हिंदूराष्ट्र स्वप्नदृष्टा : बंदा वीर बैरागी

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अध्याय – 9

सरहिंद फिर बन गया — ‘ सर – ए – हिंद ‘

पंजाब में अब गुरु गोविंदसिंह के शहीद सपूतों का प्रतिशोध लेने की हवा बड़ी तेजी से चल रही थी और पंजाब ही क्यों मां भारती के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले हिंदुस्तान के प्रत्येक व्यक्ति का खून इस बात को लेकर खौल रहा था कि तत्कालीन मुगल सत्ता गुरु गोविंदसिंह के वीर सपूतों को दीवार में चुनवा गई । इसे लोगों ने अपने स्वाभिमान पर मारी गई चोट के रूप में लिया। विरोध , क्रोध और प्रतिशोध की ज्वाला सर्वत्र भड़क रही थी ।

विरोध और प्रतिशोध से लोग रहे फुंकार ।
क्रोध निरंतर बढ़ रहा करो शत्रु का संहार ।।

आज जब हम प्रचलित इतिहास को पढ़ते हैं तो उससे हमें ऐसा आभास नहीं होता कि उस समय गुरु गोविंद सिंह के वीर सपूतों के बलिदान से सारा भारतवर्ष हिल गया होगा या विरोध , क्रोध और प्रतिशोध की भावना से भर गया होगा । इसका कारण यही है कि वर्तमान इतिहास को जिस षड्यंत्रकारी भावना के साथ लिखा गया है ,उसमें तत्कालीन भारतवर्ष के विरोध, क्रोध और प्रतिशोध के भावों को छुपा कर रखा गया है। यदि इतिहास के साक्ष्यों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो यह ऐसे ही नहीं था कि दक्षिण में ‘ हिंदवी स्वराज्य ‘ के लिए काम करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके उत्तराधिकारियों को न केवल दक्षिण भारत के लोग अपना सहयोग और समर्थन प्रदान कर रहे थे अपितु उत्तर भारत के लोग भी समर्थन देने के लिए उठ खड़े हुए। यही कारण था कि जब मराठे दक्षिण से उत्तर की ओर चले तो भारतवर्ष की जनता ने उनका प्रतिशोध न कर स्वागत किया । निश्चय ही उत्तर भारत के लोगों की इस देशभक्ति के पीछे गुरु गोविंद सिंह जी के वीर सपूतों का बलिदान भी काम कर रहा था । लोग नित्य प्रति के होने वाले अपमान से दुखी हो उठे थे । यही कारण था कि उस समय भारतवर्ष में सर्वत्र क्रांति ! क्रांति !! और क्रांति !!! का ही ज्वर चढ़ रहा था । ओ३म शांति: ! शांति: !! शांति: !!! का जाप करने वाला भारतवर्ष अब क्रांति ! क्रांति !! क्रांति !!! का जाप कर रहा था। क्रान्ति भारत का युग धर्म बन चुका था।
यह ऐसे ही नहीं था कि गोदावरी के तट पर तपते हुए बंदा बैरागी को गुरु गोविंद सिंह बातों ही बातों में देश सेवा के लिए पुकारते हैं और उसे पंजाब की बागडोर सौंप कर आगे के लिए प्रस्थान कर जाते हैं । यह भी कैसे हो गया कि कृष्ण रुप में उपस्थित हुए गुरु गोविंदसिंह के संक्षिप्त से उद्बोधन को सुनकर बंदा बैरागी अर्जुन के रूप में शस्त्र हाथ में ले ‘ महाभारत ‘ के लिए तैयार हो जाता है ? गुरु गोविंद सिंह बंदा बैरागी को लेकर स्वयं लेकर पंजाब क्यों नहीं आए ? – इस पर भी हमको सोचना चाहिए । वह स्वयं कहां चले गए ? – यह प्रश्न भी हमारे मस्तिष्क में उठना चाहिए । निश्चय ही वह एक हीरे को खोजकर और उसे उसके योग्य कार्य बताकर आगे दूसरे हीरों की खोज में निकल पड़े। क्योंकि उनकी योजना थी कि क्रांति हो और इतने बड़े स्तर पर और इतने सुनियोजित ढंग से हो कि मुगल शाही धू – धू करके जल उठे ।

अन्याय – अत्याचार से मुक्त हो भारत देश ।
तानाशाही जल उठे मिट जाएं सकल क्लेश ।।

क्रांति की इस व्यापक योजना पर काम भी हुआ और वह समय आने पर फलीभूत भी हुई । परंतु इतिहास की घट रही घटनाओं और उसकी स्वाभाविक गति पर कभी हमने ही ध्यान से चिंतन करने की आवश्यकता नहीं समझी या समझी भी तो धर्मनिरपेक्षता को भारत में किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न न हो जाए ? – इस भय के कारण उस पर गंभीर चिंतन करने से स्वयं ही अपने आपको रोक लिया।
हम सभी इस बात से भली प्रकार परिचित हैं कि भारत के राष्ट्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन से भारत की सेना भी ब्रिटिश काल में प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाई थी । चाहे 1857 की क्रांति हो और चाहे आजाद हिंद फौज के द्वारा की गई क्रांति हो , हर समय भारत की सेना के भीतर राष्ट्रवादी स्वर उभरते रहे । जिन्हें संभालना अंग्रेजों के लिए कठिन हो गया था । यदि इतिहास के इस दौर में हम सेना के भीतर तत्कालीन क्रूर राजशाही के विरुद्ध विद्रोह के भाव भड़कते हुए देखते हैं तो ऐसा कैसे हो सकता था कि गुरु गोविंदसिंह जी के दो सपूतों को दीवार में चुनवाया जाए और हमारे सैनिक शांत बैठे रहें या भारतवर्ष में हिंदुओं पर अत्याचार होते रहें और हमारे राष्ट्रवादी वीर सैनिकों पर कोई प्रभाव न पड़े ? यदि इतिहास को सच बोलने दिया जाए तो दिल्ली सल्तनत और मुगल बादशाहत के शासनकाल में हुए ऐसे विद्रोहों और सैनिकों के द्वारा किए गए क्रांतिकारी कृत्यों से इतिहास गौरवान्वित हो उठेगा , जिन्होंने मौन रहकर या तो अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान दे दिया या और कोई बड़ा महान कार्य करने का खतरा मोल लिया।
उस समय भी सैनिकों ने अपने गुरु के विचारों को सुनकर उनके साथ उठ खड़ा होने का क्रांतिकारी और देश भक्ति से भरा हुआ निर्णय लिया । उनका सोया हुआ स्वाभिमान जाग गया और स्वाभिमान के वशीभूत होकर उन्होंने तुरंत उस नवाब की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया , जिसने गुरु गोविंदसिंह जी के वीर सपूतों को दीवार में चुनवाया था । नवाब के यहां से सेवानिवृत्त होकर यह सैनिक सीधे बंदा बैरागी से जा मिले। इसका एक कारण यह भी था कि जिस नवाब ने गुरुजी के सपूतों को जीवित दीवार में चुनवाया था उसका अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा था , उसने कुछ सिक्ख सिपाहियों की उपस्थिति में उन्हें संबोधित करते हुए कुछ इस प्रकार कह दिया था कि तुम्हारे गुरु की तो यह दुर्गति हो रही है कि वह इधर-उधर भागा फिर रहा है ,अब एक नया आया है उसकी भी ऐसी खबर ली जाएगी कि उसका कहीं पता नहीं लगेगा। स्पष्ट था कि उसका संकेत गुरु गोविंद सिंह और बंदा बैरागी की ओर था । उसका यह व्यवहार हमारे सिख सिपाहियों को अच्छा नहीं लगा ।
गुरु गोविंद सिंह जी इस बात से भली प्रकार परिचित थे कि उनके बेटों की शहादत का सकारात्मक परिणाम यह निकलेगा कि लोग देशभक्ति की भावना के वशीभूत होकर मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए संकल्पित होंगे । जिसे संभालने के लिए ही उन्होंने बंदा बैरागी को पंजाब भेजा था और अब यही होने लगा था कि लोग नवाब की नौकरी छोड़कर अपने बंदा बैरागी से आ – आकर मिल रहे थे और उन्हें सहर्ष , बिना शर्त और बिना किसी वेतन के अपनी सेवाएं देने को तत्पर हो रहे थे । इसी को देशभक्ति कहा जाता है — जहां प्राणों को सहर्ष , बिना मूल्य और बिना शर्त के त्यागने की प्रतिस्पर्धा देखी जाती हो।
भाई परमानंद जी लिखते हैं :– ” घृणा और अपमान से भी यह बात सिक्ख सहन नहीं कर सके और नौकरी छोड़ बैरागी से आ मिले । नवाब ने बैरागी को बिल्कुल गलत समझा था । इसके भीतर विद्युत शक्ति थी । जैसे ही थोड़ी सी फौज तैयार हुई इसने सामाना के नगर पर चढ़ाई कर दी और साथ ही यह घोषणा कर दी कि जो लूट का माल जिसके हाथ जाएगा उसका मालिक लूटने वाला ही होगा । नगर में खूब लूटमार हुई । तीन दिन तक सामान में ईंट बजती रहीं । लोग जंगलों में भाग गए। जो कबाब खाते थे अब झाड़ियों के बेर खाते। जो मखमलों के बिछौने पर सोते थे अब पत्थरों का सिरहाना लगाते । इस नगर पर प्रकोपों का विशेष कारण यह था कि स्थानीय अली हुसैन जिसने गुरु को धोखा देकर आनंदपुर छुड़वाया था , इसने गुरु के बच्चे के बारे में सरहिंद के सूबे से कहा था – सांपों के बच्चे सांप ही होते हैं । “
“जो जितना माल लूटेगा उसका मालिक वही होगा “- यह परंपरा भारत की नहीं थी । भारत ने तो किसी के धन को लूटना उचित ही नहीं समझा । भारत की संस्कृति तो अपरिग्रहवादी संस्कृति थी । जिसमें जोड़ने – जोड़ने की नहीं ,अपितु छोड़ने – छोड़ने की भावना व्याप्त थी । इसके उपरांत भी बंदा बैरागी ने यह घोषणा की कि – ” जो जितना माल लूट लेगा वह माल लूटने वाले का ही होगा ” – तो उसकी इस घोषणा का विशेष अर्थ था। ऐसी घोषणा कर बंदा बैरागी ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुष्टों के साथ दुष्टता का व्यवहार करने से ही दुष्ट की दुष्टता का उपचार हो सकता है । ‘शठे शाठ्यम समाचरेत ‘ – भारतीय शास्त्रों की परंपरा है और राजनीति का धर्म है । इसे हमारे राजधर्म में सामाजिक शांति स्थापित करने और सज्जन शक्ति को प्रोत्साहित करने का सर्वोत्तम साधन माना गया है । दूसरी बात यह भी है कि दुष्ट की दुष्टता को समाप्त करना ही शासन का मूल उद्देश्य है , जो शासन अपने इस राजधर्म से मुंह फेर लेता है , वह देश का नेतृत्व करने योग्य नहीं होता। जो शासन दुष्टता को प्रोत्साहित करता हो या स्वयं ही दुष्टता का आचरण करता हो , उसका समूलोच्छेदन करना तो जन-जन का अधिकार होता है । इस जनाधिकार को भारत ने ही अपने लोगों को प्रदान करने का साहस दिखाया है । इसे हमारे वेद , महाभारत , रामायण , मनुस्मृति आदि धर्म शास्त्रों की पूर्ण सहमति और सम्मति प्राप्त होती है , यद्यपि आज के संसार के किसी भी संविधान ने शासन के विरुद्ध क्रांति करने का जनाधिकार अपने लोगों को प्रदान नहीं किया है ।
भारत की प्राचीन काल से ही यह मान्यता रही है कि शठ को शठता से ही जीता जा सकता है ।

दुष्ट और दुष्टता हैं – दानवता के भाव ।
इनका चिंतन देत है मानवता को घाव ।।

जिन दुष्टों ने अत्याचार करते हुए अपनी क्रूरता की सारी सीमाएं लांघकर गुरुजी के जीवित बच्चों को दीवार में चुनवाया था , उनके साथ ऐसा किया जाना समय की आवश्यकता थी । माल लूटने की परंपरा भारत को तुर्कों और मुगलों ने दी । यह उनकी दुष्टता की पराकाष्ठा थी । उनकी इस दुष्टता का उपचार यही था कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाता जैसा व्यवहार उन लोगों ने दूसरों के साथ किया था। भारतवर्ष में जितनी भी अमानवीय परंपराएं समाज में पाई जाती हैं उनमें से एक ‘ मुफ्त का माल ‘ लूटने की परंपरा भी है । जब हम ‘ मुगलों का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव ‘ – जैसे विषयों पर बोलते हैं तो उनमें ऐसे ही विषयों को उठाना चाहिए कि उनके हमारे साथ इतनी देर रहने से ऐसे – ऐसे दुष्प्रभाव भारतीय समाज पर पड़े हैं । यही ‘ गंगा जमुनी संस्कृति ‘ है और यही मुगलों की भारत को देन है।
गुरु तेग बहादुर का घातक जलालुद्दीन भी इसी नगर का रहने वाला था । इस प्रकार बंदा वीर बैरागी ने एक तीर से दो निशाने साध लिए थे । आज गुरु तेग बहादुर के घातक जलालुद्दीन के किए गए पाप का प्रतिशोध भी ले लिया गया था । यहां से हमारे सिक्ख सैनिकों और उनके सरदार बंदा वीर बैरागी को जो सरकारी खजाना मिला , वह सारा का सारा सिपाहियों में वितरित कर दिया गया । यह समाचार सुनते ही हजारों डाकू और लुटेरे आकर बैरागी की फौज में भर्ती हो गए । माना कि उन्होंने यह कार्य इसलिए किया कि यदि वह बैरागी की फौज में सम्मिलित हो जाएंगे तो उन्हें ‘ लूट का माल ‘ मिलेगा, परंतु हमें यहां पर यह भी देखना चाहिए कि अब से पहले जितने भी मुगल आक्रांता भारत में आए या उनसे पहले तुर्क और इस्लामिक आक्रांता भारत में आए , उन सबका धर्म भी डाकू धर्म ही था। उनकी फौजें नियमित फौजी नहीं थी , अपितु लुटेरे और डकैतों की हो फौजें थीं । बंदा बैरागी ने डाकू और लुटेरों को साथ लेकर मुगलों को ‘ तुर्की ब तुर्की ‘ प्रत्युत्तर देने का सरल सा उपाय अपना लिया । उस समय अपने संसाधनों से सेना खड़ी करना बड़ा कठिन कार्य था। यद्यपि सेना में राष्ट्रभक्त अवैतनिक सैनिकों की भी बड़ी संख्या थी , परंतु यदि डाकू लुटेरे भी उसमें साथ आकर खड़ा होना चाहते थे तो उनका भी इस लिए स्वागत करना उचित ही था । क्योंकि वह भी मुगलों को अपना शत्रु समझते थे और बंदा बैरागी के उस उद्देश्य में सहायक होना चाहते थे , जिसके अंतर्गत वह इन विदेशी शासकों को भारत से बाहर खदेड़ देना चाहता था।
आज गुरु गोविंद सिंह जी की वह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो रही थी कि एक दिन मेरे शेर सरहिंद की ईंट से ईंट बजा देंगे । बंदा बैरागी आज बब्बर शेर की भांति सरहिंद में दहाड़ रहा था । उसकी दहाड़ को सुनकर मुगलों के सियार घरों में घुस गए थे , जबकि बहुत से सियार तो घर छोड़कर ही भाग लिए थे । क्रूर व्यक्ति के बारे में यह एक सर्वमान्य सत्य है कि वह कायर होता है । उसकी क्रूरता के कारण लोग उससे भयभीत होते हैं , जबकि वास्तविकता यह होती है कि जैसे ही उसका काल उसे आता हुआ दिखाई देता है तो वह सामान्य व्यक्तियों से भी अधिक भयभीत हो उठता है। कारण यह भी है उसका पापाचरण उसे भीतर से दुर्बल कर देता है । जबकि एक देशभक्त फांसी के फंदे पर भी हंसते हुए और कविताएं गाते हुए अपनी मृत्यु का स्वयं वंदन और अभिनंदन करता है , जैसा कि भारत के इतिहास के अनेकों क्रांतिकारियों के साथ हमने होते हुए देखा । इसका कारण यही था कि उनकी आत्मा की शक्ति बहुत प्रबल थी।
सरहिंद में किसी में यह साहस नहीं था कि भारत के पराक्रम और शौर्य के प्रतीक बने इस शेर का कोई बाहर आकर सामना कर सके । सब को यह पता चल गया था कि गुरु पुत्रों को दीवार में जीवित चुनवाने का भारतवासी प्रतिशोध कैसे लेते हैं ? – जिन लोगों ने गुरु पुत्रों को जीवित दीवार में चुनवा कर अपनी पीठ थपथपाई थी , वह आज अपना मुंह भी छुपाते घूम रहे थे ।इस प्रकार के पराक्रमी प्रतिशोध से भारतीय पौरुष की धाक जम गई और मुगल यह जान गए कि भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए बंदा बैरागी एक ही पर्याप्त है।
किसी कवि ने सच ही तो कहा है :–

जननी जने तो भक्त जन या दाता या शूर ।
नहीं तो जननी बांझ रहे , व्यर्थ गंवावे नूर।।

बंदा बैरागी के प्रताप ने सरहिंद को आज फिर ‘ सर – ए – हिंद ‘ अर्थात भारत का मस्तक या सिर बना दिया था । बड़े गर्व और गौरव के साथ सीना तानकर सरहिंद फिर से खड़ा हो गया । उसने गुरु पुत्रों को जीवित चुनवाने के जिस पाप को अपनी आंखों से होते देखा था , आज उस पाप को उसी सरहिंद ने अपने हाथों से धोकर यह सिद्ध कर दिया कि वह अपनी आभा का स्वयं स्वामी है और वह उसे किसी भी स्थिति में विलीन या मलीन नहीं होने देगा। भारत ने एक बार फिर अपने पुनरुज्जीवी पराक्रम को प्रकट किया और विदेशी क्रूर अत्याचारी शासकों को यह बताने में सफलता प्राप्त की कि भारत कभी मरता नहीं है , अपितु वह सदैव अपनी जीवंतता को प्रकट करने के लिए संघर्ष करता रहता है।
अपने इस महान कार्य के पश्चात बंदा बैरागी भारतवर्ष की पितर परंपरा के अनुसार अब ‘पितर ‘ लोगों में सम्मिलित हो चुका था । चाणक्य नीति के अध्याय 5 श्लोक 22 में कहा गया है कि जन्म देने वाला , यज्ञोपवीत आदि संस्कार कराने वाला , अध्यापक , अन्न देने वाला तथा भय से बचाने वाला — यह पांच पितर के समान गिने जाते हैं । इस प्रकार पंच पितरों की इस परंपरा में भय से बचाने वाला होने के कारण बंदा बैरागी हमारे तत्कालीन समाज के लिए पितर की श्रेणी के सम्मानपूर्ण स्थान को प्राप्त करने में सफल हो गया।
बंदा बैरागी के अब तक के जीवन की यह सबसे गौरवपूर्ण उपलब्धि थी।
इस पहली लड़ाई में बैरागी के तीरों की मार वास्तव में ही देखने योग्य थी । नवाब की सेना ने उससे पहले कभी तीरों की ऐसी बौछार नहीं देखी थी । अंधाधुंध तीरों के सामने नवाब की सेना रुक नहीं पाई और पीठ दिखाकर मैदान से भाग निकली । इससे वीर बैरागी के हाथों शत्रु का बहुत सा युद्ध का सामान भी आ गया था। जिसका उसे भविष्य में बहुत लाभ मिला । वैरागी की सेना निरंतर आगे बढ़ती जा रही थी । कोई तूफान भी उन्हें रोकने वाला नहीं था । जो लोग कल परसों अपनी पीठ थपथपा रहे थे और अपने आप को संसार का सर्वोत्कृष्ट योद्धा सिद्ध कर रहे थे , वही योद्धा हमारे एक योद्धा के सामने आज गीदड़ की भांति पीठ दिखाकर भागे जा रहे थे । देखने योग्य दृश्य था और साथ ही गौरवमयी पल भी थे ।

पीठ दिखा कर भग रही शत्रु दल की फौज ।
थर – थर सारे कांपते भुला दई सब मौज ।।

हमारे इतिहास में हमें यह तो बताया गया कि किन – किन लोगों ने हम पर किस – किस प्रकार शासन करने के लिए क्या – क्या क्या अत्याचार किए गए ? हमें कुछ इस प्रकार दिखाया गया कि हमने उन अत्याचारों का कोई प्रतिरोध नहीं किया और कायर होने के कारण उन अत्याचारों को बड़े सहज रूप से सहन कर लिया । यदि अत्याचार होने के साथ-साथ अत्याचारों के प्रतिशोध की कहानी को भी प्रस्तुत कर दिया जाए तो भारतीय इतिहास के उस गौरवपूर्ण पक्ष पर भी प्रकाश पड़ जाएगा , जिसके कारण हम विदेशी सत्ताधारियों से सैकड़ों वर्ष तक लड़ते रहे और अंत में उन्हें यहां से भगाने में सफल हुए । जब इतिहास को इस प्रकार से दिखाया व लिखाया जाएगा तो हमारे अनेकों योद्धा इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ पर अपना स्थान प्राप्त कर जाएंगे और उन्हीं में से एक महान योद्धा होगा – बंदा वीर बैरागी ।
जब बंदा बैरागी की सेना आगे बढ़ रही थी तो रास्ते में एक गांव हटिया में मुसलमान एक गाय की हत्या कर रहे थे । जिन्हें बंदा बैरागी के सिपाहियों ने दूर से देख लिया । उस राक्षस मुस्लिम की ऐसे कृत्य को हमारे सिक्ख सैनिक सहन नहीं कर पाए । उन्होंने गाय की रक्षा करने का संकल्प लिया और कई सैनिकों ने गाय की रक्षा में अपने प्राण दे दिए । बैरागी की सेना के अन्य सैनिकों ने जब अपने सैनिक बंधुओं को इस प्रकार बलिदान होते देखा तो बंदा बैरागी की सेना के अन्य सैनिक उस गांव पर टूट पड़े । बताते हैं कि इस गांव में केवल वही व्यक्ति बचा जिसने शिखा या जनेऊ दिखाया था , शेष सभी गौ हत्यारे मानकर समाप्त कर दिए गए ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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