लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार-
election modi

नजरिया-1-
भारतीय जनता पार्टी ने एक स्पष्ट एजेंडे के साथ चुनाव में जाने का फैसला किया, मोदी के नेतृत्व में और मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर, यहां कांग्रेस वाली भ्रम की स्थिति नहीं थी। भाजपा ने अपना एक प्रधानमंत्री का उम्मीदवार जनता के समक्ष रखा और उस के नाम पर जनता से बहुमत की गुजारिश की और अगर मोदी के नाम पर भाजपा की सरकार बनती है तो मोदी जनता के द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री साबित होंगे ना कि हाईकमान के द्वारा थोपे हुए प्रधानमंत्री। कांग्रेस तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने का साहस भी नहीं जुटा पायी (निश्चित ही जीत की स्थिति में राहुल को थोप दिया जाता) और यहीं रणनीति के फ्रंट पर भाजपा से उसकी पहली हार हुई।

सरकार बनने की स्थिति में भारतीय जनता पार्टी और उसके घटक दल बेहिचक सीना ठोक के कह सकते हैं कि यही “Referendum” है…

नजरिया-2-

२०१४ के चुनाव में मतदान के ट्रेंड को विश्लेष्णात्मक दृष्टि से देखा जाए तो मतदान के समय तक जनता का आक्रोश केंद्र की नीतियों, तुष्टीकरण, भ्रष्टाचार, महंगाई, इत्यादि के कारण चरम पर था और इस आक्रोश को सकारात्मक तरीके से अपने पक्ष में भुनाने का काम नरेंद्र मोदी ने जनता के साथ एक संवाद कायम कर बखूबी किया। जाति और धर्म पर आधारित मतों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण में भी मोदी और उनके रणनीतिकार अपने विरोधियों पर भारी पड़े। इसके लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण सबसे सटीक है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टीम मोदी ने मुजफ्फरनगर दंगों की पृष्ठभूमि में धर्म की राजनीति को आधार बनाकर मतों की गोलबंदी अपने विरोधियों की तुलना में बेहतर तरीके से की और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरणों को भी प्रभावी तरीके से अपने पक्ष में भुनाया। विरोधियों के एडवांटेज को अपने एडवांटेज के रूप में तब्दील कर लेना चुनावों में सफलता की गारंटी है और इस बार के चुनावों में मोदी और उनकी टीम ने इसे बखूबी अंजाम दिया।

नजरिया-3-

एक्जिट पोल के नतीजों की अगर मानें तो ऐसा प्रतीत होता है कि “सम्पन्न चुनावों के दौरान जिस तरह से मोदी विरोध का “डबल -ट्रिपल डोज़” जनता को पिलाकर भरमाने की कोशिश की गयी, वही उल्टा पड़ गया इसके प्रणेताओं पर लोकतन्त्र का अजीबो-गरीब ‘दिवालिया-स्वरूप’ उभरकर आया इस दौरान, जहां राजनीति का एक बड़ा तबका लोकहित में मुद्दों पर आधारित बहस से खुद को अलग कर और एक व्यक्ति-केन्द्रित विरोध में लिप्त हो कर सिर्फ और सिर्फ देश की जनता की आँखों में धूल झोंकने का काम करता दिखा।”

2 Responses to “चुनावी-पोस्टमार्ट्म : मेरा नजरिया”

  1. Himwant

    यह समय इतराने का नहीं है. कुछ करने का है. समय कम है और अपेक्षाएं बड़ी. समृद्धि भारत का अधिकार है, वह उसे दिलाना होगा. यह जनता और सरकार की सामूहिक जिम्मेवारी है.

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