एक्जिट पोल: संसद की ओर मोदी की दौड़

-प्रमोद भार्गव-
exit poll

देश का अब तक का सबसे बड़ा निर्वाचन पर्व आखिरकार बिहार और बंगाल में मामूली हिंसा के साथ नए कीर्तिमान स्थापित कर संपन्न हो गया। 36 दिन चले इस चुनावी यज्ञ में मतदाताओं ने नौ चरणों में जोश और होश के साथ आहुतियां दीं। अब 16 मई को वास्तविक नतीजे आएंगे। लेकिन मतदान के बाद (एग्जिट पोल) हुए सर्वेक्षणों के खुलासे ने साफ कर दिया कि राष्ट्रीय स्वयं संघ की रणनीति सफल होती दिखाई दे रही है। संघ द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के लिए नरेंद्र मोदी के रूप में छोड़ा गया, घोड़ा संसद पर सवार होने को आतुर है। क्योंकि टीवी समाचार चैनलों के जितने भी सर्वे प्रसारित हुए हैं, उन सभी में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ते दिखाया गया है। तय है, सोलहवीं लोकसभा के लिए जो मत – प्रतिशत बढ़ा है, वह सत्ता परिवर्तन के लिए है। इस बार कुल 66.38 फीसदी वोट पड़े हैं, जो एक नया कीर्तिमान है। इससे पहले 1984 में इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद रिकॉर्ड तोड़ मतदान देखने में आया था, जो 64.01 प्रतिशत था। मसलन इस बार 2.39 फीसदी ज्यादा वोट डालकर मतदाताओं ने 30 साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया।

चुनाव में भारी मतदान और उसके बाद आए आभासी सर्वेक्षण ने भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों को छोड़ सबकी नींद हराम कर दी है। ये सर्वे यदि 16 मई को आने वाले वास्तविक नतीजों पर खरे उतरते हैं तो राजग गठबंधन को 272 से 289 सीटों पर जीत हासिल हो सकती है। ऐसा होता है तो लोकसभा के नए नेतृत्व कर्ताओं को नए सहयोगियों की जरुरत नहीं रह जाएगी। राजग को मिलने जा रहे इस संभावित स्पष्ट बहुत के चलते राजनीति की उन तीन तेजतर्रार महिलाओं मायावती, ममता और जयललिता की चिरौरी की जरुरत भी नहीं पड़ेगी, जिनकी फितरत में रुठकर कोप-भवन में बैठ जाना शामिल है। हालांकि इन देवियों में से दो को ही (ममता व जयललिता) को 20 से उपर सीटें मिलने का अनुमान है। मायावती को 13 सीटें पाकर ही संतोष करना होगा। जाहिर है, जिस तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग के बूते वे बहुजन समाज पार्टी को अखिल भारतीय धरातल देना चाहती थीं, वह अपने ही गृह प्रदेश में सिकुड़ रही है। ये अनुमान जताते हैं, कि दलित मतदाताओं का जातिगत मतदान से मोहभंग हो रहा है और वे क्षेत्रीय संकीर्णता से मुक्त हो रहे हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जरूर 5 सीटों के साथ 4 प्रतिशत वोट देशव्यापी स्तर पर प्राप्त करके अखिल भारतीय होने का दावा कर सकती है।

छद्म धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) को सकते में डालने वाला झटका लगने जा रहा है। इंडिया टीवी – सी वोटर के सर्वे के मुताबिक जद (यू) को महज 2 सीटों पर संतोष करना होगा। जबकि चारा घोटाला के सजायापत्ता लालू के राष्ट्रीय जनता दल व कांग्रेस गठबंधन को 10 सीटें मिलने का अनुमान है। साफ है, मतदाता की मानसिकता को चारा-चोर से कहीं ज्यादा नीतीश के विश्वासघात ने आघात पहुंचाया है। मतदाता ने नीतीश के धर्मनिरपेक्ष दावे को इसलिये खारिज कर दिया, क्योंकि पिछले 17 साल से वे उसी गठबंधन का हिस्सा थे, जिससे अलग होने के बाद वे उसे कट्टर सांप्रदायिक दल ठहरा रहे हैं। यही वह छद्म धर्मनिरपेक्षता है, जो चालाक नेता मुस्लिम मतदाताओं के तुष्टीकरण के लिए करते हैं। यदि यह पूर्वानुमान सटीक बैठता है तो तय मानिए भाविष्य में छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को जनता बख्शेगी नहीं। हालांकि कमोबेश इसी चाल व चरित्र के रामविलास पासवान अपने बेटे की सलह मानकर फायदे में हैं। क्योंकि पासवान समय की चाल परखकर राजग में लौट आए। उनकी लोक जनशक्ति पार्टी शून्य से उभरकर 5 सीटें हासिल कर सकती है। भाजपा 28 सीटों के आंकड़े को छूकर नीतीश को जबरदस्त पटकनी देने जा रही है। ये परिणाम अगले साल बिहार विधानसभा के होने वाले चुनावों में नीतीश को झटका देंगे। फिलहाल मोदी का विकास और सुशासन का नारा बिहार के सुधार कार्यक्रमों पर पानी फरता दिखाई दे रहा है।

एक बार फिर यह मिथक बनता दिखाई दे रहा है कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन से ही प्रधानमंत्री का पद सृजित होता है। इसी मिथक को पुनसर््थापित करने के लिए मोदी बनारस से चुनाव लड़े हैं। मोदी की यहां अचानक आमद ने पूरे पूर्वांचल को भगवा रंग में रंग दिया है। नतीजतन भाजपा मुलायम और मायावती के मंसूबों को ध्वस्त करते हुए 55 सीटों पर विजयश्री प्राप्त कर सकती है। अनुमान सटीक बैठते हैं तो नेहरु, शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी इस कड़ी में नौवें प्रधानमंत्री होंगे। केवल मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करके मुलायम सिंह ने खुद अपनी ही समाजवादी पार्टी के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। उन्हें उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पराजय का सामना तो करना पड़ेगा ही, आगामी विधानसभा चुनाव में उनके बेटे के हाथ से सत्ता की बागडोर भी फिसल जाएगी। प्रदेश की अखिलेश यादव एक ऐसी सरकार है, जो कानून व्यवस्था से लेकर विकास के हर मोर्चे पर नाकाम रही है। प्रदेश में यही हश्र अजीत सिंह के लोकदल का होने जा रहा है।

एग्जिट पोल से वास्तविकता पर खरे उतरने की उम्मीद इसलिए ज्यादा रहती है, क्योंकि ये मतदान के पश्चात मतदाता के निर्णय को जानने की कोषिष करते हैं और निर्वाचन आयोग की बाध्यता के चलते इनका खुलासा भी देश में पूर्ण रूप से मतदान हो चुकने के बाद किया जाता है। इसलिए कोई राजनीतिक दल शुल्क चुकाकर एग्जिट पोल नहीं कराता। इसलिए ये रुझान परिणाम के निकट पहुंच सकते हैं। हालांकि यह कतई जरूरी नहीं कि अनुमान सटीक बैठे ही। 2004 के आम चुनाव में सभी अनुमान ध्वस्त हो गए थे। राजग गठबंधन को 284 सीटों पर जीतने का दावा किया गया था, लेकिन मिलीं महज 189 सीटें। वहीं सप्रंग गठबंधन को अधिकतम 164 सीटें मिलने का अंदाजा था, लेकिन मिलीं 222 सीटें। नतीजतन संप्रग वैसाखियों के बूते सत्ता के घोड़े पर सवार हो गया था। अनुमानों का कमोबेश ऐसा ही हश्र 2009 के चुनाव में हुआ। हकीकत से दूर रहे इन अनुमानों में बताया गया था कि राजग को 175 सीटें मिलेंगी, किंतु मिलीं 159 सीटें। वहीं सप्रंग को 191 से 216 सीटें मिलने का अनुमान जताया था, लेकिन मिलीं 262 सीटें। नतीजतन एक बार फिर गैर राजनीतिक व्यक्ति मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए। उनका पिछले 5 साल का कार्यकाल घपलों, घोटालों और अनिश्चय के बद्तर हालातों का शिकार रहा। श्री सिंह बार-बार चीनी सैनिकों की भारतीय सीमा में घुसपैठ पर ठोस निर्णय नहीं ले पाए और न ही पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों के सर कलम कर लिए जाने के बावजूद उनकी रगों में खून दौड़ता दिखाई दिया। ऐसे बोदे और कठपुतली षासक की कार्यप्रणाली ने जनता में असुरक्षा की भावना पैदा करने का काम किया। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि केंद्रीय सत्ता के दो केंद्र थे, जिनका एक सिरा सोनिया गांधी से जुड़ा था। इसलिए यदि कांग्रेस का वाकई सबसे खराब प्रदर्शन रहता है तो इसका ठींकरा अकेले मनमोहन सिंह के सिर फोड़ना अनुचित होगा। सोनिया भी इस हार में मनमोहन के बराबर जिम्मेदार रहेंगी। यदि अनुमान सही निकलते हैं तो यह भाजपा का सबसे शानदार प्रदर्शन होगा। लेकिन इसका श्रेय अकेले मोदी को नहीं दिया जा सकता है। संघ की रणनीति ने इस शानदार जीत के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। लिहाजा सत्ता और शक्ति के दो केंद्र मोदी के सत्तारुढ़ होने के बाद भी बने रहेंगे। एक दिल्ली और दूसरा नागपुर में। बहरहाल, इतना तो तय है कि मोदी भविष्य के प्रधानमंत्री हैं।

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