earthप्रवीण दुबे
ते जी से घूमता समय चक्र और पल-प्रतिपल आगे बढ़ती हमारी-आपकी जिन्दगी। किसी शायर ने इसी समय के बारे में कुछ यूं लिखा है।
वक्त से कल और आज
वक्त से दिन और रात
वक्त की हर सय गुलाम
वक्त का हर सय पर राज।
कहते हैं वक्त के साथ प्रकृति ने भी अपना मिजाज बदल लिया है। पुरानी पीढ़ी आश्चर्य चकित है तापमापी के पारे का ग्राफ देखकर। पुराने समय में न इतनी गर्मी थी न इतनी लपट। आज पारा 45 के पार है। देश के कई शहरों में तो यह 50 तक जा पहुंचा है। वक्त के साथ प्रकृति इतनी क्रूर क्यों हो रही है? आखिर कौन है इसके लिए जिम्मेदार?
समय बदला और आदमी भी बदलता चला गया। रहने को अब दो कमरे नहीं बल्कि सीमेंट के पूरे के पूरे जंगल की आवश्यकता पडऩे लगी। वृक्षों से भरे मैदान यहां तक कि जंगल गायब हो गए और इनकी जगह ले ली सीमेंट के जंगलों ने।
बड़ी-बड़ी सीमेंट की अट्टालिकाएं तो हमने बना लीं लेकिन काट डाले वो वृक्ष जो पर्यावरण संतुलन का काम करते थे। आज बड़ी-बड़ी मल्टी प्लेक्स के बीच छोटे-छोटे कृत्रिम घास के मैदान पर्यावरणविदों को जैसे मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं। पहले घर के द्वारे पर लगा नीम, पीपल और बरगद का बिरवा हमारे मन मस्तिष्क को जो ठंडक पहुंचाता था जो प्राणवायु हमें प्रदान करता था कहीं खो से गए हैं।

उस समय भी गर्मी थी लेकिन हरे-भरे वृक्षों के कारण पारा इस कदर जान लेवा नहीं हो पाता था। आज वृक्ष नहीं हैं प्रकृति की गर्मी कैसे शांत हो, इसका कोप भाजन हमें और आपको तो बनना ही होगा। मौसम वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों की मानें तो आने वाले वर्षों में पारा और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है।

हृदय कांप उठता है यह सुनकर। इस वर्ष अब तक पड़ी गर्मी में पूरे देश में मरने वालों का आंकड़ा 500 के पार जा पहुंचा है। अस्पताल गर्मी से प्रभावित लोगों से भरे पड़े हैं। अनुमान है कि मरने वालों की संख्या 1000 से ऊपर जा सकती है। वक्त के साथ साल दर साल बढ़ती गर्मी और इसके कारण अस्त-व्यस्त होती जिन्दगी को राहत देने का आखिर क्या उपाय है? क्या इसी तरह कटते रहेंगे जंगल?

हो सकता है कुछ महानुभावों का यह तर्क हो कि जब आबादी बढ़ेगी तो रहने के लिए जगह भी चाहिए, सुविधाएं भी चाहिए ऐसे हालात में क्या किया जाए? इस तर्क में भी दम है। रहने को घर तो चाहिए।

लेकिन क्या हमारा समाज कभी यह संकल्प लेता है कि हमने चार पेड़ काटे हैं तो उसकी जगह चालीस लगाएंगे भी। शायद मन से ऐसा संकल्प हम और आप नहीं लेते उसी का परिणाम है आज पारा 45 से 50 के बीच जा पहुंचा है। पर्यावरण दिवस और मानसून के समय हमने तमाम समाज-सेवी संगठनों, कथित पर्यावरण रक्षक संस्थानों से जुड़े लोगों के झुंड खाली पड़े मैदानों पर हाथों में पेड़ पकड़े वृक्षारोपण करते फोटो खिंचवाते जरूर देखे हैं।

यही फोटो दूसरे दिन के समाचार पत्रों में भी प्राथमिकता से लगे दिखाई देते हैं। बाद में क्या होता है? इसकी सच्चाई हम-आप सभी जानते हैं। देखरेख के अभाव में नवरोपित पौधा दम तोड़ देता है और कुछ समय बाद किसी अन्य संगठन द्वारा यह कहानी दोहराई जाती है।

वन विभाग, जिला पंचायत और तमाम स्थानीय नर्सरियों के आंकड़े बताते हैं कि ग्वालियर जैसे छोटे शहर में वृक्षारोपण के नाम पर दस लाख से ज्यादा पौधे उठाए जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारे आसपास हरियाली क्यों नहीं है? साफ है कि वृक्षारोपण के नाम पर हम और आप केवल दिखावा कर रहे हैं।

यदि हमने पेड़ लगाने के साथ-साथ पेड़ बचाने, उन्हें पालने का संकल्प लिया होता, उसके प्रति साफ मन से सच्चे प्रयास किए होते तो आज गर्मी से हमारी यह दुर्दशा नहीं हो रही होती। ऐसे समय में हमें ग्वालियर के कुछ ऐसे समाजसेवी और पर्यावरणविद प्रेरणा दे सकते हैं जिनके प्रयासों से आज शहर में सैकड़ों वृक्ष लहलहा रहे हैं।

ऐसे ही लोगों में शामिल हैं काशीनाथ जोशी, स्व. रामचन्द्र राव भोयटे जैसे समाजसेवी। काशीनाथ जी ने न केवल शहर में सैकड़ों वृक्ष लगाए बल्कि उन्हें जीवित रखने की विशेष पद्धति का भी विकास किया। स्व. रामचन्द्रराव भोयटे ने लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम से लेकर अनेक पार्कों सार्वजनिक स्थलों को हरा-भरा करने न केवल पेड़ लगाए वरन् मुक्तिधाम जैसे स्थान पर जहां हम और आप जाने में झिझकते हैं नियमित जाकर पेड़ों के जीवित रहने की चिंता भी की। आज लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम का जो हरा-भरा स्वरूप है उसका श्रेय स्व. भोयटे को ही जाता है।धन्य हैं शहर के गुरूद्वारों में सेवा करने वाले सेवादार जिन्होंने किले के गुरुद्वारे सहित शहर के कई स्थानों पर पेड़ लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने का संकल्प लिया। उसके भी अच्छे परिणाम आए हैं।

अत: गर्मी से बचने के लिए प्रकृति के कोप का भाजन बनने से बचने का एक ही उपाय है। इस बरसात में वृक्ष लगाने का संकल्प लें साथ ही यह भी प्रतिज्ञा करें कि लगाए गए पौधे की तब-तक चिंता करूंगा जब तक कि वह वृक्ष नहीं बन जाता। खैर यह बात तो है उस समय के लिए जब काली घटाएं छाएंगी और मानसून हमारे शहर में दस्तक देगा। फिलहाल तो सूर्यदेवता का रौद्र रूप शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा। चारों तरफ हाहाकार है। इससे राहत के लिए एक सुझाव जरूर याद रखिए। जैसे समय के साथ वृक्ष गायब हो गए हैं वैसे ही गर्मी से बचाव के लिए अब हरी कैरी का पना, सत्तू, नींबू की शिकंजी, दही की लस्सी और भुने जीरे का छाछ भी हम भूलते जा रहे हैं। रसायन युक्त विदेशी पेय छोडि़ए और इन देशी पेय पदार्थों का इस्तेमाल करके देखिए गर्मी से जरूर राहत मिलेगी।

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