मित्र के नाम पत्र

गंगानन्द झा
तुम्हारे साथ बातें करना उकसावे में पड़ने जैसा होता है। उसमें एक प्रकार का trap रहता है कि मैं ऐसी चर्चा करूँ जिसमें मेरी पहुँच नहीं हो। जीवन-मृत्यु का क्षेत्र तिलस्म जैसा ही है न। हमने पहले भी कई बार इस प्रसंग की बातें की हैं। तुमको याद होगा मृत्यु के जन्म के सम्बन्ध में हमारे ग्रन्थों के आख्यान की बात। बड़ा दिलचस्प लगता है।
मैंने तुमसे एक बार पूछा था कि मनुष्य को ‘अमृतस्य पुत्रः’ क्यों कहा गया है, तुम टाल गए थे। अब मेरी जिज्ञासा पुनः दुहरा रहा हूँ।
हमलोगों के बीच तुम ही ऐसे सवालों से जूझने में सर्वाधिक सक्षम और अधिकारी पात्र माने जाते रहे हो, तुम्हें स्वीकार करना चाहिए।
इस सवाल के साथ, , जब प्रत्यक्ष मुलाक़ात होती है तो बात कुछ और ही होती है। अभी लगता है कि मैं प्रस्तुत हूँ उसके आह्वान के लिए, पर जब वह घड़ी आ जाएगी तब मेरी सहजता रह पाएगी या नहीं—-, और लोगों के विवरण जानकर सन्देह होता है। 
एक बात याद आती है। पिताजी बीमार चल रहे थे. मैं उनके पाँव दबाता हुआ उनके पास बैठा हुआ था। इन्हें कुछ असहज-सा पाया और पूछा , “तबियत ठीक नहीं है क्या?”
उन्होंने कहा – डर लगता है।
मुझे कौतूहल हुआ। उनसे पूछा—–“ किस बात का डर?”
उन्होंने कहा- “इस ओर का तो सब जाना हुआ है। उधर का तो सब अजाना है।“
मै चुप हो रहा। उनकी बात को अर्थ मुझे यही लगा कि इस ओर यानी जीवन में जो कष्ट हों वे सहन योग्य हो गए हैं, क्योंकि हम उन्हें जान गए हैं. पर उस ओर का क्या स्वरूप है, यह तो अजाना है। और अजाना तो डराता ही है।
पिताजी उस वक्त दुनियावी लगावों से परे जा चुके थे। शायद इसीलिए यहाँ का बैलैन्स-शीट उन्हें उद्वेलित नहीं कर रहा था। यह बैलैन्स-शीट – क्या पाया, क्या नहीं पाया—बहुत परेशान करता है।
डर का सवाल जीवन के अवसान के बाद के सन्दर्भ से है। इस मानी में वे लोग अधिक सहज स्थिति में हैं जिन्होंने आत्मा के संस्कार को नहीं पाया। प्राण शरीर पर आधारित है, शरीर स्पंदनरहित हुआ , प्राण गए। कहानी खत्म हुई।
पर जीवन आसान समाधानों को पसन्द नहीं करता, इसलिए आत्मा के माध्यम से जीवन के अविनश्वर होने के आश्वासन से सान्त्वना मिलती है। पर निश्चिन्तता नहीं मिल पाती, वह कैसी continuity जिसमें खुद अपने को न पहचान पाओ। शून्य से फिर शुरु करना पड़े।
मृत्यु अनुपस्थिति होती है। अनुपस्थिति उनके पास से जिनसे अपना सन्दर्भ हुआ करता है। मुझे तो तुमलोगों के पास से, जिनसे मेरा सन्दर्भ बनता है, अनुपस्थित रहते रहने का यथेष्ट अवसर मिलता रहा है। सबौर, पटना, तुर्की, सिलचर सीवान और अब, चण्डीगढ़ दिल्ली हर कहीं उपस्थिति ephemeral ही रही। शुरु से तय रहा था कि यहाँ बराबर नहीं रहना है। यह हमारी जगह नहीं हो सकेगी। हर जगह काफी घनिष्ठ सरोकार बने, काफी स्नेह पाया , पर सब छूटता भी रहा, बड़े स्वाभाविक एवम् सहज रूप से। प्रेत की तरह बहुत समय अपने आपको महसूस करता हूँ। इसलिए शायद मेरे लिए मृत्यु का अभ्यास सा है। फिर भी नहीं कह सकता कि जब वह दिन आएगा, उनसे प्रत्यक्ष भेंट होगी, तब मैं उनका सहजता से वरण कर पाउँगा कि नहीं।
अभी नागेश्वर गया। जब सन 2000 ई. की शुरुआत हुई थी मैंने उससे अपनी एक excitement शेयर की थी कि हमने बीसवी सदी को समाप्त होते देख लिया और इक्कीसवीं सदी में जीने जा रहे हैं, जिसके बारे में कभी आशा नहीं की थी हमने। फिर एक एक कर साल बीतते गए, आज नागेश्वर कह रहा है जैसे कि मैंने तो अपनी मंजिल पा ली। तुमको मेरे साथ के बग़ैर चलते जाना है, जब तक चलो। मेरे बहनोई ब्रह्मदेव बाबू का देहावसान आज से पन्दरह साल पहले हुआ था। उस वक्त मुझे लगा था कि मेरे अपने अस्तित्व का एक टुकड़ा मिट गया। क्योंकि Living will no longer be the same. उनके साथ मेरी पहचान के सवाल की लड़ाई चला करती थी। ऐसे ही मरने के पहले टुकड़ों टुकड़ों में आदमी मरा करता है।
हेडमास्टर ने एक बार लीडर को कहा था, हमसे पहले नहीं मरना तुम, क्योंकि तुम्हारे जुमले हमें हलका करते हैं।
जीवन से मोह का सवाल। फिर कभी। वनस्पति शास्त्र के अपने शिक्षक से मैंने frustration में पूछा था कि यही विषय पढ़ने की क्या उपयोगिता है। यह सब नहीं जानते जो लोग वे भी तो किसी अर्थ में कम नहीं हैं। मेरा संकट वे दूर नहीं कर पाए थे.।
हमें अवसर मिला है कि अकेलेपन को कम कर सकें संवाद कायम रखकर। अन्यथा प्रेत का अस्तित्व हो जाने का भय यथार्थ हो जाएगा। हमारा धर्म है कि जीवन के इस दौर में अपने आपको स्वस्थ, सानन्द रखने का हर सम्भव प्रयास करें.
प्रतीक्षा रहेगी, ताकि फिर कुछ बातें कर सकूँ। मेरे सवालों का जवाब देना न भूलना.
शुभाकांक्षी
लुगू

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