लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

Posted On by &filed under समाज.


प्रमोद भार्गव

अछूत, दलित और आदिवासियों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत अछूतोद्वार की दिशा में की गई रचनात्मक शुरूआत और अभिनंदनीय पहल है। सनातनी हिन्दुओं द्वारा अपने ही समाज के एक बडे़ हिस्से को भिन्न व अस्पृश्य वर्ग बना देना हिन्दू धर्म के माथे पर सदियों से लगा चला आ रहा ऐसा कलंक है, जो धोए नहीं धुल रहा है। इस लिहाज से केरल के मंदिरों में अनुसूचित जाति और जनजाति के युवाओं को पुजारी बनाए जाने का निर्णय त्रावणकोर देव स्वामी मंडल (टीडीबी) का अनूठा फैसला है। यह मंडल 1248 मंदिरों का प्रबंधन करता है। इनमें सबरीमाला का प्रसिद्ध अयप्पा मंदिर भी शामिल है। इन मंदिरों में  36 गैर ब्राह्मणों सहित 6 दलितों की नियुक्तियां की गई हैं। इनकी नियुक्ति लोक सेवा आयोग की तर्ज पर लिखित व मौखिक परीक्षा लेकर हुई हैं। येदू कृश्णन नाम के पहले दलित पुजारी ने मंदिर में पूजा-पाठ का काम शुरू भी कर दिया है। इसके पहले मदुरै के पास उथपुरम् गांव के मंदिर में दलित समुदाय के लोगों का प्रवेश एक ऐतिहासिक व यूगांतरकारी घटना थी। इस मंदिर में दलितों के प्रवेश पर 20 साल से रोक लगी हुई थी। ये लोग प्रतिकात्कम रूप से मंदिर परिसर में खड़े पीपल के पेड़ की परिक्रमा लगाकर पूजा-अर्चना कर लिया करते थे। अछूत दीवार को तोड़कर समता का यह काम विश्व हिन्दू परिषद ने किया था।

दक्षिण भारत के मंदिरों में दलितों के प्रवेश को कानूनी रूप से 80 साल पहले 1936 में त्रावणकोर के महाराजा ने दिया था। इसके बाद जुलाई 2008 में तिरूपति मंदिर में दलितों को पूजा का अधिकार दिया गया था। इस अवसर पर दलितों का जो स्वागत हुआ, वह हिन्दू समाज में कमोबेश परंपरा बन चुकी रूढ़िवादिता, छूआछूत और जातिवाद को समाप्त कर देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल थी। अब दलितों को पुजारी बनाना उनके सम्मान में पेश आई नई कड़ी है। दरअसल दलितों के हित साध्य के हेतुओं में राजनीतिक स्वंतत्रता से कही ज्यादा सामाजिक समानता और समरसता का महत्व है। यह पहल उनमें गरिमा बढ़ायेगी, वे जातिगत हीनताबोध से मुक्त होंगे, फलस्वरूप उनका आत्मबल भी प्रबल होगा। गोया, यह सम्मान उनका हिन्दुओं की मुख्यधारा का हिस्सा बन जाने की दिशा भी सुनिश्चित करेगा।

गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था ‘अछूतों का एक जुदा वर्ग बना देना हिन्दू धर्म के माथे पर कलंक है। यह अस्पृश्यता रूपी राक्षसी तो रावण से भी भंयकर है और जब हम इस राक्षस की पूजा करते हैं, तब तो हमारे पाप की गुरूता और बढ़ जाती है। यदि इसे धर्म कहें तो ऐसे धर्म से मुझे घृणा होती है। यह हिन्दू धर्म हो ही नहीं सकता। मैंने तो हिन्दू धर्म द्वारा ईसाई धर्म और इस्लाम का आदर करना सीखा है, फिर यह पाप हिन्दू धर्म का अंग कैसे हो सकता है ? इस पाखंड और अज्ञान के खिलाफ यदि जरूरत पड़े तो मैं अकेला लडूंगा, अकेला तपश्चर्या करूंगा और उसका नाम जपते हुए मरूंगा।‘ गांधी ने धर्म के पाखंड से जुड़ी कुरीतियों पर जितना मुखर हमला बोलकर सामाजिक समरसता के प्रयास किए थे, उतने प्रयास स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद किसी अन्य नेता नहीं किए। गांधी ने अपने अस्पृश्यता विरोधी अभियान को केवल वैचारिक स्तर तक ही सीमित न रखते हुए इसे व्यावहरिक बनाया। यही नहीं 1920 में जब गांधी ने अंग्रेजी-राज के विरुद्ध असहयोग आंदोलन की शुरूआत की तो इसके सामानांतर ही अस्पृश्यता उन्मूलन मुहिम को राष्ट्रव्यापी जागरूकता के अभियान के रूप में गतिशीलता प्रदान की।

इसमें कोई दो राय नहीं भारत की नामचीन सवर्ण जातियों ने धार्मिक कर्मकाण्ड और पाखण्ड की कपोल कल्पित पृष्ठभूमि के आधार पर जन्म की प्राकृतिक देन के साथ भेदभाव और छूआछूत की संकीर्णता का बीजारोपण किया जिसके कारण कृषि, लघु व हस्त शिल्प उद्योगों में उत्पादन से जुड़ी एक बड़ी आबादी को दलित व  अछूत का दर्जा देकर सदियों से शर्मनाक व निंदनीय हालातों को बदलने की शुरूआत आजादी के समय से ही की जा रही थी। इसलिए इन जातियों के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक उत्थान को दृष्टिगत रखते हुए इन वंचितों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में आरक्षण के समुचित संवैधानिक प्रावधान रखे। मंडल आयोग के मार्फत उच्च प्रशासनिक पदों में भी उत्पीड़ितों को आरक्षण के अधिकार मिले। आरक्षण का लाभ उठाकर लाखों लोग धर्म और जाति की बिना पर बहिष्कृत, प्रतिष्ठापूर्ण राजनीतिक व प्रशासनिक पदों की शोभा बने, लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रगतिशील रास्ता अपनाने की बजाय उस ब्राह्मणबाद के अनुयायी हो गये, जिस ब्राह्मणबाद के पाखण्ड के चलते यह बहुसंख्यक समाज उपेक्षित था। दलित सरोकारों की बात तो दूर की कौड़ी रही, जो लोग आरक्षण के बूते अधिकार और आर्थिक समृद्धि के सोपान चढ़े थे, उनमें से अधिसंख्य अपने समाज से भी कट गए। विडंबना तो इस हद तक थी कि जब क्रीमीलेयर के बहाने आरक्षण प्राप्त कर चुके लोगों के बच्चों को आरक्षण से मुक्त रखने की बात उठने लगी तो यह तबका आरक्षण के लाभ को छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। इससे यह तय हुआ कि अपने ही जातीय समूहों के कल्याण हेतु व्यक्तिगत लाभ और आरक्षण के अवसर की कोई आहुति देना नहीं चाहता। लिहाजा जो कमजोर तबका सवर्ण जातियों की उलाहना झेलता चला आ रहा था, वह अपने ही समाज की उपेक्षा झेलने को भी विवश हो गया। यही नहीं आरक्षण के अवसर का लाभ पाए इन दलितों ने उच्च दलित बन जाने पर भाग्य और भगवान का जाप करते हुए दलित और उच्च दलित के बीच कमोवेश ठीक वैसी ही विभाजक रेखा खींच दी, जो जन्म के आधार पर सदियों से सवर्ण और अवर्ण के बीच खिंची चली आ रही थी ?

ऐसे विषम हालातों में मंदिरों में दलित पुजारियों की तैनाती हिन्दुत्व को बड़े स्तर पर पुनर्जीवित करना है। इससे हिन्दू धर्म की वह सामाजिक रूढ़िवादिता भी खत्म होगी, जो समाज में असमानता को बढ़ावा देती चली आ रही थी। तिरूपति देवस्थानम् के अध्यक्ष बी. करूणाकर रेड्डी ने तो यहां तक कहा है कि धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में दलितों पिछड़ों व आदिवासियों को शामिल तो करेंगे ही, वे वैदिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकें इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा। यह पहल हिन्दू समाज में भिन्न धर्म-उपधर्म और जाति-उपजातियों के कारण जो भेदभाव और बिखराव फैला हुआ है, उसे कम करेगी तथा समाज में एकता स्थापित होगी और एकता स्थापति होती है तो राष्ट्रीय अखण्डता भी मजबूत होगी। वैसे भी हमारा संविधान अनेक नागरिक अधिकारों के साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दलित हिन्दुओं में धर्म परिवर्तन की भावना का उत्स यदा-कदा फूट पड़ता था, उस पर विराम लगेगा। हिन्दू जातियांे व उप-जातियों के बीच परस्पर आत्मविश्वास का संबल पैदा होगा। क्योंकि यह एक विचित्र विडंबना ही थी की एक ही धर्म के अनुयायी होने के बावजूद मंदिरों में प्रवेश और पूजा से वंचित थे।

हालांकि कुछ जातीय समूहों को दलित आदिवासी और पिछड़ी बना दिए जाने के कारण ऐतिहासिक भी रहे हैं। लेकिन हिन्दू हित चिंतकों ने अवैज्ञानिक व अविवश्नीय इन मिथकों को तोड़ने की कोशिश नहीं की, क्योंकि यही अंधविश्वास उनकी प्रतिष्ठा का आधार था। कर्मकाण्ड का अंधविश्वासी यही अनुष्ठान उनकी जीविकोपार्जन का साध्य भी था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद देश में गृहयुद्ध के जो हालात उपजे और विदेशी आक्रांताओं के सिलसिलेवार जो हमले हुए उस उथल-पुथल में धर्म के निष्ठावान अनुयायी श्रीहीन हुए। फलस्वरूप धर्म के वाहक ऐसे लोग बन बैठे, जिन्होंने आक्रांताओं के समक्ष घुटने टेक दिए। नतीजतन यथास्थितिवाद के शिकार पंडे-पाखंड़ियों ने वैदिक कालीन वर्ण-व्यवस्था के सामाजिक विचार को जन्म के अलौकिक चमत्कार, और विधि के विधान से जोड़कर रूढ़िवादी दुर्बल पराजय में ढाल दिया। अलौकिक चमत्कार की अवधारणाओं ने देश को परतंत्र बना देने में भी अहम् भूमिका निभाई। जब महमूद गजनबी यवन आक्रमणकारियों के साथ सोमनाथ के प्रसिद्ध शिव मंदिर पर चढ़ाई कर रहा था तो मंदिर के पंडे-पुजारियों ने प्रतिकार के लिए सनद्यय खड़े लोगों को भरोसा जताया की भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और देखते-देखते यवन सेना भस्म हो जाएगी। लेकिन चमत्कारवादी आलौकिक अवधारणाओं के क्या फलित निकले यह इतिहास के पन्नों पर शर्मनाक दस्तावेज के रूप में दर्ज है। दैवीय शक्तियों के भ्रामक विचार ने दुर्बल मानसिकता को जन्म दिया और राजे-रजवाड़े व स्वतंत्र जनपदों में बंटे देश के सत्ताधारी घुटने टेकते चले गये। इस उथल-पुथल में जिन योद्धा समूहों ने पराजय नहीं मानी और अपने धर्म व अस्तित्व को बचाये रखने के लिए भटकते रहे, इनमें से भी कई जातीय समूह दरिद्र जातियों के समूह में तब्दील होते चले गये।

स्वातंत्रयोत्तर भारत में हैरानी की बात यह रही कि राजनीतिक स्तर पर भी वैज्ञानिक तरीके से जातीय अवधारणा की पड़ताल नहीं की गई। हां, जातीयता और सांप्रदायिकता को वोट की राजनीति के चलते भुनाया जरूर जाता रहा। सामाजिक न्याय के पैरोकारों ने तो मंडल के बहाने जातीवाद को घृणा की हद तक पहुंचाने का काम ब्राह्मणबाद की तरह किया। बावजूद इसके ऐसा नहीं है कि जातिवाद के विरुद्ध दृष्टि व्यापक न हुई हो, छुआछूत का भेद और दलित का अपमान आज दंडनीय अपराध के दायरे में है। बहरहाल अब समय आ गया है कि अवसर का लाभ उठाते हुए हिन्दू हित चिंतक दरिद्रनारायण कहे जाने वाले सभी हिन्दू, हिन्दुओं के लिए शेष रहे मंदिरों के द्वार खोल दें और आदर के साथ उन्हें प्रवेश व पूजा-अर्चना का अवसर दें। क्योंकि सवर्ण हिन्दुओं के व्यापक हित दरद्रि को नारायण बना देने के व्यापक हितों में ही निहित व सुरक्षित हैं। यह स्थिति इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आज पढ़े-लिखे दलितों का एक वर्ग सवर्ण जातियों के विरुद्ध नफरत का पाठ पढ़ाने में लगा है।

 

One Response to “केरल में दलित बने मंदिरों के पुजारी”

  1. धर्मेन्द्र गुप्ता

    भार्गव जी , आप से जानना चाहूंगा कि ये आप ने जो ब्राह्मणवाद का जो शब्द बतआया है ,इसे शब्द का जनक कौन है ।दूसरा दलित शब्द इसकी सुरुवात कब हुई और किसने पहली बार इस्तेमाल किया ।
    सोमनाथ के मंदिर में जब मुस्लिम लूटेरो ने हमला किया जिनका मकशद मूर्ति को खंडित करना था और वह से अधिक से अधिक संपत्ति चुराना था तो ये कहानी कौन लिख रहा था कि मंदिर के पुजारी महादेव के तीसरी आंख खोलने का ििनतआज़ार कर रहे थे । उस बंदे का नाम जरूर बताइये ।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *