हामिद अंसारी: अभिव्यक्ति या षड्यंत्र 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस देश में, चर्चा का एक जीवंत विषय रही है. किंतु पिछले तीन वर्षों से इस विषय का वितान व विस्तार कुछ विचित्र और कुछ अजब सा हुआ है. आज के समय में मीडिया के सीमित दृष्टिकोण (फोकस्ड) ने कुछ भी कहने, सुनने, लिखने को पार्टी विशेष के प्रति निष्ठा कहना प्रारंभ कर दिया है. आप इस देश की मूल संस्कृति, शिक्षा, आदर्शों, परम्पराओं, साहित्य आदि की चर्चा करने लगेंगे तो आप भक्त या भगवा सिद्ध कर दिए जायेंगे. हाल ही में उभरे इस विचित्र, बेहया, विचारहीन व लज्जापूर्ण अभिव्यक्ति के वातावरण ने देश के वैचारिक वातावरण को बड़ी उहापोह में ला खड़ा किया है. विशेषतः देश का युवा समाज, इलेक्ट्रानिक व सोशल मिडिया इस वैचारिक धुंध का बेतरह शिकार हो गया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें हमारे संविधान ने दी है व उसे हर हाल में सुरक्षित व अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर इस देश में जो छल, प्रपंच व वितंडा रचा जा रहा है वह हमारे समाज को वैचारिक शून्यता की ओर बढ़ा रहा है.

हाल ही में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी अपने दसवर्षीय उप राष्ट्रपति के कार्यकाल से निवृत्त होते होते जो वाचालता दिखा गए हैं उसे सही अर्थों में मूंहफट होना ही कहा जा सकता है. निवृत्तमान उपराष्ट्रपति ने जाते जाते कह दिया कि  “यह आकलन सही है कि देश के मुस्लिम समुदाय में आज घबराहट और असुरक्षा का भाव है. देश के अलग-अलग हिस्सो में मुझे ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं. भारत का समाज सदियों से बहुलतावादी रहा है, लेकिन सबके लिए स्वीकार्यता का ये माहौल अब खतरे में है. लोगों की भारतीयता पर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति भी बेहद चिंताजनक है. लोगों पर भीड़ के बढ़ते हमले, अंधविश्वास का विरोध करने वालों की हत्याएं और कथित घर वापसी के मामले भारतीय मूल्यों में आ रहे विघटन के उदाहरण हैं. इससे ये भी पता चलता है कि कानून-व्यवस्था को लागू करने की सरकारी अधिकारियों की क्षमता भी अलग-अलग स्तरों पर खत्म हो रही है.’’ प्रश्न यह नहीं है कि हामिद अंसारी ने ऐसा विषवमन क्यों किया? प्रश्न यह है कि हामिद अंसारी ने ऐसा अचानक इस समय क्यों कहा?! प्रश्न यह भी है कि इस वाचालता की “पालिटिकल टाइमिंग” क्या है?! दस वर्षों में कभी एक भी बार भारतीय मुस्लिमों की निर्धनता, पिछड़ेपन, अशिक्षा, बेरोजगारी के विषय में एक शब्द न बोलने वाले हामिद अंसारी को न जाने अचानक ऐसा कौन सा असुरक्षा का भाव डस गया कि वे इस प्रकार की अशोभनीय चर्चा कर गए. तीन तलाक जैसी सामाजिक बुराई पर तो हामिद अंसारी ने समाज को कोई संदेश का शुभ कार्य नहीं किया!! हामिद अंसारी स्वयं जानें कि ऐसा प्रलाप करके उन्होंने मुस्लिम समाज का कितना हित साधा है? किंतु वे इतना अवश्य समझ लें कि ऐसा कहकर उन्होंने भारतीय समाज में एक विभाजक रेखा खींचनें का साक्षात पाप अवश्य कर दिया है.

आइये हम इस बहाने यह चर्चा कर लें कि देश भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के वैचारिक जगत में जो प्रश्न हैं उनका स्वरूप व आशय क्या है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जांच को हम पांच भागों में विभक्त कर सकते हैं – 1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के शाब्दिक – संवैधानिक अर्थ

2. “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” – इस अधिकार के दायित्व व दायित्व बोध का हमारें (विशेषतः देश के अग्रणी नागरिकों का) आचरण में प्रदर्शन 3. “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन” – इस वाक्यांश की परिधि 4. देश व समाज में उच्च पदों पर विराजित व्यक्तियों, प्रतिष्ठित नागरिकों, जन प्रिय नायकों या कलाकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व सामाजिक उत्तरदायित्व के मध्य की महीन रेखा का कितना भान है? 5. कुछ कुछ शर्मीले, लिहाजपूर्ण, स्वभावतः आदरपूर्ण आचरण वाले भारतीय समाज में मुखर होनें व वाचाल/मुंहफट होनें के भेद को चिन्हित करना. यदि हम इन पांच बिन्दुओं पर केन्द्रित चर्चा के अंतर्भाव को ग्रहण करेंगे तो हमें वर्तमान में चल रहे “अभिव्यक्ति के नाम पर प्रलाप” का सच समझ आ जाएगा.

हमारें देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न को सबसे बड़ी चुनौती निस्संदेह व निर्विवाद रूप से कांग्रेस पार्टी की तत्कालीन नेता इंदिरा गांधी ने आपातकाल में दी थी. यदि हम आपातकाल के अभिव्यक्ति संकट को छोड़ देवें तो इसके अतिरिक्त हमें इस देश में कभी घोषित अभिव्यक्ति का संकट दिखा ही नहीं. किंतु ऐसा कतई नहीं है. हम भारतीय स्वतंत्रता के बाद से सतत अभिव्यक्ति के अघोषित संकट से दो चार हो रहें हैं. स्वाधीनता के पश्चात जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनते से ही हम मार्क्सवादी इतिहासकारों द्वारा गलत अथवा दोषपूर्ण अभिव्यक्त होतें रहें हैं. नेहरु ने जिन भी व्यक्तियों, संस्थानों व प्रतिष्ठानों की नियुक्ति/रचना की उनका मूल भाव ही भारत की प्राचीनता व मौलिकता के विरोध से प्रारम्भ होता था.  उनकी पूरी दृष्ट‍ि, कथन, लेखन, ही भारत विरोधी होती थी. सुशोभित सिंग के शब्दों में कहूं तो – “दामोदर धर्मानंद कोसम्बी ने “श्रीमदभगवद्गीता” को ब्राह्मणवादी और सवर्णवादी ग्रंथ बताया, तो दूसरी तरफ़ रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब जैसे तथाकथित लेखकों विचारकों ने यह साबित करने में जान लगा दी कि मुग़ल कितने दयालु थे! “इतिहास की पुनर्व्याख्या” का (नेहरु आशीष युक्त) मार्क्सवादी आग्रह सुविदित है. भारतीय प्राच्यविद्या को अंधविश्वासों से जोड़ दिया गया, जबकि उसमें गणित, व्याकरण, काव्य, चिकित्सा की अद्भुत दिव्य दृष्ट‍ियां हैं. मजाल है आज कोई “जेएनयू” या “डीयू” जैसी हिंदुस्तान की किसी बड़ी अकादमी से पढ़कर निकले और राजशेखर, भरतमुनि, व्यास, पाणि नि,आर्यभट या कुमारिल को उद्धृत करे! इस पूरी ज्ञान-परंपरा को ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहकर निरस्त करने की कोशिशें आज भी की जा रही हैं! संस्कृत का नाम लो तो पढ़े लिखे बुद्धिजीवी नाक-भौं सिकोड़ते हैं और “अष्टाध्यायी” और “अमरकोश” की बात करो तो सामान्यजन यूं कौतुक से देखते हैं, जैसे किन्हीं विलायती ग्रंथों का नाम ले लिया हो! यही  नेहरू का वह भारत है, जहां अच्छी अंग्रेज़ी लिखना गर्व की बात मानी जाती है और अच्छी हिंदी हमें असहज कर देती है. आज के वाचाल/मुंहफट अभिव्यक्ति के दौर में योग जैसी अतुल्य निधि तक को “भगवा” माना जाता है! हाँ आज यही अभिव्यक्ति है और इस प्रलाप को ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का परिचायक माना जाता है और यदि कोई संस्कृति प्रेमी इस वाचालता का विरोध करे तो उसे भक्त, भगवा या संघी कह कर उसका हास्यपूर्ण विरोध करने के प्रयासों को बुद्धिजीविता माना जाता है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा के वर्तमान दौर में हम जेएनयु के “भारत तेरे दुकड़े होंगे – इंशा अल्ला इंशा अल्ला” जैसे दुर्दांत किस्से या बौद्धिक ऐय्याशी वाले सम्मान वापसी के प्रकरणों की गहन जांच करें तो हमें इन सब की पृष्ठभूमि में अंग्रेजों, अंग्रेज परस्त कांग्रेसियों व वामपंथियों की भारत विरोधी कुत्सित मानसिकता स्पष्ट समझ आती है. हामिद अंसारी का उपराष्ट्रपति जैसे बड़े, गरिमामयी, सम्मानीय व  संवैधानिक पद से निवृत्त का यूं कुछ भी कह देना पिछले तीन वर्षों से चल रहे “अभिव्यक्ति के प्रलाप” के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कहा जा सकता. अधिक उचित होता वे निवृत्त होकर मुस्लिम समाज में कुछ रचनात्मक कर्म करते व फिर अपनी बात को समाज के सम्मुख रखते.

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