हो सकती!
अस्तु।

18 Responses to “य़ुरप के चर्च बिक रहे हैं”

  1. इंसान

    डा: मधुसूदन जी द्वारा वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख “चर्च बिक रहे हैं” पर प्रस्तुत समीक्षा को पढ़ मेरे मन में अकस्मात् प्रश्न उठता है कि इसके विपरीत भारत में गली मुहल्लों में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे अथवा चर्च क्योंकर खुल रहे हैं? देश प्रदेश में भ्रमण करते इस स्थिति को समझने हेतु मैंने अपने हिंदुत्व में “राम राज्य” की कल्पना की है| वैश्विक और उपभोक्तावादी आधुनिक जीवन में जब नागरिक विद्या, दर्शन, दया, परोपकार, अनुशासन, धन-धान्य सहित वैभव, इत्यादि “धर्मों” से परिपूर्ण हो जाते हैं तो वे सापेक्षवाद को प्राप्त हो जाते हैं| ऐसी स्थिति में पूजा स्थलों का महत्व खो जाता है| जहां इन “धर्मों” का अभाव अथवा अभाव के कारण अनैतिकता, अनुशासनहीनता, और स्वार्थ पनपने लगता है तो लाचार नागरिक अपनी जीवन-डोर अपने इष्ट देवता पर छोड़ देते हैं और इस कारण पूजा स्थलों की आवश्यकता और बढ़ जाती है| विषय की नीरसता को मिटाने हेतु भारत में “राम राज्य” से “कांग्रेस राज” तक का सफ़र एक संक्षिप्त लघु कथा द्वारा सुनाता हूँ|

    एक युवा राजा ने तीन पीढ़ियों से राज्य की सेवा में लगे अपने बूड़े प्रधान मंत्री से कहा कि आपने मेरे दादा और मेरे पिता का राज्य देखा है और उनके इस अभ्यास पर आधारित उनसे स्वयं अपने राज्य की स्थिति के बारे में पूछा| बूढ़े प्रधान मंत्री ने जान माल की खैर मांगते हुए हाथ जोड़ कर राजा के दादा के राज्य में घटित एक घटना का वर्णन किया| आभूषणों से सजी लदी अपनी अति सुंदर नई नवेली दुल्हन को लेकर तड़के सवेरे दुल्हा बाजे गाजे समेत बारात के संग अपने गाँव की ओर जा रहा था| सफर के आध बीच एक भयंकर तूफ़ान आया और उसके रुकते वहां केवल आभूषणों से सजी लदी बेहोश दुल्हन रह गई थी| बाकी लोग अपनी जान बचा इधर उधर भाग गए थे| पास ही के एक गाँव के किसानों ने अपने खेत में बेहोश दुल्हन को पा उसे तुरंत गाँव के मुखिया के घर ले गए| घर की औरतों की सेवा देख-रेख से बेहोश दुल्हन को होश आने पर पूछताछ के बाद स्वयं मुखिया ने गाँव के कुछ पुरुषों को साथ ले आभूषणों से सजी लदी दुल्हन को उसके ससुराल पहुंचा दिया| बूढ़े प्रधान मंत्री ने युवा राजा के पिता के राज्य काल में एक ऐसी ही घटना का वर्णन करते बताया कि दुल्हन तो ससुराल पहुंचा दी गई लेकिन आभूषणों का क्या हुआ इसका आज तक किसी को पता नहीं लगा| आज युवा राजा के राज्य में दुर्भाग्य से वैसी ही घटना होने पर बूढ़े प्रधान मंत्री ने बताया कि आभूषण और दुल्हन दोनों का कहीं पता नहीं लग रहा है|

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  2. Rekha Singh

    ईसाइयत ज़िंदा है क्योकि दुनिया मे आर्थिक और सामाजिक असमानता है । पाश्चात्य जीवन शैली हमे भौतिकता की पराकाष्टा को जीने को प्रेरित करती है । बस यही एक जीवन है ” यावत् जीवेत सुखम जीवेत , ऋणम् कृत्वा घ्रितम् पिवेत
    भष्मी भूतस्य देहस्य , पुनरागमनः कुतः ? ——चारवाक
    आज दुनिया के देशो मे , उनकी संस्कृति पर प्रहार करके उनका जो शोषण किया गया उसके पीछे एक महान षड्यंत्र ही था की उनको इतना तितर -वितर कर दो की ऐ लोग कभी एकत्रित नही हो पाएगे और फिर इनपर राज करो और उनकी सम्पदा का बहुत छद्म तरीके से उपयोग करो । जिन देशो मे धार्मिक स्वतंत्रता नही है वहा एवं सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगो को नया ईसाई बनाया जा रहा है । वैसे भी जहाँ भगवान खाली He है वहा तो कठिनाइयाँ बहुत है । ईसाइयत और अन्य लोगो ने अपना नंबर जबर्दस्ती , छद्म ,और शोषण से ही बढ़ाया है और बढ़ा रहे है ………

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    आदरणीय मित्रों—नमस्कार।

    ==>
    आज पश्चिम में मात्र सनातन एवं सनातन धर्म के सहप्रवासी धर्मों के सिवा किसी और की संभावनाएँ नहीं के बराबर है।

    ===>
    आज जैसा आध्यात्मिक (Religious नहीं, मज़हबी भी नहीं) शून्य (Void) अस्तित्व में आ चुका है; कभी नहीं था।
    योग, ध्यान, पुनर्जन्म, और शुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिकता की माँग आनेवाले दशकों में ऐसी उभर कर आएगी, जैसे दूध गरम होनेपर उबाल आता है, उछलता है।इस शून्य को भरने के लिए कितनी सज्जता है?

    ===>
    अनुमान नहीं, आप सभी को अत्यंत आग्रहभरा अनुरोध है; कि, जो जालस्थल मैंने सुझाया है; उसको खोलकर सारे आर्यसमाजी, सनातनी, सिख, जैन, बौद्ध –संक्षेपमें सारे “आध्यात्मिक धर्म के प्रचारक देख लें।कृपया विश्वास करें।

    ==>
    ऐसे स्वर्ण अवसर का सूर्य क्षितिज से किरणें बिछा रहा है।

    ===>
    ढपोसले स्वार्थी स्वामी-योगी-नौटंकी बाज दूर रहें।

    ==>
    नॉस्त्र दामस की भविष्य-वाणी सच होते दिखाई दे रही है। उसका अर्थ ठीक लगाया नहीं जा सकता, ऐसा मैं मानता था। पर जो सच है; वह सामने आ ही जाएगा।

    ===>
    “Vedanta for Modern Man” प्रायः ५० से उपर लेखको नें लिखा संग्रह है। आधे से अधिक पश्चिमी विद्वान है। ऐसा ही निष्कर्श दिखाइ देता है।

    ===>
    U N O की २१ जून को योग दिवस की घोषणा और U N O के अधिकारी का Vibrant Gujarat के उत्सव में आगमन भविष्य सूचक है।

    ==>
    बुद्धिमान धर्म और संघ प्रचारकों को, इस भविष्य के लिए भरसक प्रयास करने की संगठित तैयारी में तुरंत लग जाना चाहिए।

    ऐसा अवसर आ रहा है। न भूतो अवश्य; पर शायद न भविष्यति, भी?

    वास्तव में यह, आलेख की क्षमता का विषय है।
    सारे दिशासूचक जो पढ सके तो पढ लें।

    Reply
  4. kaushalendram

    पश्चिम के चर्चीले पादरियों के लिये – कोई बात नहीं समायोजन तो हो ही रहा है, चिंता मत कीजिये । भारत में चर्च बढ़ रहे हैं …चर्च जाने वाले भी । पश्चिम में सनातन धर्म की ओर स्वाभाविक आकर्षण की संभावनायें हैं ।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आदरणीय—नमस्कार।
      बिलकुल सही कहा आप ने।
      पर, मैं कुछ बढकर कहूंगा।
      ==>
      आज पश्चिम में मात्र सनातन एवं सनातन धर्म के सहप्रवासी धर्मों के सिवा किसी और की संभावनाएँ नहीं के बराबर है।

      ===>
      आज जैसा आध्यात्मिक (Religious नहीं, मज़हबी भी नहीं) शून्य (Void) अस्तित्व में आ चुका है; कभी नहीं था।
      योग, ध्यान, पुनर्जन्म, और शुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिकता की माँग आनेवाले दशकों में ऐसी उभर कर आएगी, जैसे दूध गरम होनेपर उबाल आता है, उछलता है।इस शून्य को भरने के लिए कितनी सज्जता है?

      ===>
      अनुमान नहीं, आप सभी को अत्यंत आग्रहभरा अनुरोध है; कि, जो जालस्थल मैंने सुझाया है; उसको खोलकर सारे आर्यसमाजी, सनातनी, सिख, जैन, बौद्ध –संक्षेपमें सारे “आध्यात्मिक धर्म के प्रचारक देख लें।कृपया विश्वास करें।

      ==>
      ऐसे स्वर्ण अवसर का सूर्य क्षितिज से किरणें बिछा रहा है।

      ===>
      ढपोसले स्वार्थी स्वामी-योगी-नौटंकी बाज दूर रहें।

      ==>
      नॉस्त्र दामस की भविष्य-वाणी सच होते दिखाई दे रही है। उसका अर्थ ठीक लगाया नहीं जा सकता, ऐसा मैं मानता था। पर जो सच है; वह सामने आ ही जाएगा।

      ===>
      “Vedanta for Modern Man” प्रायः ५० से उपर लेखको नें लिखा संग्रह है। आधे से अधिक पश्चिमी विद्वान है। ऐसा ही निष्कर्श दिखाइ देता है।

      ===>
      U N O की २१ जून को योग दिवस की घोषणा और U N O के अधिकारी का Vibrant Gujarat के उत्सव में आगमन भविष्य सूचक है।

      ==>
      बुद्धिमान धर्म और संघ प्रचारकों को, इस भविष्य के लिए भरसक प्रयास करने की संगठित तैयारी में तुरंत लग जाना चाहिए।

      ऐसा अवसर आ रहा है। न भूतो अवश्य; पर शायद न भविष्यति, भी?

      वास्तव में यह, आलेख की क्षमता का विषय है।
      सारे दिशासूचक जो पढ सके तो पढ लें।

      Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    प्रामाणिक अनुरोध:
    कृपा करके निम्न जालस्थल पर एक ही दृष्टि डालें।
    आपका समय बचाएं।
    http://bishop-accountability.org/
    ————————————————————————-
    चर्च बिकने का महत्व पूर्ण कारण है, हजारों बलात्कार-वे भी पादरियों के।

    यदि बीभत्स कथाएँ, पढने का साहस है, तो, तनिक निम्न जालस्थल अवश्य देखिए।हजारों सत्य कथाओं से भरपूर है।
    इस आलेख से भी अधिक, यह, जालस्थल का प्रमाण आपको चौंका देगा।
    http://bishop-accountability.org/
    —————————————————-
    चर्च बेचकर ईसाइयत कानूनन दण्ड(?) के प्रचण्ड खर्च से बचना चाहती है।
    जब रिलिजन ही आर्थिक स्तरपर आसीन है, और आध्यात्मिकता दिखावा है; तो यह सारा अपेक्षित है।

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  6. Brijesh Gupta

    Mr. R sing ji aap jaiso ki choti soch hi hindu dhrm ka nash karegi..Umar ke is dahlij par modernlization ki ye baate sobha nhi deti.Aap bujurg log yesi soch rakhoge to is desh ka yuva kaise dharm se judega.

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  7. Mohan Gupta

    ईसाई धर्म में भौतिकता ही भौतिकता हैं अध्यामक्तिता बिल्कुल नहीं हैं। ईसाई धर्म में कई ऐसी बाते हैं जो विज्ञानं से मेल नहीं खाती। ईसाई धर्म में भौतिकता के कारण कई गिरजाघरों में बाल शोषण भी बहुत फैला हुया हैं इस बात ने भी गिरजा घर जाने वाले को बहुत प्रभाित किया हैं जिसके कारण कम लोग गिरजाघर में जाते हैं। जैसे अंग्रेजी भाषा ने कई भाशाओं से शब्द ग्रहण किये हैं वैसे ही ईसाई धर्म ने भी कई जातिओ और धर्मो से बहुत सी बाते अपनाई हैं। कई वर्ष पहले साप्ताहिक पत्रिका organiser में एक लेख छप्पा था के ईसाई धर्म में क्या हैं हिन्दू धरम में नहीं हैं। एक धर्म दुसरे धर्मो की बाते अपनाकर अपना अलग अस्तित्व नहीं वनाकर रख सकता हैं। ईसाई धर्म ने हिन्दू धर्म से बहुत कुछ अपनाया हैं। आजकल सिथिति थी के ईसाई लोग जनम , विवाह और मरण के समय गिरिजा घर में जाते थे किन्तु लगता हैं अब लोगो ने ऐसे अबसरो पर भी गिरजा घर जाना कम कर दिया हैं। ऐसी हालत में सभाविक हैं के गिरजा घर जाने वालो की संख्या घट रही हैं यूरोपियन देशो ने अपने साम्राज्य के दौरान अपने अधीन देशो में ईसाई धर्म बहुत फैलाया। अब यूरोपियन देशो में ईसाई धर्म मानने वालो की सांख्य कम हो रही हैं इस कारण ईसाई लोग भारत में ईसाई धर्म फैलाने के लिए करोड़ो , अरबो रुपये खर्च कर रहे हैं किन्तु निकट भबिष्य में ऐसा समय आ सकता जब एशिया और अफ्रीका के भी गिरजाघर भी विकने के कगार पर आ जाए। ऐसे समय में हिन्दुओ को गिरजाघर खरीदने का पर्यत्न करना चाहिये।

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  8. anil gupta

    चर्च जाने वालों की संख्या में गिरावट का मूल कारण ये है कि ईसाईयत में वैज्ञानिक सोच का नितांत अभाव है.और आज चर्च में जिस प्रकार के चर्चे सामने आते हैं उनसे उसके अनुयायियों का मोहभंग हो रहा है.बाल यौन शोषण, भिक्षुणियों (नन्स) का शारीरिक और मानसिक शोषण, भ्रष्टाचार, मिथ्याचार और भी अनेकों ऐसे ही मामले आजकल सर्वत्र चर्चा में हैं और वर्तमान पोप फादर फ्रांसिस द्वारा इस मामले में पहल करके कुछ सुधार करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन उनके भी कई क़दमों को उनके केबिनेट सदस्यों ने अस्वीकार कर दिया है.अवैज्ञानिक कल्पनाओं के चलते आज के बुद्धिवादी लोगों को चर्च केवल एक आडम्बर दिखाई पड़ता है.अतः चर्च जाने वालों की संख्या में गिरावट आ रही है.पिछले वर्ष अमेरिका के लॉस एंजल्स निवासी आध्यात्मिक मार्गदर्शक और सलाहकार श्री फिलिप गोल्ड़बर्ग भारत के एक माह के लेक्चर टूर पर आये थे. मेरठ में उन्होंने कहा था कि आज सामान्यतया सभी अमेरिकी वेदांत के इस सत्य को स्वीकार करने लगे हैं कि ईश्वर एक ही है और अलग-२ लोग उसे अलग-२ नामों से पुकारते हैं.और इसी आधार पर न्यूज़वीक पत्रिका ने २००९ में उनकी पुस्तक ‘अमेरिकन वेद’ की समीक्षा में लिखा था कि “अब हम सब हिन्दू हैं”.चर्च के खाली रहने का मूल कारण चर्च की अवैज्ञानिक मान्यताएं हैं.यूरोप में रहने वाले हिन्दू समुदायों को इन चर्च को खरीदने का प्रयास करना चाहिए और इनके द्वारा सत्यशोधन और वैज्ञानिक व्याख्याओं के प्रसार का काम करना चाहिए.ऐसा करने से इन चर्चों को मदिरालय और वैश्यालय बनने से भी रोका जा सकेगा.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      अनिल जी–निम्न जालस्थल आप को हजारों बलात्कारों के अभियोगों के विषय में अवगत कराएगा।
      यह भी एक महत्व पूर्ण कारण है।
      http://bishop-accountability.org/

      साथ साथ सारी हिंदुत्व प्रेरित संस्थाएँ बढ रही है। जैसे रामकृष्ण मिशन की वेदांत सोसायटियाँ, महर्षि महेश की संस्थाएँ, ब्रह्माकुमारी की संस्थाएँ, ऑस्टिन स्थित बरसाना धाम, चिन्मय मिशन, स्वामी दयानन्द सरस्वती का आर्ष विद्या गुरुकुल, श्री श्री रविशंकर, योग और ध्यान की भी संस्थाएँ बढ रही हैं।
      इसाइयत का भी पहले योग एवं ध्यान को विरोध था। जो आज दिखाई नहीं देता।
      पर पादरियों का सच्चा शत्रु उनके बलात्कार ही मानता हूँ।
      तालिका(सूची-या लिस्ट) अवश्य खोल के देखें। एक स्थानीय चर्च के अकेले ३० पादरी आरोपी हैं।
      आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

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  9. abhaydev

    bhagwan se prarthana hai ki bharat desh ke bahusankhyako ko shighra buddhi deve jisse ve mandir jakar moorti pooja karna chhod de aur apne ghar me hi sandhyopasna karne lage. moortipooja se labh to kuchh bhi nahi hota kintu hani sab prakar se hoti hai. moorti ko poojne se vyaktigat, parivarik, samajik, rashtriya star par tan, man, dhan ka nash hota hai.

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      ये आप की खामख्याली है। मंदिरों में जिनकी पूजा होती है वो आपके पूर्वज हैं। और जिस दिन आप अपने पूर्वजों का सम्मान करना बंद कर देंगे, उस दिन अपनी सभ्यता संस्कृति की उल्टी गिनती शुरू कर दीजियेगा।

      Reply
      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        आर्य समाज वालों के बारे में आपका क्या ख्याल है? वे तो मूर्ती पूजा का विरोध करते हैं.

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      अभयदेव जी -नमस्कार।

      आदर सहित कहता हूँ, कि–“मैं आप के मत से सहमत नहीं हूँ।”
      (१)
      बालक यदि ईश्वर पर लक्ष्य केंद्रित करना चाहता है, तो, मेरी समझमें उसे मूर्ति दिखाकर समझाया जा सकता है।
      (२)
      प्रतीक प्रतिमाएँ इत्यादि ऐसे अन्य विषयों में भी काम लिए जाते हैं।
      जैसे, रसायन में, NA सोडियम के लिए प्रयुक्त होता है।
      (३)
      देवनागरी में चिह्नोंद्वारा लेखन एक प्रकार की मूर्ति ही है। पर क्या चमत्कार कि, आप द्वारा लिखे गए चिह्न (विचार) मुझ तक पहुंचा देते हैं। वे स्वयं विचार ना होते हुए भी –प्रतिनिधित्व करते हैं। ठीक वैसे ही मूर्ति भी प्रतिनिधित्व करती है।
      (४)
      मूर्तिमें आरोपित “भक्ति”ही, भक्त की आध्यात्मिक प्रगति भी करवा सकती है, श्रद्धाके बलपर।
      ऐसे अनेक श्रद्धाकेंद्र हिन्दुत्व को सनातन करते हैं।
      (५)
      अवश्य, आज हजार वर्षों की दासता के कारण, सनातनता के घटक क्षीण हुए हैं; इसी लिए समस्याएँ समक्ष हो रही है।
      (६)
      ऐसी प्रतीकों पर की भाव-शक्ति भौतिकी के (Moment of Inertia) अर्थात जड-बलान्तर जैसी है। उसका फैला हुआ जडत्व उसकी गतिमानता को दीर्घजीवी बना देता है।
      लम्बा विषय है-पर संक्षिप्त है उत्तर।
      धन्यवाद।

      Reply
  10. sureshchandra.karmarkar

    आपका लेख पुरे यूरोप मैं ईसाईयत की वास्तविकताओं को बतलाता है. सम्पन्नता ,विलासिता ,भौतिकता की अति होने के बाद धर्म की जरूरत नहीं रह जाती या यूँ कहें की सामूहिक प्राथर्ना की जरूरत तो होती ही नही. ऐसा उक्त लेख को पढने पर लगता है. अब यदि अन्य धर्मो के बारे मैं विचार किया जाय तो उनके अनुनायी एकदम दीन हीन ,दबे,कुचले तो नहीं हैं,या तो यूरोप मैं जनसँख्या घनत्व कम है,चर्च अधिक हैं या वहां के पादरी मार्गदर्शन ठीक से नहीं दे रहे. ऐसा भी हो सकता है की काम के बोझ इतने हों की आदमी कहीं जा ही नहीं सके. पुणे ,हैदराबाद,बंगलोर ,मुंबई और अन्य बड़े शहरों मैं आई टी कम्पनियाँ ऐसी हैं जहा युवक और युवतियां दिन पाली और रात पाली मैं काम करते हैं, उन्नति पाने की लालसा मैं ये रात दिन काम में ही लगे रहते हैं, इन्हे अपने दूरस्थ शहर या निवास पर गए बरसों हो जाते हैं. ऐसे युवा शादी विवाहों एवम अन्य सामाजिक कार्यों मैं आते ही नही. १०० -५० वर्षों मैं ऐसी स्थिति और देशों मैं भी आ सकती है,बशर्ते की धार्मिक,राजनीतिक ,सांप्रदायिक ,आंदोलनों की जरूरत ही नहीं हो,पर्याप्त रोजगार हो,विकास के साधन हों, शासन और समाज का अन्यथा दखल नहीं हो,तनाव नहीं हो, तो सामाजिकता अपने आप कम हो जाती है. हमारे यहां बड़े शहरों मैं मंदिरों और मस्जिदों तथा अन्य धार्मिक सस्थानो मैं जाकर देखिए. विशेष अवसरों को छोड़कर वहां कितने लोग जाते हैं?

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      मा. सुरेशचंद्र जी—नमस्कार।
      (१)
      आलेख का केंद्र बिन्दू, जो युरप की सच्चाई, वॉल स्ट्रीट जर्नल में आयी है; वह है। मात्र भाष्य मैंने दिया है; जो मेरा है।
      (२)
      आपका अपने अलग गौण बिन्दू पर आलेख डालनेका अधिकार मुझे मान्य है। यहाँ विषयान्तर होगा।
      (२)
      वैसे यदि आप के ही तर्क के अनुसार सोचा जाए, तो गत सहस्र वर्षों के इस्लामिक और अंग्रेज़ राज के आर्थिक प्रभाव तले “हिंदू धर्म ” तो बिलकुल नष्ट हो जाना चाहिए था।
      वैसे कुछ क्षति पहुंची पर समूल नष्ट नहीं हुआ।यह हमारी सनातनता का एक प्रभाव है।
      (३) कारण: मेरी मान्यता है; कि, सनातन धर्म बहु केंद्रित,विकसनशील, बहु मार्गी, अनेक देवों में विश्वासी, इत्यादि इत्यादि….स्वतंत्र खोज भी स्वीकार करता है। इसी के कारण वह टिक जाता है। मेरे द्वारा इसी पर, कुछ मात्रा में, लिखा भी गया है।

      आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

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  11. Dr. Arvind Kumar Singh

    आदरणीय,
    डा. साहब
    सारगर्वित लेख एवं जानकारी के लिये आपको धन्यवाद। ईश्वरिय अनुभूति स्वअनुभूति है। इसे किसी मंदिर, मस्जीद या चर्च में सिमित करना उसके विराट स्वरूप को मुट्ठी में कैद करने के समान है। सारी जिन्दगी दूसरो को ढूढने वाला यदि नही ढूढ पाता है तो सिर्फ अपने आप को। जिस दिन वह अपने आप को ढूढ लेता है, उस दिन किसी और की आवश्यकता नही रह जाती।
    आपका
    अरविन्द

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    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      चर्च का इतिहास देखा जाये तो वहां ढोंग बहुत ज्यादा नजर आएगा.आम हिन्दू का वास्ता इस तरह के ढोंग से बहुत ज्यादा नहीं रहा है,पर अब धीरे धीरे सब इस ढोंग को समझ रहे हैंऔर जिस दिन प्रत्येक मनुष्य इसको समझ जाएगा मंदिर ,मस्जिद चर्च इत्यादि अपने आप समाप्त हो जाएंगे और डाक्टर अरविन्द सिंह के शब्दों में कहा जाये तो,”ईश्वरिय अनुभूति स्वअनुभूति है। इसे किसी मंदिर, मस्जीद या चर्च में सिमित करना उसके विराट स्वरूप को मुट्ठी में कैद करने के समान है। सारी जिन्दगी दूसरो को ढूढने वाला यदि नही ढूढ पाता है तो सिर्फ अपने आप को। जिस दिन वह अपने आप को ढूढ लेता है, उस दिन किसी और की आवश्यकता नही रह जाती।”
      इसलिए चर्च के बिकने में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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