अंग्रेज़ी वर्णमाला की त्रुटियाँ–मार्क ट्वैन के विचार

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english alphabetsडॉ. मधुसूदन

(एक) रोमन वर्णमाला पर — मार्क ट्वैन की उक्तियाँ:
मार्क ट्वैन, सच्चाई को व्यंग्यात्मक शैली में,उजागर करने के लिए जाने जाते थे। उनके निम्न उद्धरण इस दृष्टि से रोचक भी हैं; पर सच भी हैं।
(१)**”किसी बूढे चोर ने शराब पी कर इस की रचना की होगी।”
(२)**”जब सारी  (अंग्रेज़ी )वर्णमाला ही सडी हुयी है। तो, मात्र वर्तनी (स्पेलिंग) सुधार से क्या लाभ?”
(३)**”इस रद्दी (रोमन)वर्णमाला को पूरी की पूरी उठाकर कूडे में फेंक देनी चाहिए।”
(४)**”वर्णमाला ही सुनिश्चित और शुद्ध होती, तो वर्तनी की भी आवश्यकता ना होती।”
(५)**”ये वर्णमाला, अस्पताल से जगाकर  लाये रोगियों जैसी है।”
(६)**”इस वर्णमाला में लिखना  बैसाखी पर नाचने जैसा है।”
७)**”यदि हमारे पास ऐसी वर्णमाला होती, जिस में, प्रत्येक स्वर का सुनिश्चित उच्चार होता, और साथ उस में, सारे संभाव्य व्यंजन भी सम्मिलित होते, तो संसार की किसी भी भाषा के शब्दों को हम लिख सकते।”
{भारत के पास ऐसी वर्णमाला है, उस में आप के चीन्हे हुए सारे गुण तो है, ही, कुछ अधिक भी है।—लेखक}

(दो) मार्क ट्वैन
अंग्रेज़ी (स्पेलिंग)वर्तनी सुधार -डिसम्बर ९ १९०७ का समारोह:
अमरीकी उद्योगपति ऍंड्रू कार्नेगी ने भारी धनराशि दे कर, अंग्रेज़ी  (स्पेलिंग) वर्तनी सुधार के लिए,विद्वानों की समिति गठित करवाई थी। इस समिति ने वर्तनी सुधार का कुछ काम पूरा किया था।समिति की कार्यवाही, समीक्षा, और साथ साथ दानवीर कार्नेगी का सम्मान ऐसे उद्देश्यों से एक समारोह  डिसम्बर ९-१९०७ को न्यु-योर्क के महानगर में आयोजित किया गया था।
मार्क ट्वैन इसी  अवसर पर प्रमुख वक्ता के नाते बोल रहे थे।वे कार्नेगी के मित्र थे, पर स्वतंत्र विचारों को व्यंग्यात्मक शैली में रखने के लिए जाने जाते थे।
आगे पढने पर आप जान जाएंगे, कि, वर्तनी सुधार के लिए, वे सहमत नहीं थे। उनके दृढ मत में  वर्णमाला का ही सुधार या नई वर्णमाला का आविष्कार आवश्यक था।
रोमन वर्णमाला की त्रुटियों को उजागर करनेवाले उनके इस भाषण के मह्त्वपूर्ण अंशोको इस आलेख में प्रस्तुत किया  है। पर पहले वर्तनी सुधार समिति का काम देखना उचित होगा। जिसकी प्रस्तुति के पश्चात मार्क ट्वैन का भाषण के ऐसा क्रम उचित समझता हूँ।

(तीन )वर्तनी सुधार समिति के सुझाव:

निम्न १२ उदाहरण आपको इन सुधारों की कल्पना दे सकते हैं।
प्रचलित वर्तनी बाँए है, सुधारित दाहिने।
(१)business->नई वर्तनी ->bizness-बिझनेस,
(२)enough–>नई  वर्तनी  —>enuf -इनफ,
(३)feather–> नई वर्तनी—>fether-फ़ेदर,
(४)measure–>नई वर्तनी–>mesure-मेज़र,
(५)pleasure—>नई वर्तनी–>plesure-प्लेज़र,
(६)read –>नई वर्तनी–> red-रेड,
(७)rough—>नई वर्तनी–ruf–रफ़,
(८)trough–>नई वर्तनी–>trauf—-> ट्रौफ,
(९)tough–>नई वर्तनी—-> tuf—टफ,
(१०)Through –>नई वर्तनी—thru थ्रु,
(११)tongue-नई वर्तनी—>tung  -टंग,
(१२)young-नई वर्तनी–yung—यंग,
ऐसी प्रायः  ३०० शब्दों की सुधारित वर्तनी आयी। प्रारंभ में इस सुधार के लिए उत्साह था। शासन की ओर से भी स्वीकृति दी गई थीं। राष्ट्रपति थिओडॉर रुझवेल्ट ने आदेश निकाला था और सारे शासकीय मुद्रणालयों को नयी वर्तनी के अनुसार साहित्य मुद्रित करने को कहा गया।साथ साथ समाचार पत्र भी इसका अनुसरण करने लगे थे।

यह कोई साधारण प्रभाव नहीं था। ऐसी स्थिति में मार्क ट्वैन का वर्णमाला का विरोध विशेष ध्यान खींचता है।
पर नयी वर्णमाला का सुझाव सफल नहीं हुआ। कारण था, पहले से छपी पुस्तकों की नयी लिपि में परिवर्तित करने की असंभाव्यता। और अन्यान्य देशो में अंग्रेज़ी शब्दों के भिन्न उच्चारण भी इसका एक कारण था। फिर, अंग्रेज़ी ने १२०  भाषाओं से शब्द उधार लेकर समस्या को बहुत कठिन बना दिया था; जो अपने मूल उच्चारों और वर्तनी के साथ अंग्रेज़ी में बस गये थे।

कुछ शब्दों की, अमरीकी-वर्तनी इंग्लैण्ड की अंग्रेज़ी से अलग थी। वेबस्टर के शब्द कोश  के कारण पहले से अस्तित्व में थी ही। वेबस्टर ने, अमरीका की अलग राष्ट्रीयता को पुष्ट और इंग्लैण्ड से अमरीका की अलग पहचान प्रस्थापित करने के हेतु, ऐसा  किया  था। भाषा राष्ट्रीयता की  विशेष  पहचान होती है, और उस पहचान को पुष्ट करने के हेतु से वेबस्टर ने महत प्रयास किए थे। इस प्रक्रिया का रोचक इतिहास एक अलग आलेख की क्षमता रखता है।

(चार)मार्क ट्वैन व्यंग्यात्मक, पर स्पष्टवक्ता:

मार्क ट्वैन स्पष्ट वक्ता थे। उनका वक्तव्य सच्चा पर व्यंग्य भरा हुआ करता था। अमरीका में, उनकी व्यंग्यात्मक उक्तियाँ बहुत प्रसिद्धी पा चुकी हैं; जिन्हें आज भी लोग स्मरण करते हैं।उनकी निम्न रोचक उक्ति आज कल के प्रदूषित संचार माध्यम पर लागू होती है; इसलिए प्रस्तुत है।
“If you don’t read the newspapers, you’re uninformed. If you read them, then, you’re misinformed.”―”यदि समाचार नहीं पढते, तो अनजान हो; और पढते हो, तो मस्तिष्क झूठ से भर जाता है।”

(पाँच) मूर्ख, बूढे शराबी की वर्णमाला:
अंग्रेज़ी वर्णमाला को, वे, “मूर्ख बूढे शराबी की बनाई हुयी” मानते हैं; और अंग्रेज़ी-वर्तनी को “सडी हुयी वर्तनी”। मार्क ट्वैन कहते हैं; कि, रोमन वर्णमाला ही रद्दी  है, उसे पूरी कि पूरी उठाकर कूडे में फेंक देनी चाहिए।
{ठीक है , ट्वैन महाराज, खिडकी से रोमन लिपि को आप फेंकिए, हम उस रद्दी लिपि को झेल कर ले आएंगे।हम हिन्दीयन अंग्रेज़ी के किंकर दासानुदास उस रद्दी लिपि को शतकानुशतकों तक सम्मान देकर अपनाएंगे।हम अपनी  दकियानूसी देवनागरी से ऊब गये हैं; उससे हमें छुटकारा चाहिए।}
उस सभा में ऐसा अनपेक्षित और निर्भिक कथन  मार्क ट्वैन द्वारा किया गया था। इस लिए भी ये कथन विशेष महत्व रखता है।
“साहेब वाक्यं प्रमाणं” मानने वालों, तनिक इसे दुबारा पढो।
उन्होंने वर्णमाला को रद्दी, सडी हुयी, शराबी बूढे चोर ने रची, अस्पताल के रोगियों को जगाकर लाये हुए लोगों जैसी” ऐसे शब्दों से व्यक्त किया है। मार्क ट्वैन का कहना था, कि, सारी वर्णमाला ही कूडे में फेंक देनी चाहिए। वर्तनी नहीं, वर्णमाला ही सडी हुयी  है।
अंतमें कहते हैं,  “इस वर्णमाला में लिखना बैसाखी पर नाचने जैसा है।”  फिर नाच का भी नाम उन्हों ने Vitus Dance कहा है। Vitus Dance का रोगी सतत हिलते -नाचते रहता है। ध्यान रहे, वे  अंग्रेज़ी के ख्यातनाम लेखक थे, जिनका व्यवसाय ही लेखन था, उनके  अंग्रेज़ी वर्णमाला, विषय के विचार बिना तोड मरोड प्रस्तुत किए हैं। लेखक ने भावानुवाद किया है।कुछ मूल अंश नीचे देख सकते हैं।

Mark Twain had little respect for what he called our “foolish” and “drunken old alphabet,” or for the “rotten spelling” that it encouraged.

Yet Twain doubted that the efforts of spelling reformers would ever succeed.

It was the alphabet itself, he believed, that needed to be tossed out and rebuilt from scratch.

(छः)मार्क ट्वैन के भाषण के महत्वपूर्ण अंश:

“यदि हमारे पास ऐसी वर्णमाला होती, जिस में, प्रत्येक स्वर का सुनिश्चित स्वतंत्र उच्चार है, और साथ सारे संभाव्य व्यंजन भी हैं, तो संसार की किसी भी भाषा को हम लिख सकते” और हमें वर्तनी सुधार की कोई आवश्यकता ही ना होती। क्यों कि ऐसी शुद्ध वर्णमाला बिना वर्तनी (स्पेलिंग)ही उपयोग में ली जा सकती।
वे इस वर्तनी सुधार समिति को; ऐसी बिना वर्तनी की, वर्णमाला का आविष्कार करने का, परामर्श देते हैं। आगे, वे कहते हैं, जब उपलब्ध वर्णमाला ही सडी  हुयी है। तो, वर्तनी सुधार से क्या लाभ? उससे  कोई स्थायी हल नहीं निकल सकता। वास्तव मे यह (रोमन) वर्णमाला ही रद्दी है। इस लिए वर्णमाला के सुधार (या आविष्कार) पर ही काम किया जाना चाहिए।
मार्क ट्वैन के  मतानुसार  “इस वर्णमाला को पूरी कि पूरी उठाकर कूडे में फेंक देनी चाहिए। “हमारी वर्णमाला ही यदि, सुनिश्चित और शुद्ध होती, तो वर्तनी की आवश्यकता ही ना पडती।यह वर्णमाला ही; अस्पताल से जगाकर लाये रोगियों जैसी है।
अंतमें कहते हैं, “इस सडी हुयी वर्णमाला के सुधार के लिए, मैं श्रीमान कार्नेगी को नियुक्त करता हूँ,
और मानता हूँ, कि, मैं ने, कार्नेगी के प्रति मेरा अपेक्षित कर्तव्य सच्चाइयाँ दर्शाकर निभाया है।

(सात)लेखक का भाष्य:
मार्क ट्वैन के सामने समस्या होगी ही ;एक तो, अपने मित्र, कार्नेगी के सत्कार समारोह में उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था।दूसरा  कार्नेगी भी प्रथम पंक्ति के धनी, और देश में, प्रभाव रखनेवाले अमरीकी थे।  और मार्क ट्वैन भी व्यंग्यात्मक स्पष्ट वक्ता के नाते प्रख्यात थे।फिर भी वे इस अवसर पर कार्नेगी को जिस प्रकार के शब्दों में, सांत्वना देते हैं, यह उनके वक्तव्य के अंतिम अंश से प्रकट होता है।
वे कुछ निम्न प्रकार भाषण का अंत करते हैं।
“इस भाषण से मैं ने उन्हें (कार्नेगी को) सांत्वना ही देने का प्रयास किया  है।वास्तव में उन्हें, मैं ने आगे की  कठिनाइयों से उबारा है। नहीं तो वे, झूठी प्रशंसा के  “बलि”चढ जाते। वर्तनी का सरलीकरण कुछ सीमा तक  ठीक है, पर उसे कहाँ तक ले जाओगे?”

(आठ) “मार्क ट्वैन” सॅम्युअल लँग्‍हॉर्न (१८३५-१९१०) (कुछ बिंदुओं को दोहराया जा रहा है; संक्षेप के लिए।)
नवम्बर ३०, १८३५ को जन्में, मार्क ट्वैन (वास्तविक नाम :सॅम्युअल लँग्‍हॉर्न )अपने छद्म नाम “मार्क ट्वैन” से ही जाने जाते थे। सच्चाई को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करना उनकी विशेषता थी।
स्वयं अंग्रेज़ी साहित्य के मान्यता प्राप्त लेखक, फिर आमंत्रित थे कार्नेगी सम्मान के प्रमुख  वक्ता के रूप में; अवसर था अंग्रेज़ी वर्तनी सुधार समिति की  कार्यवाही की प्रस्तुति और समीक्षा का; शासन ने भी जिसमें सहायक भूमिका निभायी थी; और साथ अन्य वक्ता भी थे। जिन्हों ने, वर्तनी सुधार का काम किया था वे सारे वर्तनी सुधारक भी थे।भारी राशि प्रदान करनेवाले, दाता थे दानवीर कार्नेगी जिनपर स्तुतिसुमनों का वर्षाव करने अन्य वक्ता सज्ज होकर आये थे।
ऐसे अवसर पर अंग्रेज़ी वर्णमाला को उपरोक्त सारे विशेषणो से वर्णन करनेवाले  अमरीका के उस समय के अग्रपंक्ति के साहित्यिक, मार्क ट्वैन ही थे।
निर्भयतासे, सच्चाई को व्यंग्यात्मक शैली में कहना उनकी विशेषता थीं। वे इसी वर्णमाला का प्रयोग कर २५-३० पुस्तकें लिख चुके थे।
अपना स्वतंत्र और भिन्न मत रखने में  संकोच ना करें।

17 COMMENTS

  1. Friends,
    Roman script is nothing but an extension of our Brahmi script.
    See how many Brahmi letters resemble to current Roman letters?
    Westerners were able to simplify this Brahmi script to their proper use but Sanskrit pundits ended up creating a complex script with matras, nuktas and lines above letters. These pundits also have divided India further by creating complex scripts for regional languages.
    https://www.omniglot.com/writing/brahmi.htm

    Transcription:
    business enough feather measure pleasure read rough trough tough through tongue young
    ˈbɪznəs ɪˈnʌf ˈfɛðər ˈmɛʒər ˈplɛʒər rid rʌf trɔf tʌf θru tʌŋ jʌŋ…….American IPA
    biznas,inaf,fedhar,mezar,plezar,rid,raf,trawf,taf,thru,tang,yang…….TS

    બિઝ્નસ્ ઇનફ્ ફેધર્ મેઝર્ પ્લેઝર્ રિડ્ રફ્ ટ્રૉફ્ ટફ્ થ્રુ ટન્ગ્ જન્ગ્.
    बिझ्नस् इनफ् फेधर् मेझर् प्लेझर् रिड् रफ् ट्रॉफ् टफ् थ्रु टन्ग् जन्ग्.

    https://tophonetics.com/
    https://iastphoneticenglishalphabet.wordpress.com/

    Vowel scheme:
    ə,ʌ,ɑ̈,ɪ,ɪ̈,ʊ,ʊ̈,uː,æʊ,ɑ̈ʊ,ɛ,ɑ̈ɪ,ɔ,o,ɝ,ɚ,ɒ/ɑ̈/ɔ ………..IPA
    à,á,ā,i,ī, u,ū,ă,ău,āu,e,āi,ŏ,o,àr,àr,ɒ/ā or ŏ…….diacritic
    a,aa,i,ii,u,uu,ae,aeu,aau,e,aai,aw,o,ar,ar,ɒ/aa or aw……spell able

    English alphabet is taught by letter names but not by sounds as we do in Hindi.
    English uses both sounds(letter’s name sound and phonetic sound) irregularly in spellings.

    in (i – vowel sound)
    item (i-letter sound)
    a(about),a(at),a(art)),a(ace),a(bake)
    e (each,keep,pet)
    o (other,on,open,out,book
    u (up,put,you)

    https://www.spellingsociety.org/spelling/irregularities

    Hindi can follow English’s footsteps and use more regional and English words to spread language globally in simplified grammar and script by avoiding lots of nasal sounds.
    https://en.wikipedia.org/wiki/Lists_of_English_words_by_country_or_language_of_origin

    Despite irregularities in spellings, English is flourishing.Why?
    How will you teach Hindi to foreigners?
    Why all Indian languages are taught to others in Roman script?
    Which script will unite Hindi and Urdu?
    Which script will revive India’s disappearing languages?

  2. इंगलिश भाषा को विद्वान कितना भी ही नकार दें, रोमन लिपि के दोष गिना दें, पर इंगलिश और उसकी लिपि रोमन की लोकप्रियता कम नहीं होगी। वर्तनी मे नये प्रयोग हो सकते हैं। हाँ मै हिन्दी को रोमन मे लिखने की पक्षधर नहीं हूँ। आश्चर्य चकित हूँ, कि रोमन और इंगलिश मे इतने दोष ढूँढने वाले डा. मधुसूदन की कौनसी मजबूरी ने उन्हे अपनी जड़ों से उखाड़ कर एक इंगलिश बोलने वाले देश मे बसने को मजबूर किया होगा!
    हिन्दी मेरी मातृभाषा है, देवनागरी उसकी लिपि मै दोनो का सम्मान करती हूँ। मुझे इंगलिश पढ़ना भी पसन्द है, बिना किसी दुराग्रह के, मै उतनी विद्वान नहीं हूँ, बस जो मन मे आया वो लिख देती कभी हिंदी मे कभी इंगलिश मे भी!

    • बीनू बहन जी-नमस्कार-आप का आंशिक उत्तर निम्न दिनांक और समय की, टिप्पणी में है ही। ==> “November 30, 2014 at 4:51 am”

      कृपया देख ले। आप ने मेरे अन्य आलेख भी पढे होंगे। विशेष कोई दृष्टिकोण मैं ने छोडा नहीं है।—–बिलकुल सारा आवरित है।

      बचा हुआ क्या है?
      पूछे, तो एक-दो, दिन बाद भेजता हूँ।

      पर टिप्पणी में अनुक्रम से पूछिए। समय बचेगा।

      टिप्पणी लिखते रहिए।
      जिससे विषय मिल जाता है।

      धन्यवाद।

    • बिनू बहन जी

      November 28, 2014 at 8:15 am की टिप्पणी भी पढ लीजिए।
      लग भग सभी उत्तर दे दिए है।
      बचे हुए कृपया अनुक्रम मे पूछिए। कृपा कीजिए। समय बचाइए।
      धन्यवाद।

    • “……..बस जो मन मे आया वो लिख देती कभी हिंदी मे कभी इंगलिश मे भी!…….”—-बीनू भटनागर

      नमस्कार बीनू जी। आपका उत्तर —

      “जापान : कर्मयोग का ज्वलंत आदर्श” में अंशतः तो दिया गया है। उसपर टिप्पणी की अपेक्षा करता हूँ।
      असंबद्ध वैयक्तिक बिंदूओं पर उत्तर नहीं देता।
      कृपया आप जो बिन्दू आलेख से संबधित और वैयक्तिक ना हो, उसपर चर्चा करें। अन्यथा ना लें। अनादर नहीं करता।
      फिरसे दाक्षिण्य व्यक्त करता हूँ।

  3. प्रिय पाठकों—नमस्कार
    आलेख रोमन लिपि की वकालत करनेवालों के लिए था।
    वास्तव में अंग्रेज़ी लिखनेवाले मार्क ट्वैन कहते हैं, सामान्य पत्र लेखन में भी उनके समय में लेखक को शब्द चुनने में वर्तनी की कठिनाई के कारण, १५०० शब्दों को (जिनकी स्पेलिंग कठिन होती थी।) छोडकर लेखन करना पडता था।
    इससे स्पष्ट होता है; कि, जब अंग्रेज़ी भाषावालों को भी कठिनाई होती थी; तो हमारे लिए, कैसे सरलता संभव होगी?

    विस्तृत उत्तर देने का, प्रयास, आलेख द्वारा करूंगा।
    हमारे लिए कम से कम ३३% आर्थिक लाभ। और प्रत्येक युवा छात्र के ३ से ४ वर्षकी बचत होगी।
    बचे हुए ३-४ वर्षमें छात्र फिर भी स्वतंत्र होगा, ईच्छित विषय पढने के लिए।

    सभी टिप्पणीकारों एवं पाठकों का ऋणी हूँ। प्रतिक्रिया देते रहें।

  4. व्याकरण व संरचना विशेषज्ञ रिचर्ड नोर्डक्विस्ट द्वारा अंग्रेजी भाषा शिक्षण हेतु शमूएल लैंगहोर्न क्लिमेंस (मार्क ट्वेन) के विचार आज भी उतने ही व्यवहारिक हैं जितने स्वयं उनके समय में थे। अंतर केवल इतना है कि इस बीच एक शतक से ऊपर समय बीत गया है और आज अमरीकी भाषा में बर्तनी और उच्चारण में यथार्थ परिवर्तन के साथ भाषा का एक बहु प्रयोजन उपकरण के रूप में प्रयोग चर्म सीमा तक उन्नत्ति प्राप्त कर चुका है। विषय पर आगे बढ़ते हुए प्रश्न उठता है कि भारतीय संदर्भ में हिंदी अथवा अन्य किसी प्रांतीय भाषा को किस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग में लाया जाए?

    • धन्यवाद। इन्सान जी–

      (१)हमारे लिए, जो उत्तर मैं ने विश्वमोहन जी को दिया है; वह रास्ता मेरे विचार में लाभकारी है।
      (२) जापान के रास्ते हम जाएँ। अंग्रेज़ी के अतिरिक्त और ४-५ भाषाओं से जापानी में अनुवाद करवा लेता है। कम से कम ३ गुना लाभ मानता हूँ।
      (३) जापानी परिश्रमी भी बहुत है। पर जापानी भाषा ही परिश्रम का अभ्यास करवा लेती है।
      पारिभाषिक शब्द हमारे पास ८०-८५ % (रघुवीर के बने हुए हैं)

      (४)आप हिन्दी अंग्रेज़ी टक्कर २-और ३ (?)देखने की कृपा करें।
      अभी तक ५० आलेख मात्र भाषा पर है।
      समय देकर टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
      अगले के बाद का आलेख इसी विषय पर डालूंगा।
      लिखते रहे, विषय का आशय मिल जाता है।

      कृपांकित
      मधुसूदन

  5. बेतुकेपन का मर्ज़ जिस भाषा के अंग-प्रत्यंग में व्यापा हो ,उसकी प्लास्टिक सर्जरी कितनी और कहाँ तक कोई करेगा .और जन्मजात विकृतियों -विसंगतियों से छुटकारा तो कोई डाक्टर भी नहीं दिला पाता.एक डिफ़ेक्टिव चीज़ के काहे के लिए ठोंक-पीट कर ठीक करना इतनी ऊर्जा किसी अच्छे काम में लगाई जाय तो मानवता का कल्याण हो !

    • धन्यवाद सु श्री डॉ. सक्सेना।
      सही कहा। रोमन के भक्तों के लिए यह आलेख था।
      अंग्रेज़ी की आज तक ३ आवृत्तियाँ हो चुकी है। पहली, आज कोई समझता नहीं। दूसरी भी थोडी समझता है। और तीसरी आजकल चल रही है।
      अंग्रेज़ भी ३०-४० % समय शब्द कोश देखने में लगाता है।
      हम इतना समझकर विचार करे, तो समझ में आएगा, कि इस बदलती लिपि/भाषा के पीछे भागना विवेक कभी नहीं था, न है।
      उनकी गलतियों से न्यूनतम हमें सीखना तो अवश्य चाहिए।
      कृपांकित -धन्यवाद।
      मधुसूदन

  6. भारत में बहुत से लोग भारतिया भाषाओं और नागरी लिपि की बजाये अंग्रेजी और रोमन लिपि पसंद करते हैं। ऐसे लोग यह भी वकालत करते हैं के भारत की सब भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपना ली जाये , ऐसे सब लोगो को डॉ मधुसूदन जी का लेख अंग्रेज़ी वर्णमाला की त्रुटियाँ–मार्क ट्वैन के विचार अवश्या पढ़ना चाहिए। भारत के लोग ऐसी हीन भावना से ग्रस्त हैं के उनके लिए विदेशो की हर बस्तु श्रेस्ठ हैं , इसका लाभ उठा कर विदेशी लोग कई उनुपयुक्त बस्तुए जैसे दवाइये उपकरण, तकनीक और अन्या बस्तुए जो विदेशो में बेकार समझी जाती हैं वह सब बेकार बस्तुए बिदेशी लोग भारत को पैसा लेकर बेच देते हैं। और भारतीय लोग पैसा देकर पश्चिम देशो का ऐसा बेकार और उनुप्युक्त सामान खरीदने में गर्ब का अनुभव करते हैं. ऐसा माना जाता हैं के १५ अगस्त १९४७ की मध्य रात्रि को भारत स्वंतन्त्र हो गया हैं किन्तु वास्तविक्ता यह हैं के भारतीय लोग अभी भी ब्रिटिश साम्राज्य के मानसिक दास हैं अंग्रेजी भाषा बोलने वाले और अंग्रेजी भाषा पसंद करने वाले लोग हर भारतीया वस्तुए से घृणा करते हैं जैसे भारतीय भाषे सभयता दार्शनिक साहित्य भारतीय महापुरष इत्यादि। ऐसे लोग कभी नहीं सीखते के भारतीय बिचारधारा और भारतीय जीवन दर्शन क्या हैं। भारतिया लोगो को पहले जीवन के बारे में और संस्कृति के बारे में सीखना चाहिए। भारत के पास विदेशो को देने के लिए बहुत कुछ हैं।

  7. अंग्रेजी भाषा की कठिनता तो मार्क ट्वेन ने जो व्यक्त की वह सही लगती है । शेक्सपीयर की लिखी अंग्रेजी , ब्रिटिश अंग्रेजी , अमेरिकन अंग्रेजी , शब्द को गढ़ने की प्रक्रिया , आदि आदि मे एक नियम वध्धता , समरसता नही है । एक तो भाषा का विकास होता है जो स्वाभाविक रूप से होता है लेकिन अंग्रेजी भाषा तो थोक के भाव मे दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर तोड़ मरोड़ कर अपना बनाकर प्रस्तुत करती है ।
    मार्क ट्वेन जैसे अंग्रेजी के विद्वानो को इसकी कमिया बहुत अच्छे से पता थी ।

  8. भारत मे धीरे धीरे संस्कृत का प्रभाव बढ़ता नज़र आ रहा है | केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय विद्यालयों मे जर्मन की जगह पर संस्कृत को प्रोत्साहित करने के निर्णय को छात्रों का भी समर्थन मिला है | DNA अखबार मे छपी एक खबर के अनुसार भारत मे छात्र जर्मन भाषा को छोड़ कर संस्कृत की ओर उन्मुख हो रहे हैं | इस निर्णय के लिए मानव संसाधन मंत्रालय बधाई का पात्र है | खबर का शीर्षक है “Rest easy, Smriti: Kids prefer Sanskrit” | लगता है जल्द ही हमारे देश की भाषाओं के अच्छे दिन आने वाले हैं | आदरणीय डॉक्टर मधुसूदन जी के लेखों का असर अब नज़र आने लगा है | धीरे धीरे ही सही पर लोगों मे अब अपने देश की भाषा के प्रति गौरव का भाव जागा है | डॉक्टर साहब को उनके प्रयासों के कोटी कोटी धन्यवाद |

  9. आ. विश्वमोहन जी—-सादर नमन।
    (१)यह सही होगा, अमरिका के लिए; और जिन देशों में बहुसंख्य अंग्रेज़ी बोली जाती हो,उनके लिए।
    (२)पर हमारे लिए अंग्रेज़ी का राष्ट्रीय लाभ नहीं पर हानि है।
    (३)हमारे लिए अपनी भाषाएं लाभकारी (हिन्दी विशेषतः)होंगी।
    ८०-८५ %, (प्रतिशत), पारिभाषिक शब्द डॉ. रघुवीर के बने हुए है।
    वे प्रायः सभी प्रादेशिक भाषाओं में प्रयोजे जा सकते हैं।
    जो अंग्रेज़ी की अपेक्षा समझने में बहुत सरल होंगे।
    (४)अनुदान दे कर ग्रीष्म की छुट्टियों में पुस्तकें (अनुवादित) या लिखित करवा लेना चाहिए।
    (५) पहले हिन्दी में प्रसारित करें।

    लाभ:
    ===>हमारा ३३% शिक्षा बजट बचेगा।
    ===> और अनगिनत युवा वर्ष जो बचेंगे।
    ===> युवाओं के उत्पादक वर्षों में वृद्धि होगी।
    ===> स्वभाषा में चिन्तक पैदा होंगे।
    इत्यादि बिंदुओं पर
    अगला आलेख सोच कर बनाऊंगा।

    कृपांकित—आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
    मधुसूदन

    • अंकल मधुसूदन जी आप का संपर्क नंबर मिल सकता है
      क्योंकि मैं भी अल्फाबेट का जिज्ञासुर्थी हु

  10. prevalence of English, despite its “poverty” proves that ultimately power wins in this civilised world!”

    • आ. विश्वमोहन जी—-सादर नमन।
      (१)यह सही होगा, अमरिका के लिए; और जिन देशों में बहुसंख्य अंग्रेज़ी बोली जाती हो,उनके लिए।
      (२)पर हमारे लिए अंग्रेज़ी का राष्ट्रीय लाभ नहीं पर हानि है।
      (३)हमारे लिए अपनी भाषाएं लाभकारी (हिन्दी विशेषतः)होंगी।
      ८०-८५ %, (प्रतिशत), पारिभाषिक शब्द डॉ. रघुवीर के बने हुए है।
      वे प्रायः सभी प्रादेशिक भाषाओं में प्रयोजे जा सकते हैं।
      जो अंग्रेज़ी की अपेक्षा समझने में बहुत सरल होंगे।
      (४)अनुदान दे कर ग्रीष्म की छुट्टियों में पुस्तकें (अनुवादित) या लिखित करवा लेना।
      (५) पहले हिन्दी में प्रसारित करें।

      =================================================================

      अमरिका को लिपि आविष्कार में, या सुधार में,३ अडचने थीं।

      (१)प्रचण्ड पुनर्मुद्रण (२)भिन्न भिन्न देशों के भिन्न भिन्न उचारण में असमानता (३)समग्रतः (Totally) नवीन (विशुद्ध) लिपि को प्रोत्साहित करने की कठिनाई।(४)पुरानी लिपि चल ही रही है।

      हमारे लिए निकष हो भारतका आर्थिक हित यही होगा। लोग स्वीकार करेंगे।
      (१) हमारे प्रादेशिक भाषाओं के माध्यम से M Sc जितनी पढायी १२ वर्षों के कुल अध्ययन से हो सकेगी।{मुख्तार सिंह चौधरी–का प्रारूप-ढाँचा}
      जिससे अनुमानतः ३३% शिक्षा की मुद्रा बचती है।
      (२) हमें जापान की भांति चुने हुए, और आवश्यक शोधपत्रों एवं अन्य का( छः भाषा के शोधों का) अनुवाद ३ सप्ताह में बनाकर जापानी में मूल कीमत से सस्ता बिकता है।
      (३)आधुनिक आज की अंग्रेज़ी का ३ रा स्वरूप (version)चल रहा है|
      पहला आज का प्रोफेसर भी समझता नहीं है। दूसरा कुछ सरल, पर बिना शब्द कोष कठिन है।
      (४)स्पेलिंग में प्रत्येक विद्वान का भी २५% समय नष्ट होता है। ……
      …….लम्बी बात है।
      ============================
      हमारे लिए कुल ७-८ वर्ष में शालान्त(S S C) जितना ज्ञानार्जन संभव।
      उसके बाद ५ वर्ष में M Sc जितना ज्ञान।(जन भाषा में)
      =================
      हिन्दी मे ही ऊच्च और अत्युच्च शिक्षा पहले विकसित की जाए।
      ======================
      रूसी, अंग्रेज़ी, फ्रांसिसी, जर्मन, जापानी, चीनी, हिब्रु { ये सूची बदलेगी} –इत्यादि भाषाओं से मात्र अनुवाद करने के लिए होनहार युवाओं को प्रशिक्षित (प्रोत्साहित) किया जाए।

      जापान यदि हमसे ४ गुना कठिन चित्रमय भाषामें, विश्व में, प्रथम पंक्तिकी प्रगति कर सकता है। तो हम इसी राह पर चलकर आगे बढ सकते हैं।

      अगला आलेख इसी पर सोचता हूँ।
      टिप्पणियाँ देते रहें। यही स्थूल ढाँचे पर आलेख है।
      सोच कर -और संशोधन कर लिखता हूँ।
      कुछ सुझाव दीजिए।

      कृपांकित
      मधुसूदन

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