लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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ये सत्तर की उम्र भी अजीब होती है,
बुढ़ापे की दहलीज़ होती है,
इसके आगे जितनी मिल जाये,
सूद पर व्याज होती है।

 

 

सत्तर की उम्र में भी रोमांस होता है,
अंदाज़ ज़रा सा अलग होता है
तुमने दवाई खाई
अब आराम करलो,
ऐसी बातें होती है।

 

 

किसको कितनी दवाइयां निगलनी है
किस किस डाक्टर को दिखाना है,
जांच करानी है, अस्पताल जाना है।
दवाई खाकर फिर
किसी नये काम में लग जाना है।

 

 

बच्चे क्या कर रहे हैं….
मत सोचो
अपनी ज़िन्दगी जीने दो….
खुश रहो खुश रहने दो
सत्तर की उम्र कुछ ऐसी होती है।

 

 

बेटे ने कहा
मां मेरी कमीज़ में बटन लगा देना,
मां को तो नई उर्जा मिलती है,
काम तो बहुत करने का मन करता,
पर शरीर अब
जल्दी थक जाता है
सत्तर की हो या अस्सी की
हौसले की क्या उम्र होती है!

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