लोकतंत्र का लचीला और खुला स्वरूप रहे बरकरार


प्रधानमंत्री जी ने गत दिनों दो निजी टी वी चैनलों को दिए अपने साक्षात्कारों में अपने मन की बात हमेशा की तरह हमारे साथ की। एक मुद्दा जिसे माननीय राष्ट्रपति महोदय ने बजट सत्र के प्रारम्भ में दिए गए अभिभाषण में सम्मिलित कर आधिकारिकता और महत्व दोनों प्रदान कर दिए- वह था- लोक सभा और विधान सभा के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव। प्रधानमंत्री जी ने लोकसभा एवं विधान सभा चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में अनेक तर्क दिए। उन्होंने कहा कि चुनावों में आरोप प्रत्यारोप की जिस घटिया राजनीति का हिस्सा उनके समेत शीर्षस्थ राजनेताओं को न चाहते हुए भी बनना पड़ता है वह पारस्परिक संबंधों में खटास उत्पन्न कर देती है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आएंगे तो आरोप प्रत्यारोप तो लगेंगे ही यह स्वाभाविक है और विवाद भाषा के गिरते हुए स्तर पर किया जा सकता है।कई बार राज्य और केंद्र की सरकारों के बीच उत्पन्न तनाव इनके बीच आवश्यक सामंजस्य के निर्माण में बाधक होता है। उन्होंने चुनावों की तुलना होली के त्यौहार से की जिसमें कालिख और कीचड़ एक निश्चित दिन पर लगाए-उछाले जाते हैं और इसके बाद सब स्वच्छ होकर गले मिलने लगते हैं। उन्होंने चुनावों में बढ़ते खर्च की ओर ध्यानाकर्षण किया और कहा कि एक साथ चुनाव होने पर यह खर्च कम होगा। उन्होंने कहा कि सरकार के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी लगातार चुनावों में व्यस्त रहते हैं और इससे प्रशासनिक कार्य में बाधा उत्पन्न होती है। चुनावों के कारण राजनीतिक दल देश हित के स्थान पर दल हित को प्राथमिकता देने लगते हैं और इससे विकास और जनकल्याण की योजनाएं बाधित होती हैं। उन्होंने कहा कि 1967 से पूर्व तो चुनाव एक साथ होते ही थे और जनता अपने विवेकानुसार अलग अलग सरकारों को चुनती थी। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि जनता की विवेक शक्ति और उसकी बुद्धिमत्ता को कम कर आंकना ठीक नहीं है। प्रधानमंत्री ने केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के चुनावों हेतु एक मतदाता सूची तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया और वर्तमान में इस प्रकार कार्य हेतु शिक्षकों की सेवाएं लेने के कारण शिक्षण कार्य बाधित होने की समस्या का उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री जी का साक्षात्कार हमारी चुनाव प्रणाली में आए दोषों की खुली स्वीकृति के रूप में देखा जा सकता है। चुनावों में लगने वाले आरोप प्रत्यारोप अब सैद्धांतिक और नीतिगत तथा सरकार के कामकाज से कम सम्बंधित होते हैं। अधिकांश आरोप चाहे वे भ्रष्टाचार से सम्बंधित हों या यौन दुराचार पर केंद्रित हों, व्यक्तिगत होते हैं और इनका उद्देश्य शीर्षस्थ राजनेताओं की छवि को धूमिल करना होता है। इनमें से अधिकांश आधारहीन होते हैं और सोशल मीडिया और आई टी सेल के विज्ञापन विशेषज्ञों की कॉर्पोरेट सोच की उपज होते हैं जिसमें किसी भी कीमत पर सफलता प्राप्त करना ही सर्वोपरि माना जाता है। चुनावों के बाद यह आरोप, स्कैंडल और मुद्दे भुला दिए जाते हैं। चुनाव प्रचार की इस अनैतिक रणनीति का परिणाम यह हो रहा है कि भ्रष्टाचार और यौन शोषण जैसे गंभीर मुद्दे अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं। प्रभु स्मरण के गीत-नृत्यों  से सजा होली का त्यौहार पहले सद्भाव और पारस्परिक सौहार्द्र का प्रतीक माना जाता था, कालांतर में इसमें अश्लीलता और हिंसा के तत्वों का प्रवेश हुआ और यह प्रतिशोध लेने के अवसर के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा। यही स्थिति चुनावों की है। हम सबने चुनाव प्रचार के गिरते स्तर को देखा है। हममें से वरिष्ठों ने पंडित नेहरू, श्रीमती गांधी, राजीव गांधी, श्री नरसिंह राव और श्री अटल बिहारी वाजपेयी की  जन सभाओं में हिस्सा लिया है।तब यह नेता अपने कद के अनुसार देश की समस्याओं और अपनी नीतियों तथा उपलब्धियों पर केंद्रित शालीन और विद्वत्ता पूर्ण भाषण दिया करते थे। इनके भाषणों में नकारात्मकता का स्थान बहुत कम होता था। भाषा का संस्कार और अभिव्यक्ति की मर्यादा इनकी विशेषता होती थी। आज जब हम दो प्रतिद्वंद्वी दलों के शीर्षस्थ नेताओं मोदी जी और राहुल जी के चुनावी भाषणों को सुनते हैं तो उस युग को याद कर दुःखी और निराश होने का विकल्प ही हमें उपलब्ध होता है। चुनाव चाहे एक बार हों या बार बार, मुकाबला तो आधुनिक युग के इन्हीं बौने महापुरुषों के बीच ही होगा। मूल प्रश्न नैतिक है। चुनाव प्रचार को संस्कारित और मर्यादित करने का प्रयास होना चाहिए और चुनाव सुधारों में इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक साथ चुनाव होने पर अनैतिक और अमर्यादित व्यवहार का नग्न प्रदर्शन सीमित समय के लिए होगा किन्तु इसकी सड़ांध तो पूरे लोकतंत्र को दूषित करती रहेगी।
प्रधानमंत्री जी ने चुनाव खर्च का भी प्रश्न भी उठाया। हमारे राजनीतिक दलों ने 2014 के लोकसभा चुनावों में 5 बिलियन डॉलर के बराबर राशि खर्च की। हम अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में खर्च किए गए 7 बिलियन डॉलर के बाद इस संबंध में दूसरे स्थान पर रहे। 2009 के लोक सभा चुनावों की तुलना में यह खर्च तीन गुना था। इस खर्च के बढ़ने का कारण क्या था ? मोदी जी के नेतृत्व में 15 करोड़ युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा ने पहले डिजिटल मार्केटिंग तकनीकों का प्रयोग चुनाव में प्रारम्भ किया। बाद में कांग्रेस ने इसका अनुकरण किया। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि 2009 में विज्ञापनों पर राजनीतिक दलों ने 83 मिलियन डॉलर के बराबर धन खर्च किया था जो 2014 में बढ़कर 300 मिलियन डॉलर हो गया। मोदी जी की भव्य रैलियां जिनमें मंच व्यवस्था, जनता की बैठक व्यवस्था, आयोजन स्थल की साज सज्जा और आवागमन की सुविधाएं उच्चतम स्तर की होती हैं, मतदाताओं को मोहित करती हैं। यह स्वाभाविक रूप से बहुत खर्चीली होती हैं। मोदी जी और श्री राहुल गांधी जैसे स्टार प्रचारकों के लिए हेलीकॉप्टर और वायु यान किराये पर लिए जाते हैं जो चुनाव प्रचार के व्यय में असाधारण वृद्धि करते हैं। वैसे कुछ विशेषज्ञ यह भी महसूस करते हैं कि 80 करोड़ मतदाताओं की संख्या को देखते हुए यह खर्च कुछ खास नहीं है। आखिर कहा भी तो गया है- लोकतंत्र सस्ते में नहीं मिलता। प्रधानमंत्री जी जिस चुनाव खर्च की चर्चा कर रहे थे वह घोषित, सार्वजनिक और दिखाई देने वाला है। किंतु उस चुनाव खर्च का जिक्र कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर सकता जो काले धन के रूप में होता है। कॉरपोरेट्स द्वारा अपने हितों की सिद्धि के लिए राजनीतिक दलों पर व्यापक निवेश चुनावों के दौरान किया जाता है। इससे राजनीतिक दल लाभान्वित होते हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने समर्थक कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाकर उऋण भी हो जाते हैं। नुकसान केवल देश और जनता को उठाना पड़ता है। जब तक चुनाव प्रचार को आडंबर रहित न किया जाएगा, ग्लैमर रहित न बनाया जाएगा, जब तक नेताओं की ब्रांडिंग-पैकेजिंग-मार्केटिंग में किया जाने वाला धुँआधार खर्च बन्द न होगा, जब तक कॉर्पोरेट-राजनीतिज्ञ गठजोड़ को खत्म न किया जाएगा, चुनाव खर्च कम न होगा। चुनाव आयोग भी जब तक चुनाव खर्च की सीमाओं को व्यवहारिक नहीं बनाएगा तथा इसका उल्लंघन करने वाले प्रत्याशियों और दलों पर सख्त कार्रवाई नहीं करेगा तब तक चुनाव खर्च पारदर्शी और नियंत्रित न होगा। सरकार को राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के संबंध में दिखावटी और प्रतीकात्मक प्रावधानों एवं योजनाओं से अलग हटकर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।
समस्त चुनावों हेतु एक मतदाता सूची का विचार महत्वपूर्ण है किंतु मतदाता सूची को अद्यतन करने के लिए किए जाने वाले जमीनी सर्वेक्षणों के लिए तो जन शक्ति की आवश्यकता बनी रहेगी और शिक्षक इस कार्य से तभी मुक्त हो पाएंगे जब उनका विकल्प तैयार हो जाए। यदि यह विकल्प भी शासकीय कर्मचारी होगा तो सम्बंधित विभाग का कार्य तो प्रभावित होगा ही।
प्रधानमंत्री जी ने यह तर्क भी दिया कि बार बार चुनाव होने पर लोकलुभावन फैसलों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और कठोर प्रशासनिक निर्णय नहीं लिए जाते। किन्तु स्वयं उनका व्यवहार ही इस तर्क को खंडित कर देता है। यदि उन्होंने उत्तरप्रदेश समेत 5 राज्यों के चुनाव पर ध्यान दिया होता तो वे नोटबन्दी जैसा कठिन, कठोर और संभवतः अलोकप्रिय निर्णय न ले पाते। यदि व्यापारी बहुल गुजरात के प्रतिष्ठापूर्ण चुनावों का उन्हें ख्याल होता तो वे जीएसटी जैसे कर सुधार के असुविधाजनक दौर को आगे न बढ़ाते। न केवल मोदी जी बल्कि उनके पूर्ववर्ती भी साहसिक निर्णय लेते रहे हैं और इनके सकारात्मक या नकारात्मक परिणाम भी उन्हें मिलते रहे हैं।
प्रधानमंत्री जी ने भारतीय जनता की उस योग्यता को रेखांकित किया जो उसे केंद्र और राज्य के चुनावों में पृथक पृथक मतदाता व्यवहार दिखाकर अलग दलों को चुनने में सहायता देती है। किन्तु नायक पूजा में विश्वास रखने वाला भारतीय मतदाता किसी नेहरू या किसी इंदिरा या किसी मोदी से अप्रभावित रहे यह कल्पना करना जरा कठिन है। जब मोदी जी राज्यों के चुनाव में भ्रष्ट, नाकाम और एन्टी इनकंबेंसी की मार झेल रही अपने दल की सरकारों को अपने ताबड़तोड़ दौरों और चिर परिचित अदाओं से चुनाव जिता सकते हैं तो यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि एक साथ चुनाव होने पर उनका प्रभाव कितना अधिक हो जाएगा जब वे खुद के प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के नाम पर और कोऑपरेटिव फेडरलिज्म को बढ़ावा देने की दुहाई देते हुए वोट मांगेंगे। देश के उन राज्यों( विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों) में जहां सुदृढ़ क्षेत्रीय दलों की सुदीर्घ परंपरा रही है और जहां नायक पूजक मतदाता के लिए क्षेत्रीय नायक उपस्थित हैं -शायद राष्ट्रीय नेताओं का प्रभाव काम न करता हो- किन्तु हिंदी पट्टी के राज्यों में तो मतदाता अपने राष्ट्र नायकों का अनुसरण करता रहा है।
1967 से अब तक परिस्थितियां बहुत बदल गई हैं। अब मतदाताओं की संख्या कहीं अधिक है। नक्सलवाद और उग्रवाद के असर तथा बढ़ते जातीय-धार्मिक विद्वेषों के कारण संवेदनशील मतदान केंद्रों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। किसी राज्य में भी चुनाव चरण बद्ध रूप से कराए जाते हैं ताकि चुनाव दल, चुनाव सामग्री और मतदाताओं की रक्षा की जा सके तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव हो सकें। ऐसी दशा में एक साथ चुनाव कराना कठिन और चुनौतीपूर्ण होगा और इसके लिए चुनाव आयोग तथा केंद्र और राज्य की सरकारों एवं सुरक्षा बलों के मध्य गहरे तालमेल की आवश्यकता होगी। धारा 356 का सवाल और राज्य सरकारों के कार्यकाल को घटाने बढ़ाने जैसे संवैधानिक प्रश्न तो हैं ही।
लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की शक्ति उसके लचीलेपन में निहित है। लोकतंत्र की सफलता का रहस्य शासन व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी और उसके हस्तक्षेप करने की क्षमता में निहित है। भारत जैसे विशाल देश में जब भी कोई सरकार आत्म मुग्ध, अधिनायकवादी और निरंकुश होने का सपना भी देखती है तो समय समय पर होने वाले चुनाव उसे नींद से जगा कर यथार्थ की धरती पर ला पटकते हैं। अलग अलग समय पर होने वाले ये चुनाव अव्यवस्थित भले ही प्रतीत होते हों किन्तु लोकतंत्र को नियंत्रित और व्यवस्थित करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत का प्रजातंत्र किसी कंपनी की बैलेंस शीट के आधार पर नहीं चलाया जा सकता जिसमें आय व्यय और मानव संसाधन के समुचित उपयोग के आधार पर फैसले लिए जाएं। नियमों से बंधे हुए अनुशासित लोकतंत्र में यदि जन हस्तक्षेप के लिए स्थान घट रहा हो या जनता को उन्मुक्त भाव से अपना प्रतिनिधि चुनने में जरा सी भी बाधा उत्पन्न हो रही हो तो थोड़ा कम कार्य कुशल लोकतंत्र ही वरेण्य है।
डॉ राजू पाण्डेय

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