दलित हिंसा की आग में देश

प्रमोद भार्गव
बम को चिंगारी से बचाने की दूरद्रष्टि  हमारे ज्यादातर नेताओं में नहीं है। यदि यह द्रष्टि होती तो सर्वोच्च न्यायालय के 20 मार्च 2018 को आए जिन दिशा -निर्देश  को लेकर देश  में बवाल मचा, उसे यथास्थिति में बनाए रखने की जो पुनर्याचिका केंद्र सरकार ने विरोध प्रदर्शन  के दिन न्यायालय में पेश  उसे पहले भी प्रस्तुत किया जा सकता था। विपक्षी दलों ने भी सुलगती आग देखकर आग में घी डालने का काम किया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो यहां तक कहने की नादानी की कि भाजपा और संघ दलितों को निचले पायदान पर रखने का शड्यंत्र रच रहे हैं। कुछ इसी तरह का भड़काने वाला बयान बसपा प्रमुख मायावती का आया। दलितों के कथित हित साधने के बहाने आए ये बयान सुनियोजित तरीके से दिए लगते हैं। क्योंकि यह समझना कठिन है कि हिंसा की आग भड़काकर आखिरकार देश  और दलों को क्या हासिल हुआ ? यही न कि 10 लोग मारे गए और करोड़ों की सरकारी व निजी संपत्ति आग के हवाले कर दी गई। भारत बंद में  प्रदर्शनकारिओं  की ऐसी हृदयहीनता भी देखने में आई कि मां की गोद में एक मासूम की सांसें केवल इसलिए थम गईं, क्योंकि एंबुलेंस को आंदोलित लोगों ने अस्पताल जाने के लिए रास्ता नहीं दिया। यह नाकामी उस प्रशासन की भी है, जिसने गुस्साए महिलाओं और पुरुषों को हाथों में डंडे, तलवारें और बंदूक लेकर प्रदर्शन  स्थलों की ओर जाने दिया। ग्वालियर-चंबल संभाग के भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी और डबरा में यही देखने में आया। शायद इसीलिए इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा 5 लोग मारे गए।
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 में दर्ज महज गिरफ्तारी के प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने नए निर्देश  दिए थे। जिससे इस कानून का दहेज कानून की तरह दुरुपयोग न हो। अदालत ने सिर्फ यह फैसला दिया था कि इस कानून में सिर्फ प्राथमिकी के आधार पर गिरफ्तारी न हो, क्योंकि यह गलत है। आदर्श  स्थिति तो यही होती यदि उच्च न्यायालय ने किसी मुद्दे पर कोई फैसला दिया है तो उसे लेकर सड़कों पर उतरकर अराजकता फैलाने से बचा जाए। दरअसल इस फैसले के विरुद्ध भी पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का अधिकार सरकार और दलित संगठनों के पास सुरक्षित था दुनिया भर के नागरिक एवं मानवाधिकार संगठन यह दलील दे रहें है कि किसी भी गैर-नृशंस अपराध में केवल एफआईआर के आधार पर यदि गिरफ्तारी का प्रावधान है तो उसका दुरुपयोग होगा ही। इसकी मिसाल हमारे यहां दहेज विरोधी कानून हैं, जिसके शिकार हर जाति, धर्म और वर्ग के लोग हो रहे हैं। इसमें भी गिरफ्तारी के प्रावधान का खात्मा सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के आधार पर किया गया है। इस लिहाज से एससी-एसटी कानून के तहत थाने में दर्ज किए जाने वाले मामलों में दुरुपयोग की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए इसका दुरुपयोग न हो इस परिप्रेक्ष्य में गिरफ्तारी पर रोक व्यावहारिक थी। हालांकि एसडीओपी स्तर के अधिकारी द्वारा जांच के बाद यदि शिकायत सही पाई जाती है तो गिरफ्तारी की अनुमति मिल जाएगी। इसी तरह सरकारी कर्मचारी इस कानून का दुरुपयोग करता है तो उस कर्मचारी की गिरफ्तारी के लिए विभाग के प्रमुख अधिकारी से अनुमति लेना जरूरी है। इस द्रष्टि से यह फैसला जांच के जरिए सच्चाई सामने लाना भर था। वैसे भी उच्च न्यायालय सब के लिए है और बदलते समय के अनुसार उसकी व्याख्या भी वर्तमान परिदृष्य में उच्चतम न्यायालय ही करता है। संविधान का प्रमुख रक्षक भी यही न्यायालय है। ऐसे में यदि उसकी मंशा  पर संदेह का सिलसिला चल निकला तो धर्म और जाति से जुड़े फैसलों के विरोध का सिलसिला भी चल पड़ेगा। जबकि संविधान में दर्ज प्रावधानों के आधार पर ही सभी जाति और धर्म के लोगों को देश में सम्मानजनक ढंग से रहने के मौलिक अधिकार मिले हुए हैं। गोया अदालत के फैसलों का सम्मान जरूरी है।
लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि नरेंद्र मोदी की सरकार के दौरान दलित एवं वंचित तबकों के बीच अविश्वास  में दंभ का उभार निर्लज्ज ढंग से सार्वजानिक हुआ है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि फिल्म पद्मावत को सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रसारण की मंजूरी मिल जाने के बावजूद करणी सेना का हिंसक विरोध सामने आया था और इसे भाजपा शासित राज्यों का समर्थन भी मिला था। कमोवेश  ऐसे ही हालात दलित छात्र रोहित वेमुला के प्रकरण में देखने में आया था। तब उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव का मामला भी उठा था। इस बाबत कुछ केंद्रीय मंत्रियों और शिक्षा संस्थानों के आला अधिकारियों का आचरण कमजोर छात्रों के प्रति सहानुभूति दिखाने की बजाय उनको सबक सिखाने के जैसा था। गुजरात के ऊना में गाय मारने और कई अन्य जगह गाय की तस्करी करने या उसका मांस खाने के सिलसिले में भी दलितों को प्रताड़ित किया गया। इन घटनाक्रमों से पूरे देश  में दलितों के बीच यह संदेश  गया कि मोदी सरकार को उनके हितों की ज्यादा चिंता नहीं है। यह भी धारणा बनी कि सरकार दलितों पर अत्याचार करने वाले राजग तत्वों को सरंक्षण दे रही है। यही वजह रही कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों को दलितों ने केंद्र सरकार की मंशा  के रूप में लिया और आधे देश  में प्रदर्शन  के दौरान हिंसा भटक गई।
जबकि हकीकत यह है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मिलकर देश  में दलित और आदिवासियों के उत्थान के लिए जितने प्रकल्प चलाए हुए हैं, उतने चलाए जाने की मंशा  कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों में नहीं है। 55 साल कांग्रेस देश  सत्ता पर काबिज रही, लेकिन उसने संगठन के स्तर पर अनुसूचित जाति व जनजातियों के उत्थान व संमृद्धि के लिए कोई प्रकल्प नहीं चलाए। जबकि संघ के करीब डेढ़ लाख प्रकल्प आदिवासियों की शिक्षा और कल्याण के लिए चल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही पहली बार 26 नबंवर को संविधान दिवस घोषित  किया। इस दिन अब संसद व विधानसभाओं समेत शिक्षण संस्थाओं में संविधान और डाॅ भीमराव अंबेडकर के योगदान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों पर चर्चा होती है। सबसे अधिक दलित सांसद भी भाजपा के ही है। लोकसभा में 66 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें से 40 भाजपा के सांसद हैैं। दलित रामनाथ कोविंद को राश्ट्रपति बनने का अवसर भी इसी दल ने दिया। दलितों की सुप्रीम कर्णधार माने जाने वाली मायावती को दो मर्तबा उत्तर प्रदेश  की मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला, लेकिन उन्होंने न तो शिक्षा में समानता लाने के प्रयास किए और न ही हिंदी माध्यम से सरकारी विद्यालयों में पढ़े दलित व आदिवासियों को नौकरियों में प्राथमिकता के प्रावधान किए। इसके उलट वे मायावती ही थीं, जिन्होंने अनुसूचित जाति व जनजाति से जुड़े करीब एक दर्जन कानूनों को शिथिल  किया। यही नहीं ब्रह्माणों को सरकारी नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव भी उन्होंने विधानसभा से पारित कराया था। इन संदर्भों में दलितों को भी यह देखने की जरूरत है कि उनके नाम पर विपक्षी नेता राजनैतिक रोटियां तो नहीं सेंक रहे ? अब तो हालात इतने बद्तर हो गए है कि सियासी दल वोट की राजनीति के चलते किसी भी मुद्दे को तूल देने लग जाते हैं। नतीजतन मास पाॅलिटिक्स की इस प्रवृत्ति के चलते ही नेता शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को भी हिंसा के लिए उकसाने का काम करने लग जाते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे दलित एवं आदिवासी समुदाय सदियों से कई तरह की मनोवैज्ञानिक हिंसा शारीरिक प्रताड़ता झेलते आए हैं। इस नजारिए से उन्हें एससी-एसटी एक्ट एक हथियार का अनुभव कराता है। ऐसे में इसमें कोई संशोधन  प्रावधान सामने आता है तो उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि उनके हथियार की धार भौंथरी हो जाएगी। उनकी ताकत कमजोर पड़ जाएगी। इसमें शताब्दियों से चले आ रहे उनके शोषण पर प्रतिबंध का कानूनी भरोसा अंतर्निहित है। वैसे दलित और आदिवासियों में फैली निराशा  के लिए किसी एक सरकार या दल को दोशी नहीं ठहराया जा सकता है। देश पर 55 साल कांग्रेस और 10 साल भाजपा ने राज किया। बीच-बीच में मोरारजी देसाई, चरणसिंह, चंद्रशेखर, वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल को भी प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला। लेकिन समस्याएं यथावत रहीं। इनमें से कोई भी दल और नेता राजनैतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्याओं के समाधान की दिशा  में आगे नहीं बढ़ा। नतीजतन दबंग लोगों के हाथों दलित और आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन बरकरार रहा। यदि सत्तर साल की आजादी के बाद भी यह कलंक और भेदभाव बना रहता है तो यह स्थिति संवैधानिक लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।

2 thoughts on “दलित हिंसा की आग में देश

  1. पुलिस भी आपकी और न्यायपालिका भी आपकी , तो फिर बिना दाँत के शेर की तरह दलित अत्याचार निवारण क़ानून किस काम का? क्या मीसा , NSA और यूपीकोका जैसे क़ानूनों के बारे में सुप्रीम कोर्ट इसी तरह की दलीलें देकर राज्य की शक्ति को कम करने का काम करेगा और नहीं तो क्यों नहीं ?

  2. विभिन्न भाषाओं, धर्मों, और रीती-रिवाज़ों के चलते जिस देश में कुम्भ के अतिरिक्त किसी और सामाजिक पर्व पर स्वतः इतने लोगों का टिड्डी दल की तरह उमड़ कर इक्कठे हो जाना ही अपने में कई एक प्रश्न छोड़ जाता है| कौन है वो प्रायोजक जो इस उदंड को आयोजित कर भारतीय नागरिकीं में एक विशाल वर्ग को केंद्र में राष्ट्रीय शासन और स्वयं भारत के लिए चुनौती बना खड़ा कर देता है? क्या भीड़ को नियन्त्र में रख पाने अथवा भीड़ में लोगों को उकसाने और उनके द्वारा हिसंक अपराध होने पर उन्हें और पयोजकों को दंडित करने के कानून नहीं हैं? पिछले सत्तर वर्षों में कांग्रेस और उनके राजनैतिक सहयोगियों ने न केवल बीस करोड़ दलितों और उनके साथ न जाने कितने किसानो, वामपंथियों, और बुद्धिजीवियों की सेनाएं बना रखी हैं बल्कि पूर्व सत्ता द्वारा स्वतन्त्र भारत में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७ के अंतर्गत मिले अधिकारी-तंत्र के नेतृत्व से अब तक विदेशी राज जैसी स्थिति बनाई हुई है| ऐसे में कुंठित हो मैं सोचता हूँ कौन हैं एक सौ पच्चीस करोड़ भारतीयों में जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ कदम बढ़ाते कांग्रेस-मुक्त भारत का पुनर्निर्माण कर पाएंगे!

    मैं स्वयं भीड़ में प्रदर्शनकारियों से पूछूंगा कि क्या उन्हें अंग्रेजी भाषा में लिखे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए दिशा-निर्देश का ज्ञान और समझ है और यदि है तो दिशा-निर्देश द्वारा स्वयं प्रभावित मैं उनके विचार पूछूंगा| यदि हिंदी भाषी जगत के सभी पत्रकार प्रदर्शनकारियों को ऐसे प्रश्न पूछने लगें तो उनके सामूहिक कोलाहल से ही घबरा भीड़ तितल-बितर हो जाए!

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