लेखक परिचय

अतुल तारे

अतुल तारे

सहज-सरल स्वभाव व्यक्तित्व रखने वाले अतुल तारे 24 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। आपके राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और समसामायिक विषयों पर अभी भी 1000 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से अनुप्रमाणित श्री तारे की पत्रकारिता का प्रारंभ दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से सन् 1988 में हुई। वर्तमान मे आप स्वदेश ग्वालियर समूह के समूह संपादक हैं। आपके द्वारा लिखित पुस्तक "विमर्श" प्रकाशित हो चुकी है। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी व मराठी भाषा पर समान अधिकार, जर्नालिस्ट यूनियन ऑफ मध्यप्रदेश के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराजा मानसिंह तोमर संगीत महाविद्यालय के पूर्व कार्यकारी परिषद् सदस्य रहे श्री तारे को गत वर्ष मध्यप्रदेश शासन ने प्रदेशस्तरीय पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया है। इसी तरह श्री तारे के पत्रकारिता क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उत्तरप्रदेश के राज्यपाल ने भी सम्मानित किया है।

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8 दिसम्बर 2016 चुपचाप बीत गई। मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण तारीख का इतने हौले से गुजर जाना पीड़ादायक है। जोर दें अपनी स्मृति को। याद आएगा 8 दिसम्बर 2003।  कांगे्रस के 10 साल के कुशासन से आज ही के दिन मध्यप्रदेश को मुक्ति मिली थी। लाखों लाखों कार्यकर्ताओं के समर्पण से, परिश्रम की पराकाष्ठा से सुश्री उमा भारती ने मध्यप्रदेश की कमान संभाली थी। भारतीय जनता पार्टी के लिए मध्यप्रदेश के लिए 8 दिसम्बर 2003 एक नए भविष्य के सृजन की घड़ी थी। पर आज यह तारीख विस्मृत है। भारतीय जनता पार्टी ने हाल ही में 29 नवम्बर 2016 का उत्सव मनाया है। बेशक मध्यप्रदेश के विकास में इन ग्यारह वर्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। बेशक प्रदेश को विकास के पथ पर अग्रसर करने में इन ग्यारह वर्षों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह एवं उनकी टीम का योगदान अभिनंदनीय है। लेकिन क्या वर्ष 2003 से वर्ष 2005 तक के दो वर्षों का स्मरण प्रासांगिक नही है? भारतीय जनता पार्टी व्यक्ति आधारित राजनीतिक दल नहीं है। भारतीय जनता पार्टी तत्व आधारित, कार्यकर्ता आधारित राजनीतिक दल हैं। यही कारण है कि एक पांव पांव वाला भैया, आज प्रदेश का यशस्वी मुख्यमंत्री हैं। यही कारण है कि बडऩगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाला किशोर आज देश का प्रधानमंत्री है। किसने गढ़ा इन्हें? कौन सी शक्ति है इनके पीछे? किसकी तपस्या का फल हैं देश के ये अद्वितीय नायक? ये सूची और भी लंबी हो सकती है। तात्पर्य यह भाजपा ही है, जो कार्यकर्ता को अपने विचार यात्रा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान देती है।

अत: आज जब 8 दिसम्बर 2016 एक अतीत का पन्ना बन चुकी है, भाजपा के श्रेष्ठि नेतृत्व को यह विचार करना चाहिए कि जाने अनजाने में कहीं कुछ भूल तो नहीं हो रही? नि:संदेह व्यक्ति का अपना एक महत्व है पर भाजपा व्यक्ति पूजक नहीं है। भारतीय राजनीति में आज वाम पंथी दलों को छोड़ दें, तो आज जितने भी राजनीतिक दल हैं वे आज व्यक्ति  केन्द्रित है, परिवार केन्द्रित हैं। वाम दल विचार की बात करते हैं पर उनके विचार ही अप्रासंगिक हो चुके हैं। तात्पर्य भाजपा ही आज एक राजनीतिक दल है जिस पर देश की उम्मीदें टिकीं हैं और यह उम्मीदें सिर्फ इसलिए नहीं कि भाजपा के पास यशस्वी राजनेताओं की एक कतार है, बल्कि इसलिए कि भाजपा के पास एक देव दुर्लभ कार्यकर्ता है भाजपा के पास एक पवित्र दर्शन है, भाजपा के पास तपोनिष्ठ तपस्वी साधकों का बल है जो युगानुकूल, समयानुकूल ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ कार्यकर्ताओं का निर्माण करता है।

इसलिए भाजपा नेतृत्व को चाहिए कि वह अपनी योजनाओं में अपने राजनीतिक उत्सवों में समग्रता का परिचय दे सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति का प्रगटीकरण करें। यह शुभ संकेत है कि भाजपा  नेतृत्व…

“प्रभुता पाय काहे मद नाहीं”

के रोग से मुक्त है, पर इसके पथ्य में कोई हानि भी नहीं है। भाजपा नेतृत्व को चाहिए कि अब जबकि 2018 भी ज्यादा दूर नहीं है वह विचार करे कि उमाश्री भारती की पंच-ज योजना का क्या हुआ? बाबूलाल गौर के कार्यकाल की गोकुल ग्राम योजना की आज क्या स्थिति है? योजनाओं का जिक्र सिर्फ प्रतीक स्वरूप है। संभव है इन योजनाओं को आज प्रदेश सरकार ने नए नामों से क्रियान्वित किया ही होगा। पर भाजपा नेतृत्व अगर इन योजनाओं को अपने स्मृति पटल पर लाएगा तो उसकी स्मृति में सहज ही वे कार्यकर्ता भी आएंगे जो आज सत्ता की चकाचौंध से काफी दूर हैं।

बेशक इन कार्यकर्ताओं की मंशा सत्ता सुख नहीं है पर वे इतना तो चाहते ही हैं कि आज उन्हें भी सुखद वर्तमान की अनुभूति हो। कारण यह इरादतन नहीं हो रहा पर यह एक कड़वा सच है कि आज ऐसे कार्यकर्ता भी पुरानी योजनाओं की तरह ही कहीं विस्मृत हैं, आंखों से ओझल है। प्रदेश का यह सौभाग्य है कि उसे श्री शिवराज सिंह जैसा संवेदनशील नेतृत्व मिला है। वे सहज भी हैं, सरल भी। मुख्यमंत्री के पद पर 11 साल लगातार रहने के बावजूद अहम से वे कोसों दूर हैं, इसीलिए वे बुजुर्गों के बेटे हैं, तो युवाओं के लिए मित्रवत। यही नहीं वे आज अपने भांजे और भांजियों के लिए चहेते मामा भी। आवश्यकता अब बस इस बात की है कि….

“वे सत्ता की घेराबंदी से स्वयं को थोड़ा अलग कर कार्यकर्ताओं की आंखों से प्रदेश को देखें और उन्हीं के कानों से सुनें भी।”

संभव है उनके ध्यान में कई ऐसे तथ्य स्वत: ही आएंगे जो स्वर्णिम प्रदेश के निर्माण के उनके स्वप्न को साकार करने में उनकी मदद करें। उम्मीद की जानी चाहिए भाजपा का प्रदेश संगठन इस प्रयास में उनकी सहायता करेगा, शुभकामनाओं सहित।

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