लेखक परिचय

अलकनंदा सिंह

अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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हिन्दुस्तान वासियों के लिए यह खुशखबरी है कि दुनिया का जाना-माना हार्वर्ड विश्वविद्यालय भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहरों पर 500 किताबों की एक श्रृंखला प्रकाशित करने जा रहा है। इस काम में उनके साथ इन्फोसिस संस्थापक नारायण मूर्ति के बेटे रोहन मूर्ति हैं। प्रिंट और डिजिटल दोनों प्रारूपों में हर साल पांच किताबें छापी जाएंगी। पहली कड़ी में अकबर, सूरदास और मनु साहित्य समेत पांच पुस्तकें इसी माह लोकार्पित भी होने जा रही हैं। यह योजना वर्ष 2115 तक पूरी हो पाएगी। इस तरह श्रेष्ठ भारतीय साहित्य दुनिया के सामने द्विभाषा में पहुंचेगा और हमेशा के लिए संरक्षित और सुरक्षित रहेगा। अनुदित साहित्य में पद्य, गद्य, इतिहास, दर्शन, बौद्ध, मुस्लिम, हिन्दू ग्रंथ के अलावा और भी बहुत कुछ शामिल है।
2115 तक पूरी होगी योजना: इस योजना के तहत हर साल पांच नई पुस्तकें आएंगी। इस तरह यह योजना वर्ष 2115 तक पूरी हो पाएगी। पहली कड़ी में अकबर, सूरदास और मनु साहित्य समेत पांच पुस्तकें इसी माह लोकार्पित होने जा रही हैं। पुस्तकों का डिजिटलाइजेशन भी किया जाएगा। इस तरह श्रेष्ठ भारतीय साहित्य दुनिया के सामने द्विभाषा में पहुंचेगा और हमेशा के लिए संरक्षित और सुरक्षित रहेगा। अनुदित साहित्य में पद्य, गद्य, इतिहास, बौद्ध, मुस्लिम, हिन्दू ग्रंथ के अलावा और भी बहुत कुछ शामिल है।
हर पेज पर अंग्रेजी अनुवाद: जिन भाषाओं का साहित्य अंग्रेजी अनुवाद के साथ (द्विभाषा) पुस्तक के रूप में प्रकाशित होगा वे हैं- संस्कृत,  बांग्ला, हिन्दी, मराठी, पर्सियन, तमिल, तेलुगू, उर्दू आदि। पुस्तकों में मूल भाषा का एक पृष्ठ होगा, उसके सामने वाले पेज पर अंग्रेजी अनुवाद होगा।
हार्वर्ड का यह सबसे जटिल काम: हार्वर्ड ने भारतीय साहित्य छापने का जो बीड़ा उठाया है, वह कहीं अधिक वृहद, विविध और चुनौतीपूर्ण है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार हार्वर्ड का यह सबसे जटिल काम है।
ऐसा न तो पहले दुनिया ने देखा, न ही भारत ने
कुछ ऐसा होने जा रहा है जो इससे पहले न तो दुनिया ने देखा, न भारत ने ही देखा। विश्वसनीय, विशुद्ध और उत्कृष्ट ये पुस्तकें वास्तव में भारत इतिहास को दुनिया के सामने लाएंगी।
-शेल्डन पोलाक, जनरल एडिटर, मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया
इस माह ये पांच पुस्तकें आएंगी
1. द हिस्ट्री ऑफ अकबर खंड-1 : 2075 रुपये
2. द स्टोरी ऑफ मनु : 2075 रुपये
3. सूफी लिरिक्स : 1886 रुपये
4. सूर ओशन: पोयम्स फ्रॉम द अर्ली ट्रेडीशन : 2205 रुपये
5. थेरीगाथा: पोयम्स ऑफ फस्र्ट बुद्धिस्ट वुमेन : 1886 रुपये
रोहन मूर्ति तब हार्वर्ड में कंप्यूटर विज्ञान के छात्र थे
मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया के जनरल एडिटर शेल्डन पोलाक पहले क्ले लाइब्रेरी में जनरल एडिटर थे। उन्होंने क्ले योजना के बीच में समाप्त होने पर संस्कृत के परे जाने के बारे में सोचा। उन्होंने इस पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की कार्यकारी संपादक शर्मिला सेन से बात की। शर्मिला ने नारायण मूर्ति के बेटे रोहन मूर्ति से उनका परिचय कराया। तब रोहन हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कंप्यूटर विज्ञान के छात्र थे। उनकी उम्र 26 साल थी। 2010 में रोहन ने नई लाइब्रेरी की स्थापना के लिए 52 लाख डॉलर दिए। शर्मिला के मुताबिक वास्तव में मैं और रोहन एक ही जैसे भारत में पढ़े हैं, जहां हम शेक्सपियर की रचनाएं अपने देश की उत्कृष्ट रचनाओं से ज्यादा जानते हैं।

6 Responses to “हार्वर्ड यूनिवर्सिटी छापेगी भारतीय साहित्य”

  1. kaushalendram

    भारतीय साहित्य का प्रकाशन हो यह अच्छी बात है किंतु जिस तरह से यह हो रहा है ( डॉ. मधुसूदन जी की टिप्पणी के अनुसार) वह निश्चित ही चिंता का विषय है और अमेरिका के विश्वविद्यालयों की नैतिकता पर प्रश्न खड़ा करता है । जिस समय मैं अलकनन्दा जी की सूचना पढ़ रहा था उसी समय एक संदेह हुआ था कि क्या हार्वर्ड विश्वविद्यालय अकबर विषयक भारत के इतिहास के साथ न्याय कर सकेगा ? ताजमहल जैसा इतिहास यदि परोसा गया तो अनर्थ ही होगा ।

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    (१)
    क्या हम इतने मूर्ख हैं?
    बुद्धुओं को और बुद्धु बना कर दान पाने की अमरिकन तकनिक।
    पहले इस ठगी का कुछ इतिहास जानें===>
    (२)
    अटल जी, अडवानी जी के एन डी ए शासन ने ३ मिलियन डालर
    (भारत की जनता के पैसे) चिकागो या इलिनॉय युनिवर्सीटी को दिए थे। उसने उसके उपयोग से, क्या भारत के हित में काम किया? बिलकुल नहीं।
    (३)
    अभी अभी, एक पटेल दम्पती ने फ्लॉरिडा की कोई युनिवर्सीटी को १८-या २० मिलियन डालर दिए। (एक मिलियन=१०००००० डॉलर होत हैं। १ पर छः शून्य होते हैं।)
    (४)
    उसी प्रकार हार्वर्ड को भी नारायण मूर्ति की संस्थाने ही कुछ मिलियन डालर दिए हैं।
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    हार्वर्ड की और अन्य युनिवर्सिटियों की भी तकनिक (चाल -ठगी) यदि आप सोच सकते हैं, तो स्पष्ट है।
    (क) किसी सेठ को किसी नामी अनामी बोर्ड का सदस्य बनाओ।
    (ख) बैठकों में, या मिटिंगो में उसका गुणगान करवाओ।
    (ग) उसे बोलने दो, और उसकी वाह वाही करो।
    (घ) फिर धीरे से उसके नाम पर कोई दान के साथ साथ उसके नाम को भी अजरामर बनाने के लिए दान घोषित करवाओ।
    नारायण मूर्ति के ही धन से हारवर्ड अपना नाम कर रही है।
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    इसी प्रकार के सारे भारतीय नहीं है। पर अधिकांश (९०%)प्रवासी भारतीय इसी ठगी के बलि चढे हुए हैं।
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    जो इनसे अलग हैं, वे हैं; (१) इन्फ़िनिटी फाउन्डेशन के श्री. राजीव मलहोत्रा, जो स्वयं विद्वान भी है, और उदार भी। (२)दूसरा उबेराय फाउन्डेशन (३) एकल विद्यालय फाउण्डेशन —इत्यादि।,
    (४) फिर ऐसे अनेक निःस्वार्थी कार्यकर्ता जिन्हों ने अमरिका कनाडा सहित करिबियन देशों तक भारत के सांस्कृतिक राष्ट्र दूत होकर एक सक्षम जाल बिछा दिया है।
    (५) इंदिरा के कांग्रेसी आपात्काल के मध्य अपने पासपोर्ट अपहृत होने के पश्चात भी आपात्काल हटाने में भीमकाय योगदान दिया था।
    ऐसे नर सिंहो को न कभी किसी (एन डी ए ) ने स्मरण किया, न किसी “पदम-स्री” से सम्मानित किया गया-न इन्हों ने कभी अपना रोना रोया।
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    बनिया-गुज्जुओं को भी बुद्धु बनाया जाता है।
    किसी कांग्रेसमन, या सेनेटर की चुनाव राशि में ये लोग सेनेटर-कांग्रेसमन-मेयर-इत्यादि के संग मुखमुद्रा पर हास्य चिपकाकर अपनी साडी-सुंदरी के साथ, “फोटु” जो दूसरे दिन समाचारों में आती है; उसे देख देख धन्यता अनुभव करते है, बडा चेक देकर।
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    पता नहीं। कितने वर्ष लगेंगे हम बुद्धुओं को ऐसी ठगी समझनेमें ?

    प्रवासी भारतीय जो दान सारे भारत को देते है, उससे (अनुमानित) सौ गुना अमरिका की अन्यान्य संस्थाएँ, प्रवासी भारतीय से ही प्राप्त करती हैं।

    अनुमानित आँकडे के सिवा शेष वास्तविकता पर आधारित है।
    हम मूर्ख हैं।
    ॥नारायण-नारायण॥
    अस्तु।
    डॉ. मधुसूदन

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    • के.डी. चारण

      के.डी.चारण

      एक आलेख के साथ दूसरा आलेख…..गंभीर विमर्श है दोनों में….बिल्कुल तथ्यात्मक।
      बहुत बहुत साधुवाद मधुसुदन जी। नेति- नेति प्रणाम…@के.डी. चारण

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  3. Arun Kumar Upadhyay

    Pandit Bellikoth Ramchandra Sharma of Tirupati Sanskrit University had written commentary on Samaveda Kauthumi Samhita which was under publication by Tirupati Sanskrit University. He refused to hand over manuscript to Harvard even after offer of Rs 1 crore. As soon as Radhakrishnan learnt it, he took over as VC and stopped the publication. B R Sharma was removed from University and all manuscript was sent to Harvard. 2 Vols out of 4 have been published by Harvard so far offered by Flipkart. It is difficult to get proof reader for this book. Later on, B R Sharma was called by Vishveshvaranand Vaidik Institute, Hosiarpur, Punjab. After death of Radhakrishnan, Tirupati University wanted to honour B R Sharma which he refused saying that his main work is sold to USA, fake honour has no meaning.
    http://www.flipkart.com/samaveda-samhita-kauthuma-school-padapatha-book-0674009355
    Samaveda Samhita Of The Kauthuma School, With Padapatha And The Commentaries Of Madhava, Bharatasvamin And Sayana, Volume 2: Uttararcika (Hardcover)
    by B. R. Sharma (Editor)

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    • शिवेंद्र मोहन सिंह

      उपाध्याय जी अपने कॉमेंट को हिंदी में भी दें।

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  4. sureshchandra.karmarkar

    यह कार्य बहुत महत्व पूर्ण है. हमारी नई पीढ़ी को एक सौगात मिलेगी. आजकल पूसकों के प्रति जो दुरी बनी है वह नई पीढ़ी से कम होगी. मूल ग्रन्थों के साथ उनपर लिखीगई टिप्पणियों का भी डिजिटिलाइजेशन हो तो उत्तम होगज़ैसे”गीता”अपने आप मैं एक पाठ्य पुस्तक ग्रन्थ मगर उस पर ”तिलक”,ज्ञानेशवरी ,”ओशो”की टीकाएँ आम जनमानस को गीता से अवगत कराएगी।

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