हिन्दी-विरोध का मूल-हिन्दुत्व नहीं, मजहबी उसूल

मनोज ज्वाला

भारत की राजभाषा हिन्दी का दक्षिण भारतीय प्रदेशों में विरोध का स्वर एक बार फिर सुनाई पड़ने लगा है। इस बार के  विरोध का राग तो वही है, किन्तु रंग बदला हुआ है। हिन्दी थोपने का राग पहले भी आलापा जा रहा था, किन्तु इसे हिन्दुत्व का रंग पहली बार दिया जा रहा है। बदले हुए रंग में यह विरोध हिन्दी को बढ़ावा देने सम्बन्धी केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान की प्रतिक्रिया के तौर पर हो रहा है। शाह ने देश में अंग्रेजी के बढ़ते अनावश्यक विस्तार को रोकने की दृष्टि से किसी भी भारतीय भाषा को कमतर आंकते हुए हिन्दी को बेहतर नहीं बताया है, न ही इसे हिन्दुत्व से सम्बद्ध किया है। उन्होंने तो हिन्दी की सर्वस्वीकार्यता के कारण संविधान-सभा के द्वारा ही इसे राजभाषा घोषित किये जाने के आधार पर इसके संवर्द्धन की बात कही है। जो सर्वथा उचित ही है। बावजूद इसके, देश के दक्षिणी प्रदेशों में द्रमुक-अन्नाद्रमुक व एआईएमआईएम आदि राजनीतिक दलों के एमके स्टालिन व असद्दुदीन ओवैसी और उनके उतर-भारतीय सिपहसालारों द्वारा हिन्दी को अब ‘हिन्दुत्व’ से जोड़कर इसके विरोध का प्रलाप किया जा रहा है, तो इसके मूल में छिपे कारकों की पड़ताल आवश्यक है।यह विरोध केवल राजनीतिक वितण्डा मात्र नहीं है, बल्कि विभाजनकारी मजहबी योजनाओं के क्रियान्वयन का एक उपक्रम है। जो भारत के विखण्डन पर आमादा ईसाई-विस्तारवादी शक्तियों-समूहों के द्वारा एक षड्यंत्र के तहत समय-समय पर प्रायोजित किया जाता रहा है। इस हिन्दी-विरोध का मूल कारण भारत के दक्षिण में दुनिया के ‘पश्चिम’  का वह षड्यंत्रकारी उसूल कायम हो जाना है, जो अंग्रेजों की औपनिवेशिक सत्ता के सहारे चर्च मिशनरियों के सिपहसालार बुद्धिबाजों द्वारा गढ़ी गई है।जी हां ! पश्चिम की, अर्थात यूरोप-अमेरिका की ईसाई-विस्तारवादी शक्तियां भारत राष्ट्र के विखण्डन हेतु पिछले 100-150 वर्षों से एक षड्यंत्र के तहत अनेकानेक विखण्डनकारी योजनाओं को भाषा, साहित्य व शिक्षा विषयक विविध हथकण्डों के माध्यम से अंजाम देने में लगी हुई हैं। इस बाबत उन मजहबी शक्तियों से सम्बद्ध बुद्धिबाजों ने अत्यन्त चतुराई से अपने प्रायोजित भाषा-विज्ञान व इतिहास-अनुसंधान सम्बन्धी बे-सिर- पैर के विधान रचते हुए तरह-तरह  की संगतियां-विसंगतियां उठा-बैठा कर दक्षिण भारत की दो प्रमुख भाषाओं ‘तमिल’ और ‘तेलगू’ को जबरन ही ‘संस्कृत भाषा-परिवार’ से बाहर की ‘हिब्रू’ से मिलती-जुलती भाषा प्रतिपादित कर उसे इस कदर प्रचारित कर दिया है कि अब वहां के शिक्षण-संस्थानों में भी कमोवेश यही तथ्य स्थापित हो चुका है। जबकि यह निर्विवादित सत्य है कि भारत की समस्त भाषायें संस्कृत से निकली हुई एक ही भाषा-परिवार की हैं। किन्तु, विलियम जोन्स और मैक्समूलर आदि मिशनरी षड्यंत्रकारी भाषाविदों ने उतर भारतीय लोगों को संस्कृत-भाषी ‘आर्य’ और दक्षिण भारत के लोगों को उन आर्यों से शोषित-विजित ‘द्रविड़’ नाम देकर एक ही मूल भाषा- संस्कृत एवं एक ही मूल संस्कृति (सनातन-वैदिक) से समरस बृहतर भारतीय समाज के बीच शोषक-शोषित की जो विभाजक-रेखा खींच रखी है, आज भी उनके पश्चिम-परस्त भारतीय राजनेताओं की कृपा से कायम है।चर्च-मिशनरियों की मजहबी नीतियों से निर्देशित शैक्षिक संस्थाओं द्वारा इस आधारहीन विभाजक उसूल को अपने प्रायोजित भाषा-विज्ञान और नस्ल-विज्ञान के सहारे इतनी हवा दी जा चुकी है कि यह ‘सफेद झूठ’ ही सच के रूप में स्थापित होकर भारत की राजभाषा हिन्दी को नकारने का उत्प्रेरक बना हुआ है। दक्षिण में ‘पश्चिम’ का यह उसूल स्थापित करने की शुरुआत भारत पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजपाट स्थापित हो जाने के बाद उस औपनिवेशिक शासन का औचित्य सिद्ध करने की बाबत पश्चिमी विद्वानों द्वारा ‘भाषा-विज्ञान’ व ‘नस्ल-विज्ञान’ नामक हथकण्डा खड़ा किये जाने के साथ ही शुरू हो गई थी। किन्तु, ‘द्रविड़’ नस्ल गढ़ने एवं उसके आधार पर संस्कृत और संस्कृत से निःसृत हिन्दी के विरोध का षड्यंत्र सन 1856 में कैथोलिक चर्च के एक पादरी ने क्रियान्वित किया। रॉबर्ट कॉल्डवेल नामक वह पादरी ऐंग्लिकन चर्च के ‘सोसायटी फॉर द प्रोपेगेशन ऑफ द गास्पल’ से सम्बद्ध मद्रास-स्थित तिरुनेलवेली चर्च का बिशप था। इस षड्यंत्र को अंजाम देने के लिए पहले उसने सन 1881 में ‘कम्परेटिव ग्रामर ऑफ द ड्रैवेडियन रेश’ नामक एक पुस्तक लिखकर ‘द्रविड़’ शब्द के अर्थ का अनर्थ करते हुए यह प्रस्तावित किया कि भारत के मूलवासी द्रविड़ थे, जिनकी मातृभाषा- तमिल संस्कृत-परिवार से बाहर की भाषा है।अंग्रेजों की विभेदकारी नीति के अनुसार कॉल्डवेल ने भारतीय लोगों को भाषा और धर्म के आधार पर दो भागों में विभाजित करने तथा तमिल-भारतीयों को ईसाइयत के ढांचे में बैठाने के उद्देश्य से दक्षिण भारत के एक स्थान-विशेष के तथाकथित इतिहास की एक पुस्तक लिखी थी- ‘ए पॉलिटिकल एण्ड जेनरल हिस्ट्री ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ तिरुनेलवेली’ जिसे सन 1881 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की मद्रास प्रेसिडेन्सी ने प्रकाशित कराया था। उस पुस्तक में तिरुनेलवेली के उस कैथोलिक चर्च बिशप ने आसेतु हिमाचल व्याप्त बहुसंख्य बृहतर भारतीय धर्म-समाज में दरार पैदा करने तथा द्रविड़ नस्ल की सांस्कृतिक व भाषिक पृथकता प्रस्तुत करने और उस द्रविड़ता को ईसाइयत के नजदीक ले जाने का जो काम किया, उससे अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन और चर्च के विस्तारवादी कार्यक्रम, दोनों को आगे चलकर बहुत लाभ मिला।’एशिया में निवासियों की पहचान’ पर कथित रुप से शोध करने वाले टिमोथी ब्रूक और आन्द्रे स्मिथ के अनुसार ‘कॉल्डवेल ने व्यवस्थित रूप से द्रविड़ विचारधारा की बुनियाद रखी और…..उसने दक्षिण भारत की संस्कृत-भाषी आबादी व गैर-संस्कृत-भाषी आबादी के बीच भाषिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व नस्ली विभेद खड़ा कर असंस्कृत-भाषी तमिलों को ‘द्रविड़’ घोषित कर उनके पुनरुद्धार की परियोजना प्रस्तुत की।’  इसी कारण बाद में अंग्रेज प्रशासकों ने मद्रास के मरीना समुद्र-तट पर बिशप काल्ड्वेल की एक प्रतिमा स्थापित कर दी, जो आज के चेन्नई शहर का एक ऐतिहासिक स्मारक बना हुआ है। इतना ही नहीं, उस षड्यंत्रकारी काल्ड्वेल के ऐसे काले कारनामों को ही अंग्रेज हुक्मरानों द्वारा और बाद में उनके हस्तकों द्वारा दक्षिण भारत का इतिहास बना दिया गया। फिर उसी विकृत इतिहास के आधार पर न केवल वहां के समाज-धर्म-संस्कृति को विकृत करने का एक अभियान-सा चल पड़ा, बल्कि हिन्दी को उतर भारतीय भाषा बताकर उसके विरोध का राजनीतिक वितण्डा भी खड़ा कर दिया गया।सन 1916 में उन्हीं चर्च-मिशनरियों ने ‘जस्टिस पार्टी’ नाम से एक राजनीतिक दल का गठन किया-कराया, जिसने सन 1944 में एक पृथक ‘द्रविड़स्तान’ देश की मांग कर डाली थी। उसी जस्टिस पार्टी का नया संस्करण ‘द्रविड़ मुनेत्र कड्गम’ है, जिसका हिन्दी अर्थ ‘द्रविड़ोत्थान संघ’ है। बताना जरूरी है कि अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड्गम इसी का प्रतिद्वंदी राजनीतिक दल है।दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध किये जाने के पीछे इन्हीं पश्चिमी तत्वों का विभाजनकारी उसूल सक्रिय रहता है। तमिल-तेलंगाना आदि दक्षिणी प्रदेशों में यूरोप-अमेरिका की चर्च मिशनरियों के साथ उनसे सम्बद्ध अनेक एनजीओ भी भाषिक-अलगाववाद फैलाने के बाबत इस कदर सक्रिय हैं कि तमिलनाडु में उपरोक्त जिन दो प्रमुख राजनीतिक दलों- द्रमुक और अन्ना द्रमुक की सरकार हुआ करती है, वे दोनों भी द्रविड़वाद और हिन्दी-विरोध की ही राजनीति करते हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा हिन्दी के संवर्द्धन की हिमायत किए जाने का ‘हिन्दुत्व’ से कोई लेना-देना कतई नहीं है, किन्तु हिन्दी के विरोध की यह सियासत मजहबी सोच से ग्रसित अवश्य है।

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