हिन्दी दिवस …(14 सितम्बर पर विशेष)

जग मोहन ठाकन

बिन्दी-बिन्दी खरोंच रहा हूँ

अपना ही मुख नोंच रहा हूँ

जितना सोचूं उतना उलझूं,

उलझ-उलझ कर सोच रहा हूँ ।

तुम भी सोचो,मैं भी सोचूं,

आओ मिलकर सारे सोचें-

अपने ही घर विवश हुई क्यों

हिन्दी ‘‘दिवस‘‘ मनाने को ??

माता छोड़ विमाता पूजें,

छोड़ आसमा छाता पूजें ,

दूर कहीं से आई चलकर ,

मान उसे बेहमाता पूजें ।

ज्ञान -विज्ञान की राज बनी है ,

जन-जन की आवाज बनी है ,

बुश-बलेयर की बोली अब –

भाषाओं का ताज बनी है ।

बुद्धि-रस को चूस रही है,

अमर-बेल बन छा जाने को।

अपने ही घर विवश हुई क्यों-

हिन्दी ‘‘दिवस’’ मनाने को ??

आओ बैठो कारण खोजो ,

कारण खोज निवारण खोजो ,

ऐसा प्रण धारो सब मन में-

हिन्दी का विस्तारण हो जो ।

लिखो हिन्दी ,बोलो हिन्दी ,

रग-रग में तुम घोलो हिन्दी ।

विश्व ताज को छीन ओढ़ ले-

ऐसी हिन्दी बन जाने को । ।

अपने ही घर विवश हुई क्यों –

हिन्दी ‘‘ दिवस‘‘ मनाने को ??

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