“गुरुकुल पौंधा जाकर वहां आचार्यादि मित्रों से शिष्टाचार भेंट”

 

मनमोहन कुमार आर्य

गुरुकुल पौंधा-देहरादून हमारे निवास से 15 किमी. की दूरी पर है। जब भी मन होता है हम महीने में एक या दो बार वहां जाकर गुरुकुल देखने सहित सभी आचार्यगणों से मिल आते हैं। आज भी हम वहां गये। गुरुकुल में हमें आचार्य चन्द्रभूषण शास्त्री, श्री शिवदेव आर्य तथा आचार्य श्री शिवकुमार वेदि जी के दर्शन व उनसे भेंट हुई।  आर्यसमाज की स्थानीय, बाहर की आर्य संस्थाओं एवं आर्यसमाज के सम्मेलनों आदि अनेक विषयों पर हमने विचार विमर्श किया। हरिद्वार का गुरुकुल सम्मेलन समाप्त हो चुका है। अमेरिका के अटलाण्टा में चार दिवसीय आर्य महासम्मेलन 19 जुलाई, 2018 से आरम्भ हो चुका है और आज इसका तीसरा दिन है। हमें इस सम्मेलन के कुछ समाचार फेसबुक एवं वीडियो आदि के द्वारा मिल रहे हैं जिन्हें देखकर हमें प्रसन्नता हो रही है। आर्यसमाज का एक अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेन 25 से 28 अक्टूबर 2018 तक दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है जिसके लिये जोर शोर से तैयारियां चल रही हैं। इससे सम्बन्धित समाचार भी हमें आर्यसन्देश व कुछ अन्य स्रोतों से मिलते रहते हैं जिससे हमें प्रसन्नता होती है। सभा के अधिकारीगण इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए जो पुरुषार्थ कर रहे हैं वह वन्दनीय है। हम अनुभव करते हैं कि आर्यसमाज के प्रत्येक अनुयायी को इस सम्मेलन में सम्मिलित होना चाहिये। हमारे जीवनकाल में भविष्य में ऐसे सम्मेलन कभी होंगे, कह नहीं सकते। हम अनुभव करते हैं कि इस सम्मेलन का आयोजन कर रहे सभी ऋषि भक्त इस आयोजन को अभूतपूर्व रूप देने के लिए प्रयासरत हैं। हम ईश्वर से इस महासम्मेलन की पूर्ण सफलता की कामना करते हैं।

 

गुरुकुल पौंधा में हमें भोजन कराया गया। भोजन के अवसर पर भी आर्यसमाज विषयक चर्चायें हुईं। गुरुकुल के संस्थापक श्रद्धेय स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी और आचार्य डा. धनंजय जी आजकल अटलांटा के आर्य महासम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए वहां गये हुए हैं। उनके भी समाचार हमें गुरुकुल के मित्रों से मिले। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी के साथ आर्य विद्वान और ऋषि भक्त डा. सोमदेव शास्त्री जी भी सम्मेलन में आर्य विद्वान के रूप में गये हैं। वहां वह अपने वैदुष्यपूर्ण प्रवचनों से लोगों को लाभान्वित करेंगे। आज हमने उनकी एवं आर्यजगत की प्रसिद्ध विदुषी बहिन डा. सूर्यादेवी चतुर्वेदा जी के ऋषिभक्ति की कुछ तथ्यपूर्ण चर्चायें सुनी तो हमें प्रसन्नता हुई और इन दोनों ऋषिभक्तों सहित गुरुकुल पौंधा के आचार्य एवं ब्रह्मचारियों के प्रति भी हमारी श्रद्धा भावना में वृद्धि हुई। हमें अनुभव हुआ कि इन दो ऋषि भक्तों, गुरुकुल के आचार्यों एवं ब्रह्मचारियों में ऋषि भक्ति कूट कूट कर भरी हुई है। यह लोग आर्यसमाज के किसी नेता व कृत्रिम व्यक्ति द्वारा ऋषि दयानन्द की मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष विरोध सहन नहीं कर सकते। हम आशा करते हैं कि हमारा यह गुरुकुल अपने मिशन में अनेकानेक सफलतायें अर्जित करेगा और वेद, ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के सिद्धान्त व मान्यताओं के प्रचार व प्रसार में अग्रणीय भूमिका निभायेगा। गुरुकुल हरिद्वार के सम्मेलन में भी आये लगभग 80 गुरुकुलों के आचार्य-आचार्याओं व उनके ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणियों को देखकर भी हृदय प्रसन्नता व उत्साह से भर रहा था। यह आर्यसमाज के किसी नेता के कारण से नहीं हुआ अपितु यह ऋषि दयानन्द के पावन जीवन व वैदिक सिद्धान्तों सहित ऋषिभक्तों की आर्यसमाज में अटूट निष्ठा का परिचय दे रहा था।

 

जब हम गुरुकुल से लौटने लगे तो वहां गुरुकुल के सभी ब्रह्मचारियों का एक सामूहिक आयोजन चल रहा था। हमें बताया गया कि प्रत्येक शनिवार के अपरान्ह के कुछ घंटे गुरुकुल के सभी ब्रह्मचारी इसी प्रकार से यज्ञशाला वा सभागार में एकत्र होकर आर्यसमाज के सिद्धान्तों से सम्बन्धित विषयों पर अपने अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इसमें छोटे व बड़े सभी ब्रह्चारी होते हैं। वरिष्ठ ब्रह्मचारी इनका मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। हम आज इस कार्यक्रम में पूरे समय उपस्थित नहीं हो सके। आगामी किसी कार्यक्रम में पूरे समय उपस्थित होकर इसका लाभ उठायेंगे और विस्तार से उसकी चर्चा भी करेंगे। ब्रह्मचारियों के व्यक्तित्व विकास व गुण संवर्धन सहित उनमें आर्यसमाज की मान्यताओं, सिद्धान्तों व संस्कारों को डालने का यह अच्छा तरीका है। हम अनुभव करते हैं कि इस प्रकार के प्रशिक्षण व कार्यक्रमों से ब्रह्मचारियों को बहुत लाभ होता है। भविष्य में इन ब्रह्मचारियों में से ही कोई आर्यसमाज का नेता, विद्वान, प्रचारक व पुरोहित बनेगा और कोई किसी विद्या मन्दिर में प्रवक्ता, अध्यापक होगा, कोई लेखक व आर्यसमाज का स्वार्थरहित कार्यकर्त्ता होगा। यह भी बता दें कि आर्यसमाज के विख्यात भजनोपदेशक श्री ओम्प्रकाश वर्म्मा, यमुनानगर गुरुकुल की अपनी कुटिया में ही सपत्नीक निवास कर रहे हैं।

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