महिला कल्याण से जुड़ेगी हज सब्सिडी

0
140

प्रमोद भार्गव
हज यात्रा पर जाने वाले यात्रियों को इस साल से अब कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। अल्पसंख्यकों मामलों के मंत्री मु,तार अब्बास नकबी ने यह ऐलान करते हुए चैंसठ साल पुरानी व्यस्था को एक झटके में खत्म कर दिया। हज यात्रियों को करीब 700 करोड़ की छूट प्रतिवर्ष दी जाती है। अब इस धनराशि को सरकार अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों की शिक्षा एवं उनके कल्याण पर खर्च करेगी। नकबी ने दावा किया है कि यह बिना तुष्टिकरण किए अल्पसंख्यकों को गरिमामय तरीके से सशक्त बनाने का नीतिगत उपाय है। हांलाकि इस छूट पर न्यायपालिका भी जनहित याचिकाओं के जवाब में सवाल उठाती रही है। लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के फेर में कांग्रेस सरकारें इसे खत्म करने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह हज सब्सिडी को चरणबद्ध ढंग से 2022 तक समाप्त करे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने साहस दिखाते हुए चार साल पहले ही इस सब्सिडी को एक झटके में खत्म कर दिया। हमारा संविधान देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की पैरवी करता है। इसलिए अब सरकार को चाहिए कि वह मानसरोवर यात्रा पर जो छूट यात्रियों को देती है, उसे खत्म करते हुए, उन राज्य सरकारों को भी निर्देश दे, जो वोट के लालच में तीर्थ दर्शन योजनाएं चला रहे हैं।
यह हमारे देश में ही संभव है कि सांप्रदायिक तुष्टिकरण को भी संवैधानिक नीति का दर्जा दे दिया जाता है। जबकि किसी भी धर्मनिरपेक्ष राज्य का यह बुनियादी सिद्धांत होता है कि उसमें न तो किसी धर्म को प्रोत्साहित किया जाए और न ही हतोत्साहित। सबको अपना मजहब अपनी परंपरा अनुसार मनाने की छूट होती है। किंतु भारत सरकार ने 1954 से मुस्लिमों को हवाई यात्रा के लिए हज सब्सिडी देना शुरू कर दी थी। यह उपाय ब्रिटिश शासन का अनुकरण था। इसके बाद 1957 में हाजी एक्ट बनाकर इसका विस्तार कर दिया गया। 1992 में ऐसी ही पुनरावृत्ति पीवी नरसिंह राव ने उस समय की जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया था। राव ने मुस्लिमों की नाराजी दूर करने के नजरिए से हज यात्रा में छूट ;सब्सिडी की धन राशि में बेतहाशा वृद्धि कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में जब सब्सिडी खत्म करने का फैसला सुनाया तो उससाल 700 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई थी। धीरे-धीरे इसमें कटौती की शुरूआत हुई। 2016 में 408 करोड़ और 2017 में 250 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई। दरअसल सरकार ने 2009 के बाद प्रति यात्री विमान किराया 16000 रुपए तय किया था। किराए का वाकी खर्च सरकार वहन कर रही थी। जबकि 2006 में ही संसदीय समिति ने इस छूट को खत्म करने का सुझाव दिया था। नबवंर 2017 में केंद्रीय हज समिति भी इसे समाप्त करने के लिए तैयार हो गई।
न्यायालय ने हज के लिए जाने वाले सरकारी प्रतिनिधि मण्डल को भी छोटा करने का सुझाव दिया है। यह मण्डल करीब 102 लोगों का रहता है, इसका मकसद मुफ्त में सैर-सपाटा करना भर है। हज यात्रा से सरकारी खजाने पर बोझ लगातार बढ़ रहा था। देश के पहले प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरु ने विशुद्ध मुस्लिम तुष्टिकरण की दृष्टि से पहली बार 1959 में हज यात्रा पर जाने वालों के लिए रियायती दर पर वायुयान उपलब्ध कराने की शुरुआत की थी। तब इसका इस बात को लेकर चंद बुद्धिजीवियों ने विरोध किया था कि कट्टरता के लिए प्रसिद्ध साउदी अरब समेत कोई भी मुस्लिम देश जब मक्का-मदीना के जाने के लिए रियायत नहीं देता तो भारत ने यह गलत परंपरा क्यों शुरु की ? दरअसल इस्लाम के पांच मौलिक सूत्रों में से एक यह भी है कि हज यात्रा अपने ही खून-पसीने और ईमानदारी की कमाई से की जानी चाहिए। कुरान की आयत में कहा गया है कि ’व अमेजुस्वालेहाते’ अर्थात नेक अमल कर, सदकर्म कर। इसी तरह का उद्देश्य ऋग्वेद की एक ऋचा में भी है, ‘रमंते लक्ष्मी पुण्यां’ अर्थात् लक्ष्मी का बास वहीं हैं, जहां पुण्य हो। भारत के दोनों ही प्रमुख धर्मों का सार यही है कि तीर्थ यात्राएं मेहनत और ईमानदारी से अर्जित धन से ही करनी चाहिए। जबकि सरकारी खजाने का धन शराब या अन्य नशीले द्रव्यों की बिक्री से की गई कर वसूली और जुर्माने के रुप में प्राप्त धन है, जो धर्मानुसार धार्मिक यात्राओं के लिए वर्जित है।
धार्मिक यात्राओं पर छूट केवल इस्लाम धर्मावलंबियों को दी जा रही हो, ऐसा नहीं है, हिंदुओं को मानसरोवर यात्रा के लिए करीब 200 करोड़ की छूट प्रति साल दी जा रही है। भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारें पिछले कई साल से सरकारी खर्च पर लाखों हिंदू, मुस्लिम और सिख धर्मावलंबियों को धर्मस्थलों की निशुल्क यात्राएं करा रही हैं। ये यात्राएं कराई तो गरीबों के लिए जाती हैं, लेकिन अब सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी ही इनका लाभ उठा रहे हैं। इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी लगातार आ रही हैं। देश और प्रदेश में जब कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हों, तब शत-प्रतिशत निशुल्क इन यात्राओं का औचित्य समझ से परे है।
आजादी के बाद पहली बार 2018 में 1.75 लाख यात्री हज पर जाएंगे। यह संख्या पिछले साल की तुलना में 5000 ज्यादा है। इनमें से 1.41 लीख लोग हज समिति के माध्ययम से लाएंगे। बिना मरहम के हज यात्रा करने वाली 1300 महिलाएं भी चुन ली गई हैं। इनकी मदद के लिए हज सहायक नियुक्त किए गए है। इस साल समुद्री जलमार्ग से भी सऊदी अरब जाने का विशेष प्रबंध सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस सुविधा से उन लोगों को लाभ होगा, जो वायुयान से यात्रा करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। सरकार ने यात्रा में पारदर्शिता लाने की दृष्टि से हज कमेटी आॅफ इंडिया और प्राइवेट टूर आॅवरेटर के बीच हज कोटा के बंटवारे को न्यायसंगत बनाने की पहल भी की है, जिससे स्वार्थी तत्वों की मिलीभगत से हजयात्रा के लिए जरूरत से ज्यादा जो शुल्क वसूल ली जाती है, उस पर अंकुश लगे।
इस मुद्दे को लेकर यह पहलू भी उभरकर सामने आया है कि यह छूट सीधी यात्रियों को न दी जाकर एअर इंडिया कंपनी को राहत पहुंचाने के लिए दी जाती है, जिससे कंपनी के राजसी घाटे की पूर्ति राजकोष से होती रहे। कुछ नेताओं का तो यहां तक कहना है कि यदि सरकार देशी-विदेशी एयर लांइस कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के आधार पर किराया दर आमंत्रित करती है तो किराये का मूल्य इतना कम निर्धारित होगा कि छूट नाम-मात्र रह जाएगी। अन्य देशी-विदेशी एयर लाइंस कंपनियां लगातार कम किराए पर हज यात्रा कराने की मांग उठाती रही हैं। यदि प्रतिस्पर्धा के जरिए हवाई किराया तय हो जाता है तो हज यात्रियों को सब्सिडी का खात्मा नहीं खलेगा।
प्रमोद भार्गव

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here