लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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भोपाल, 1 दिसंबर, 2011। युवा पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के सवाल पर कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी के नाम एक पत्र भेज कर इस अन्याय को रोकने की मांग की है। संजय ने अपने पत्र के महात्मा गांधी लिखित ‘हिंद स्वराज्य’ की प्रति भी श्री गांधी को भेजी है। अपने पत्र में संजय द्विवेदी ने केंद्र की सरकार पर जनविरोधी आचरण के अनेक आरोप लगाते हुए राहुल गांधी से आग्रह किया है कि वे इस ऐतिहासिक समय में देश की कमान संभालें अन्यथा देश के हालात और बदतर ही होंगें। अपने पत्र में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद दिलाते हुए संजय द्विवेदी ने साफ लिखा है कि महंगाई के सवाल पर हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास जादू की छड़ी नहीं हैं, किंतु अमरीका के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि जिसके चलते हमारी सरकार के मुखिया वही कहने और बोलने लगते हैं जो अमरीका चाहता है। क्या हमारी सरकार अमरीका की चाकरी में लगी है और उसके लिए अपने लोगों का कोई मतलब नहीं है? प्रस्तुत है इस पत्र का मूलपाठ-

 

 

 

प्रति,

श्री राहुल गांधी

महासचिव

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी,

12, तुगलक लेन, नयी दिल्ली-110011

 आदरणीय राहुल जी,

सादर नमस्कार,

आशा है आप स्वस्थ एवं सानंद होंगें। देश के खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की मंजूरी देने के सवाल पर देश भर में जैसी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उससे आप अवगत ही होंगे। आपकी सरकार के प्रधानमंत्री आदरणीय मनमोहन सिंह जी अपने पूरे सात साल के कार्यकाल में दूसरी बार इतनी वीरोचित मुद्रा में दिख रहे हैं। आप याद करें परमाणु करार के वक्त उनकी देहभाषा और भंगिमाओं को, कि वे सरकार गिराने की हद तक आमादा थे। उनकी यही मुद्रा इस समय दिख रही है। निश्चय ही अमरीका की भक्ति का वे कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते। किंतु सवाल यह है कि इन सात सालों में देश में कितने संकट आए, जनता की जान जाती रही, वह चाहे आतंकवाद की शक्ल में हो या नक्सलवाद की शक्ल में, बाढ़-सूखे में हो, किसानों की आत्महत्याएं या इंसीफ्लाइटिस जैसी बीमारियों से मरते लोगों पर, हमारे प्रधानमंत्री की इतनी मुखर संवेदना कभी व्यक्त नहीं होती।

अमरीकी जादू की छड़ीः

महंगाई के सवाल पर हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास जादू की छड़ी नहीं हैं, किंतु अमरीका के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि जिसके चलते हमारी सरकार के मुखिया वही कहने और बोलने लगते हैं जो अमरीका चाहता है। क्या हमारी सरकार अमरीका की चाकरी में लगी है और उसके लिए अपने लोगों का कोई मतलब नहीं है? आखिर क्या कारण है कि जिस सवाल पर लगभग पूरा देश, देश के प्रमुख विपक्षी दल, आम लोग और कांग्रेस के सहयोगी दल भी सरकार के खिलाफ हैं, हम उस एफडीआई को स्वीकृति दिलाने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं। एक दिसंबर, 2011 को भारत बंद रहा, संसद पिछले कई दिनों से ठप पड़ी है। क्या जनता के बीच पल रहे गुस्से का भी हमें अंदाजा नहीं है? क्या हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं ? आखिर हमारी क्या मजबूरी है कि हम अपने देशी धंधों और व्यापार को तबाह करने के लिए वालमार्ट को न्यौता दें?

वालमार्ट के कर्मचारी हैं या देश के नेताः

अगर इस विषय पर राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पा रही है, तो पूरे देश की आकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए हमारे प्रधानमंत्री और मंत्री गण वालमार्ट के कर्मचारियों की तरह बयान देते क्यों नजर आ रहे हैं? आप इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि आप इन दिनों गांवों में जा रहे हैं और गरीबों के हालात को जानने का प्रयास कर रहे हैं। आपको जमीनी सच्चाईयां पता हैं कि किस तरह के हालात में लोग जी रहे हैं। अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट से लेकर सरकार की तमाम रिपोर्ट्स हमें बताती हैं कि असली हिंदुस्तान किस हालात में जी रहा है। 20 रूपए की रोजी पर दिन गुजार रहा 70 प्रतिशत हिंदुस्तान कैसे और किस आधार पर देश में वालमार्ट सरीखी दानवाकार कंपनियों को हिंदुस्तान की जमीन पर पैर पसारने के लिए सहमत हो सकता है?

भूले क्यों गांधी कोः

आप उस पार्टी के नेता हैं जिसकी जड़ों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के संस्कार, पं. जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा, आदरणीया इंदिरा गांधी जी का अप्रतिम शौर्य और आदरणीय राजीव गांधी जी संवेदनशीलता और निष्छलता है। क्या यह पार्टी जो हिंदुस्तान के लोगों को अंग्रेजी राज की गुलामी से मुक्त करवाती है,वह पुनः इस देश को एक नई गुलामी की ओर झोंकना चाहती है ? मेरा निवेदन है कि एक बार देशाटन के साथ-साथ आपको बापू (महात्मा गांधी) को थोड़ा ध्यान से पढ़ना चाहिए। बापू की किताब ‘हिंद स्वराज्य’ की प्रति मैं आपके लिए भेज रहा हूं। इस किताब में किस तरह पश्चिम की शैतानी सभ्यता से लड़ने के बीज मंत्र दिए हुए हैं, उस पर आपका ध्यान जरूर जाएगा। मैं बापू के ही शब्दों को आपको याद दिलाना चाहता हूं, वे कहते हैं-“ कारखाने की खूबी यह है कि उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता कि लोग हिंदुस्तान में या दुनिया में कहीं भूखे मर रहे हैं। उसका तो बस एक ही मकसद होता है, वह यह कि दाम उंचे बने रहें। इंसानियत का जरा भी ख्याल नहीं किया जाता।” जिस देश में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और नौजवान बड़ी संख्या में बेरोजगार हों, वहां इस तरह की नीतियां अपनाकर हम आखिर कैसा देश बनाना चाहते हैं?क्या इसके चलते देश में हिंसाचार और अपराध की घटनाएं नहीं बढ़ेगीं, यह एक बड़ा सवाल है।

धोखे का लोकतंत्रः

महात्मा गांधी इसीलिए हमें याद दिलाते हैं कि – “अनाज और खेती की दूसरी चीजों का भाव किसान नहीं तय किया करता। इसके अलावा कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन पर उसका कोई बस नहीं चलता है और फिर मानसून के सहारे रहने की वजह से साल में कई महीने वह खाली भी रहता है। लेकिन इस अर्से में पेट को तो रोटी चाहिए ही।” राहुल जी क्या हमारी व्यवस्था किसानों के प्रति संवेदनशील है? हमारे कृषि मंत्री के बयानों को याद कीजिए और बताइए कि क्या हमने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का एक अभियान सरीखा नहीं चला रखा है। एक लोकतंत्र में होने के हमारे मायने क्या हैं? इसीलिए राष्ट्रपिता हमें याद दिलाते हैं कि “बड़े कारखानों में लोकराज्य नामुमकिन है। जो लोग चोटी पर होते हैं,वे गरीब मजदूरों पर उनके रहन-सहन के तरीकों पर –जिनकी तादाद प्रति कारखाना चार-पांच हजार तो होती ही है –एक दबाव डालते हैं और मनमानी करते हैं। ……राष्ट्रजीवन में ऐसे धंधों की एक बहुत बड़ी जगह होनी चाहिए, जिससे लोग लोकशाही की तरफ झुकें। बड़े कारखानों से राजनीतिक तानाशाही ही बढ़ेगी। नाम के लोक –राज्यवाले देश तक जैसे अमरीका, रूस वगैरह लड़ाई के दबाव में सचमुच तानाशाह बन जाते हैं। जो कोई देश भी अपनी जरूरत का सामान केंद्रीय कारखानों से तैयार करेगा, वह आखिर में जरूर तानाशाह बन जाएगा। लोकराज्य वहां केवल दिखावे का रहेगा जिससे लोग धोखे में पड़े रहें। ”

 

क्या हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लोकतंत्र के लिए लड़ी थीः

सवाल यह भी है क्या हमारी आजादी की लड़ाई देश में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए थी? जाहिर तौर पर नहीं, हमारी लड़ाई तो सुराज, स्वराज्य और आजादी के लिए थी। आजादी वह भी मुकम्मल आजादी। क्या हम ऐसा बना पाए हैं? यहां आजादी चंद खास तबकों को मिली है। जो मनचाहे तरीके से कानूनों को बनाते और तोड़ते हैं। यही कारण है कि हमें लोकतंत्र तो हासिल हो गया किंतु सुराज नहीं मिल सका। इस सुराज के इंतजार में हमारी आजादी ने छः दशकों की यात्रा पूरी कर ली किंतु सुराज के सपने निरंतर हमसे दूर जा रहे हैं।

चमकीली दुनिया के पीछे छिपा अंधेराः

सवाल यह है कि गांधी-नेहरू-सरदार पटेल-मौलाना आजाद- इंदिरा जी जैसा देश बनाना चाहते थे,क्या हम उसे बना पा रहे है ? इस नई अर्थनीति ने हमारे सामने एक चमकीली दुनिया खड़ी की है,किंतु उसके पीछे छिपा अंधेरा हम नहीं देख पा रहे हैं। आपकी चिंता के केंद्र में अगर हिंदुस्तान की तमाम ‘कलावतियां’ हैं तो आपकी पार्टी की सरकार का नेतृत्व मनमोहन सिंह जी जैसे लोग कैसे कर सकते हैं? जिनके सपनों में अमरीका बसता है। हिंदुस्तान को न जानने और जानकर भी अनजान बनने वाले नेताओं से देश घिरा हुआ है। यह चमकीली प्रगति कितने तरह के हिंदुस्तान बना रही है,आप देख रहे हैं।

संभालिए नेतृत्व राहुल जीः

आपकी संवेदना और कही जा रही बातों में अगर जरा भी सच्चाई भी है तो इस वक्त देश की कमान आपको तुरंत संभाल लेनी चाहिए। क्योंकि आप एक ऐतिहासिक दायित्व से भाग रहे हैं। मनमोहन सिंह न तो देश का, न ही कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व हैं। उनकी नियुक्ति के समय जो भी संकट रहे हों किंतु समय ने साबित किया कि यह कांग्रेस का एक आत्मघाती फैसला था। जनता के मन में चल रहे झंझावातों और हलचलों को आपको समझने की जरूरत है। देश के लोग व्यथित हैं और बड़ी आशा से आपकी तरफ देख रहे हैं। किंतु हम सब आश्चर्यचकित हैं कि क्या सरकार और पार्टी अलग-अलग दिशाओं में जा सकती है? कांग्रेस संगठन का मूल विचार अगर आम आदमी के साथ है तो मनमोहन सिंह की सरकार खास आदमियों की मिजाजपुर्सी में क्यों लगी है? महंगाई और भ्रष्टाचार के सवालों पर सरकार बगलें क्यों झांक रही है ? क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे अहिंसक प्रतिरोधों को भी कुचला जा रहा है ? क्या कारण है आपकी तमाम इच्छाओं के बावजूद भूमि अधिग्रहण का बिल इस सत्र में नहीं लाया जा सका ? क्या आपको नहीं लगता कि यह सारा कुछ कांग्रेस नाम के संगठन को जनता की नजरों में गिरा रहा है। कांग्रेस पार्टी को अपने अतीत से सबक लेते हुए गांधी के मंत्र को समझना होगा। बापू ने कहा था कि जब भी आप कोई काम करें,यह जरूर देखें कि इसका आखिरी आदमी पर क्या असर होगा। सादर आपका

 संजय द्विवेदी,

6 Responses to “कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के नाम एक पत्र”

  1. sanjaypati tripathi

    जय भारत मित्रों माँ भारती को बेचने हेतु सभी दलाल एक हो गए हैं देश भर की विधान सभाएं और संसद -गुंडे ,दलाल ,बलात्कारी ,किडनैपरो ,से भर गई है ,सभी अपने दलाली वाले हिस्से के लिए लड़ रहे हैं कानून की दुहाई देकर संविधान से खुले आम बलात्कार कर रहे हैं ,देश के कर्णधार नवजवान स्वार्थो में निजी एसे उलझे है, की उन्हें देश और देश की स्वतंत्रता से कुछ लाना देना नहीं है, तवायफ और भड़वे अब उनके आइकन हो गए हैं ,जब बच्चे प्रेमी और प्रेमिकाओं के संग मिलकर माँ की हत्या करने लगे हैं , पुरे संसार को जीवन जीने की कला सिखाने वाला भारत आज स्वयं को जिन्दा रखने के लिए छटपटा रहा है ,जहाँ गुरुओं से अभिवाहक सवाल करते हैं की मेरे बच्चे को क्यों मारा , जहाँ गुरु ही अब अपने शिष्य संग बलात्कार करने लगा …..दोस्तों देश के अपने अब हालत क्या लिखूं ???सौगंध है आप सब को अपनी माँ के उस दूध की जो आप के रगों में खून बनकर दौड़ रहा है की ,???भारत ही भारतः के लिए हर वो क़ुरबानी दें जो आज माँ भारतीय की मांग है …जय भारत जय जवान जय किसान जय जय भीम !!

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  2. Jeet Bhargava

    लोकपाल ही नहीं, आरक्षण, अर्थ व्यवस्था, ग्रामीण विकास, टेक्नोलोजी, जेहादी आतंकवाद जैसे किसी भी ज्वलंत मुद्दे के बारे में ४६ वर्षीय बुजुर्ग राहुल के पास कोई मौलिक विचार या उपचार नहीं है. दूसरी तरफ उनसे १३ साल छोटे असली युवा वरुण गांधी ज्यादा प्रखर, मुखर और प्रतिभाशाली है. लेकिन वाम और वंश की पूजा में लीं फईवादी मीडिया हमेशा युवा वरुण की की बजाय बुजुर्ग राहुल का ही गुणगान करता है. क्योंकि वरुण के साथ भले ही आम भारतीय युवा हो, लेकिन खादी देशो की खैरात या चर्च का ‘हाथ’ नहीं है.

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  3. कुन्दन पाण्डेय

    कुन्दन पाण्डेय

    रणछोड़ युवराज नहीं, राजकुमार भी नहीं होते।

    लोकपाल के रण में जब टीम अन्ना व विपक्षी ललकार रहे थे, तो ये भगोड़ा जाने कहां भागा था।
    आया भी तो न तलवार की धार तेज थी, न चलाने का अभ्यास। यूपी में हार गया तो पॉलीटीकल करियर केशुभाई पटेल की तरह न हो जाय।

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  4. आर. सिंह

    R.Singh

    संजय द्विवेदी जी,ऐसे तो आपने यह पत्र राहुल गांधी को लिखा है अतः इसमें मुझे दखलंदाजी नहीं करना चाहिए,पर इसी सन्दर्भ में लिखे गए आपके एक अन्य लेख में मैंने आपसे दो प्रश्न पूछे थे.पता नहीं आप उनके उत्तर क्यों टाल गए?
    वे दो प्रश्न आज मैं फिर दुहराता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप इस बार उत्तर अवश्य देंगे.
    पहला प्रश्न यह है कि क्या कारण है कि हम चीन से सस्ता सामान अपने उपभोक्ताओं को मुहैया नहीं करा सकते?
    दूसरा प्रश्न यह है कि यह कहाँ का न्याय है कि चंद मुनाफाखोरोंके लाभ के लिए पूरे देश के गरीबों और साधारण जीविका वालों को निम्न स्तर के साजो सामान के लिए उचित से अधिक पैसा खर्च करने पर बाध्य होना पड़े?
    मैं समझता हूँ कि ये प्रश्न अप्रासंगिक नहीं हैं.
    ऐसे तो सब बातों से बढ़ कर यह बात है कि इस विषय को इस समय लाया ही इसलिए गया है ,जिससे भ्रष्टाचार का मुद्दा दब जायेऔर लोग सब कुछ भूल कर इस मुद्दे के पीछे पड़ जाएँ और सच पूछिए तो वही हो रहा है.

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  5. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    वे वाही कर रहे हैं जो उनको करना चाहिए . आप पता नहीं क्यों राहुल जी को उनके अगेंदे से हटाना चाहते हैं ? संपादक पब्लिक ऑब्ज़र्वर, नजीबाबाद

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  6. SARKARI VYAPAR BHRASHTACHAR

    मोहम्मद वासिम पाकिस्तानी कहते है …..
    MOHAMMAD WASIM:G.E.C is going to organize a LECTURE on Violence and Minorities,we invited ms. Teesta Sitalwad eminent social work an human right activist on nov-29,2011 at 3:00 pm in he cultural hall,M.A Library A.M.U to deliver LECTURE on the same topic ” DOES THE CONSTITUTION IS NOT APPLY IN GUJRAT “INFACT THE CONSTITUTION OF INDIA AMMENDED BY CONGRESS 650 TIMES IN LAST 65 YEARS ASPER THEIR REQUIREMENT TO MANAGE THE POLITICALS INTRESTS ….AND NOW THE CONSTITUTION OF INDIA HAVE BCOME CONSTITUTION OF CONGRESS…..SO THE NAME OF OUR COUNTRY SHOULD CHANGED AND WE SHOULD CALL OUR COUNTRY “CONGRESS” INSTEAD OF INDIA OR BHARAT…LIKE BOMBAY IS NOW MUMBAI…DO YOU AGREE THAT “भारत का संविधान ” १९४७ से २०११ के हिसाब से है ,जबकि 2012 के हिसाब से २५०० को ध्यान में रखकर नए सिरे से बनाया जाना चाहिए …..बाबा आंबेडकर और तत्कालीन कांग्रेस ने मिलकर उस समय भी कांग्रेस 70% हितो को ध्यान में रखकर बनाया था ….अंग्रेजो की देख रेख में ….नहीं तो आज 30% कांग्रेसियों को आज तक जमानत नहीं मिलती ……और भी कांग्रेस के संशोधनों से संविधान का सीना छलनी हो चूका है…और इसके हर पन्ने पर कांग्रेस भ्रष्टाचारियो ,कालाबाजारियो और गुंडों के हितो के अलावा किछ नहीं है…..गरीब जनता के लिए अंग्रेजो के राज में लाठी और गोली थी …आज कांग्रेस के राज में भी लाठी ,गोली और गाली के सिवाय कुछ नहीं है ….
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार

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